विशेष आलेख : दलित विकास पर छुआछूत की छाया - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 4 जनवरी 2015

विशेष आलेख : दलित विकास पर छुआछूत की छाया

शिक्षा और पोषण संबंधी सार्वजनिक सेवाएं किसी भी समुदाय के विकास का अहम पहलू हैं। इसके लिए सरकार द्वारा गांव-गांव में आंगनबाड़ी, स्कूल और सस्ती कीमत की राषन दुकानें स्थापित की गई हैं। किन्तु इन सेवाओं तक जरूरतमंद दलित समुदाय की पहुंच आज भी नहीं हो पा रही है। हालांकि हमारे देश में अस्पृश्यता को काफी पहले खत्म कर दिया, आज भी यह देश के कई भागों में प्रचलित है. सामाजिक न्याय एवं आधारिकता मंत्रालय की ओर से कुछ वर्ष पूर्व ‘‘प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट (1995)’’ के अमल के बारे में बंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल द्वारा एक सर्वे कराया गया था। इसके नतीजे बहुत ही चैंकाने वाले थे। सर्वे के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकोें में आज भी छुआछूत की समस्या बदस्तूर जारी है। भले ही कानून के डर से और दलितों में बढ़ी  आत्म-सम्मान की भावना के चलते उसका विकृत रूप बाहर नहीं दिखता है। मध्यप्रदेष में पिछले दिनों हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि गांवांे में स्थित आंगनबाड़ी, स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र और सरकारी राषन दुकान में छुआछूत और भेदभाव की सदियों पुरानी परपंरा आज भी कायम है। 
            
मध्यप्रदेष में वंचित समुदायों के नागरिक अधिकारों के लिए सक्रिय ‘‘दलित अधिकार अभियान’’ द्वारा प्रदेष के 10 जिलों के 30 गावों में किए गए अध्ययन के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में दलित समुदाय के साथ 70 प्रकार की छुआछूत का प्रचलन है, जिसमें स्कूल, आंगनबाड़ी, राषन दुकान और स्वास्थ्य केन्द्र में होने वाली छुआछूत का उनके जीवन पर बेहद गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। स्कूलों में प्रचलित छुआछूत का ही नतीजा है कि 100 प्रतिषत नामांकन के सरकारी दावे के बावजूद 7 प्रतिषत दलित बच्चे स्कूल से बाहर हंै। दलित समुदाय के 57 प्रतिषत परिवारों के अनुसार उनके बच्चे स्कूल के मटके, टंकी या नल से खुद अपने हाथों से पानी लेकर नहीं पी सकते। प्यास लगने पर वह गैरदलित बच्चों से पानी पिलाने का निवेदन करते है। गैरदलित बच्चे उन्हें ऊपर से पानी पिलाते हैं। यदि गैरदलित बच्चे पानी नहीं पिलाते हैं तो उन्हें प्यासा रहना पड़ता है या घर जाकर पानी पीना पड़ता है। अध्ययन में शामिल सभी गांवों में सरकारी स्कूलोें में मध्यान्ह भोजन के दौरान दलित समुदाय के बच्चों को अलग लाईन में बैठाया जाता हैं। अलग लाईन में बैठाने के साथ ही उन्हें रोटी ऊपर से फेककर दी जाती है, वहीं उनकी थाली पर भी निषान लगे होते है। थाली पर निषान लगे होने का मतलब यह है कि वह थाली पहचानी जा सकें कि उसमें दलित बच्चे खाना खाते हैं और उन थालियों को अन्य बच्चों की थालियों से अलग रखा जा सके। समुदाय और बच्चों के साथ आयोजित केन्द्रित समूह चर्चा में यह बात साफतौर पर सामने आई कि कई स्थानों पर दलित बच्चों की थाली अलग रखी जाती है। गैरदलित बच्चे और खाना बनाने वाले लोग इन थालियों को भी नहीं छूते हैं। 
             
षिक्षा के साथ ही पोषण का मुद्दा भी बेहद गंभीर रहा है। पिछले कुछ सालों में हुए विभिन्न सर्वेक्षणों से यह बात उजागर हुई है कि मध्यप्रदेष में 50 से 60 प्रतिषत बच्चे कुपोषित हैं। गौरतलब है कि कुल कुपोषित बच्चों में से 80 प्रतिषत बच्चे दलित एवं आदिवासी समुदाय के हंै। कुपोषित बच्चों को पोषण आहार प्रदान करने तथा उनकी विषेश देखरेख के लिए स्थापित आंगनबाड़ी भी छुआछूत से मुक्त नहीं है। दलित अधिकार अभियान द्वारा किए गए अध्ययन से यह तथ्य उजागर होता है कि ज्यादातर दलित बच्चे आंगनबाड़ी की पोषण सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। इनमें 53 प्रतिषत बच्चों ने आंगनबाड़ी में होने वाली छुआछूत के कारण वहां जाना छोड़ दिया, जबकि 18 प्रतिषत बच्चे इसलिए आंगनबाड़ी नहीं जाते, क्योंकि आंगनबाड़ी सहायिका दलित मोहल्ले के बच्चों को लेने नहीं आती क्योंकि उनके माता-पिता मजदूरी पर जाते है। इस दषा में बच्चों के लिए अकेले आंगनबाड़ी पहुुंचना कठिन होता है। 16 प्रतिषत बच्चों ने कार्यकर्ता का व्यवहार अच्छा नहीं होने के कारण आंगनबाड़ी जाना छोड़ दिया। दलित समुदाय के जो बच्चे आंगनबाड़ी जाते हैं उनमें से 27 प्रतिषत बच्चे आंगनबाड़ी के अंदर नहीं जाते। उन्हंें आगनबाड़ी भवन के बाहर बरामदे में बैठाया जाता है, जबकि 35 प्रतिषत बच्चे आंगनबाड़ी के अंदर सिर्फ दलित जाति के बच्चों के साथ ही बैठते हैं। इसका मतलब यह है कि आंगनबाड़ी के अंदर दलित समुदाय के बच्चे अलग लाईन में बैठते हैं।
            
ग्रामीण क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए संचालित ‘‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन’’ भी छुआछूत की बीमारी से मुक्त नहीं है। सर्वेक्षण से यह बात उजागर होती है कि स्वास्थ्य मिषन के अंतर्गत गांव-गांव में स्वास्थ्य कार्यकर्ता की विजिट का लाभ दलित समुदाय को नहीं मिल पाता। दलित समुदाय के 61 प्रतिषत लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता गांव में विजिट तो करते हैं किन्तु सिर्फ गैरदलित मोहल्लों में ही। इसके कारण दलित समुदाय की गर्भवती महिलाएं और उनके बच्चे स्वास्थ्य जांच एवं टीकाकरण से वंचित रहते हैं। खाद्य सुरक्षा और पोषण के मुख्य आयाम के रूप में गांव-गांव में स्थापित सरकारी राषन दुकानें में भी होने वाली छुआछूत, इस अध्ययन से उजागर होती है। 47 प्रतिषत दलित परिवारों के अनुसार उन्हें दुकान के अंदर जाने की अनुमति नहीं है। जबकि गैरदलित समुदाय के लोग दुकान के अंदर जा सकते हैं। राषन खरीदने के लिए दलित समुदाय के लोगों को दुकान के बाहर दहलीज पर ही खड़े रहना पड़ता है। दुकानदार द्वारा दहलीज पर ही अपनी टेबल लगाई जाती है। 48 प्रतिषत परिवारोें का कहना है कि दुकानदार राषन कार्ड हाथ से नहीं लेते। वह राषन कार्ड टेबल पर रखने को कहते है। टेबल पर राषन कार्ड रखने के बाद वह राषन कार्ड उठाता है और वापस देने के लिए भी वह टेबल पर ही रखता है। दलित समुदाय से राषन के पैसे लेने में मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाए जाने की बात 22 प्रतिषत परिवारों द्वारा बताई गई। 33 प्रतिषत लोगों ने दुकानदार द्वारा दलित समुदाय के लोगों को जातिसूचक शब्दों से पुकराने की बात बताई। इस तरह एक ओर जहां सार्वजनिक सेवाओं को सामुदायिक विकास की दिषा में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है और सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं तथा कानूनों के जरिये उन्हें ज्यादा साधन सम्पन्न बनाया जा रहा है, वहीं विकास के पायदान पर सबसे नीचे रहने वाला दलित समुदाय छुआछूत के कारण उससे वंचित हंै। ऐसे में अब यह ज़रूरी हो गया है कि साधन और सुविधाएं मुहैया कराने के साथ ही जमीनी स्तर पर ऐसा वातावरण बनाया जाए जिससे दलित एवं गैरदलित समुदाय के बीच मेलजोल हो सके और वह विकास की प्रक्रिया एवं सार्वजनिक सेवाओं में समान रूप से सहभागी हो सकें। ेगी।  






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राजेन्द्र बंधु
(चरखा फीचर्स)

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