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रविवार, 25 जनवरी 2015

विशेष आलेख : उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए अपशकुनकारी माहौल

मोदी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में इसके बाद फिर शुरू हुए भाजपा के खराब प्रदर्शन का सिलसिला उनके लिए अपशकुन का सूचक है। विधान परिषद की बारह सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा का अतिरिक्त उम्मीदवार तो हार ही गया साथ ही भाजपा के खिलाफ महागठबंधन तैयार होने का संकेत भी दे गया है जिससे भाजपा के रणनीतिकार निश्चित रूप से विचलित होंगे।

लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेले उत्तर प्रदेश में सहयोगी दलों के साथ 75 सीटें मिली थीं। बहुमत के जादुई आंकड़े से भी ज्यादा सीटें हासिल करने का भाजपा को जो श्रेय मिला इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वह उत्तर प्रदेश की मेहरबानी की देन था। अभी भी भाजपा को अपनी सत्ता में मजबूती लाने के लिए उत्तर प्रदेश से बेहतर योगदान अपेक्षित है लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश में उसकी गत होती जा रही है उससे लगता है कि कहीं यह प्रदेश उनकी उल्टी गिनती शुरू करने का कारण न बन जाए। यहां मोदी का कोई करिश्मा काम नहीं आ रहा। लोक सभा चुनाव में जीते विधायकों द्वारा खाली की गई सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। यहां तक कि मोदी के अपने संसदीय निर्वाचन क्षेत्र बनारस की एक सीट भी सपा ने उनके सहयोगी दल से छीन ली। इसके बाद बनारस में छावनी बोर्ड के चुनाव में भी भाजपा को बुरी तरह पराजय का मुंह देखना पड़ा और अब विधान परिषद चुनाव में दस ज्यादा वोट हथिया लेने के बावजूद पार्टी अपना प्रत्याशी नहीं जिता सकी जिससे भाजपा की बेहद किरकिरी हुई है।

उत्तर प्रदेश में जब लोकसभा चुनाव में भाजपा को भारी सफलता मिली थी तो इसे अमित शाह के करिश्माई चाणक्य कौशल का नमूना करार दे दिया गया था। अमित शाह अभी भी उत्तर प्रदेश में उतनी ही गंभीरता से पार्टी की बढ़त का तानाबाना बुन रहे हैं लेकिन जैसा कि कहा गया है पुरुष नहीं होत बलवान समय होत बलवान तो अब वही अमित शाह यहां कुछ नहीं कर पा रहे। ओपी माथुर को धुरंधर संगठन कर्ता माना जाता है लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रभारी के रूप में वे कोई महारत नहीं दिखा पा रहे। उधर भाजपा को महाबली होता देख अन्य पार्टियों को सद्बुद्धि आ गई है। विधान परिषद के चुनाव में जिस तरह का अघोषित तालमेल सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद के बीच बना उससे जाहिर है कि यह पार्टियां अब यह सोचने लगी हैं कि आपस का हिसाब-किताब बाद में चुकता कर लेंगे लेकिन फिलहाल तो सब मिलकर भाजपा का झंडा गिराओ तभी सभी का अस्तित्व बचा रह सकता है। कांग्रेस ने सपा को तो वोट दिए ही इसके बाद जो वोट बचे वह बसपा को दे दिए। सपा ने भी इस पर कोई एतराज नहीं किया। उधर रालोद व सपा के बीच रिश्ता नहीं बन पाया लेकिन रालोद ने भाजपा की ओर झुकने की बजाय बसपा से गठबंधन कर लिया। इस तरह से चारों दलों के बीच इस चुनाव में प्रकारांतर से महागठबंधन हुआ है और यह मजबूत किया जाता है तो भाजपा के लिए बहुत मुश्किल खड़ी हो सकती है।

भाजपा ने केवल इकतालीस विधायक होते हुए भी दो उम्मीदवार क्यों खड़े किए अब इस सवाल का जवाब खोजा जा रहा है। एक उम्मीदवार जिताने के लिए कम से कम इकत्तीस विधायकों की जरूरत थी इसलिए दूसरा उम्मीदवार जिता पाने की कोई गुंजाइश पहले ही भाजपा में नजर नहीं आ रही थी। पर लोकसभा चुनाव की अप्रत्याशित सफलता ने उत्तर प्रदेश के कुछ भाजपा नेताओं को हद से ज्यादा गुमान में भर दिया है जिससे वे शेखचिल्ली जैसे ख्वाब देखने लगे हैं। अक्सर बड़बोले भाजपा नेता लोकसभा चुनाव के बाद यह दावा करते रहे हैं कि उनके साथ सपा के इतने विधायक हैं कि वे जब चाहें तब राज्य सरकार का तख्ता पलट दें। वे यह भी प्रचारित कर चुके हैं कि बसपा के विधायकों में भी जबरदस्त मोहभंग के हालात हैं और इशारा मिल जाए तो उनकी बड़ी संख्या पाला बदल कर सकती है। अपनी इस लफ्फाजी को वे वास्तविकता मानने का भ्रम पाल बैठे। शायद इसीलिए उन्होंने दो उम्मीदवार खड़े करने का दुस्साहस दिखाया। उन्होंने जिस तरह की हवा बना रखी थी उससे आम लोगों तक को लगा था कि हो सकता है कि भाजपा के हाथ में वास्तव में कुछ इतना आ गया हो कि विधान परिषद के चुनाव का परिणाम अप्रत्याशित निकले। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। भाजपा की जमकर भद्द पिटी। सवाल एक प्रत्याशी के हारने का नहीं है लेकिन भाजपा के लिए लगातार अशुभ घटनाचक्र के चलते प्रदेश में लोकसभा चुनाव के बाद उसके पक्ष में जो माहौल बना था वह पूरी तरह बिखरने पर आ गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की शायद सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पास प्रदेश स्तर पर कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो लोगों को लुभा सके। संगठन में गणेश परिक्रमा करने वाले लोग महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा किए हुए हैं। अमित शाह व ओपी माथुर इतनी बारीकी से उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति का अवलोकन कर चुके हैं फिर भी वे इस कमजोरी को अच्छी तरह नहीं भांप पाए हैं। इससे साबित होता है कि उन्हें जो सफलताएं मिलीं वे अंधे के हाथ बटेर लगने की तरह वक्त की मेहरबानी का नतीजा थीं। वैसे वे कोई बड़े तीरंदाज नहीं हैं। 

बहरहाल भाजपा ने विधान परिषद चुनाव की पराजय को लेकर कोई चर्चा न करने की रणनीति अपनाई है ताकि इसका नकारात्मक प्रभाव व्यापक न हो। बावजूद इसके अंदर ही अंदर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उत्तर प्रदेश में पार्टी के हालातों से चिंतित जरूर होगा। मोदी ने साबित किया है कि वे बहुत अच्छे मार्केटियर हैं और इस हुनर की बदौलत राजनीतिक बाजी को पलट देने में भी उन्हें महारत हासिल है। इस कारण लोगों को प्रतीक्षा है कि मोदी उत्तर प्रदेश की कमान स्वयं अपने हाथों लेकर गणतंत्र दिवस समारोह के बाद यहां संगठन में क्या तब्दीलियां लाते हैं जिससे उनकी पार्टी चुनौतियों से पार पाने में सक्षम बन सके।





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के पी सिंह
ओरई 

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