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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

विशेष : अन्ना हजारे और गोविंदाचार्य की जुगलबंदी क्या गुल खिलाएगी

anna govindacharya
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिगुल बजाने का अन्ना हजारे का ऐलान नई राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक ऐसी परिघटना है जिसमें भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण निहितार्थ छिपे हो सकते हैं। अन्ना हजारे ने इसकी शुरुआत तो तभी कर दी थी जब उन्होंने स्विस बैंक में काला धन जमा करने वाले भारतीयों को उजागर करने के मामले में मोदी और उनकी सरकार की नीयत पर सवाल उठाए थे। इसके बाद भूमि अधिग्रहण के मामले में मोदी सरकार के कदम ने उनको उग्र कर दिया। उन्होंने खुला आरोप लगाया कि मोदी सरकार किसानों की विरोधी है। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि शुरू में मोदी सरकार को वक्त देने के लिए वे खामोश थे लेकिन अब सरकार को पर्याप्त अवसर दिया जा चुका है। इसमें सरकार ने बुरी तरह निराश किया है। जनलोकपाल की नियुक्ति सहित अपने पुराने एजेंडे को लेकर वे मोदी सरकार के खिलाफ भी रण छेड़ेंगे।

अन्ना हजारे की इस घोषणा के बाद खास बात यह हुई कि एक जमाने में संघ के प्रमुख आइडियोलाग में शुमार गोविंदाचार्य भी उनके आंदोलन में सहभागी बनने के लिए रालेगण सिद्धि गांव जा पहुंचे जहां उन्होंने अन्ना से मुलाकात की। दोनों ने मोदी की कारपोरेट परस्त आर्थिक नीति को खारिज करते हुए कुटीर व लघु उद्योगों पर आधारित गांधीवादी अर्थ व्यवस्था को भारत की परिस्थितियों के लिए सर्वोत्तम विकल्प बताया। अभी दिल्ली विधान सभा चुनाव का घमासान चल रहा था जिसकी वजह से अन्ना हजारे के संघर्ष के एलान को चर्चा में अहमियत नहीं मिल पाई लेकिन सूक्ष्म विश्लेषक उनके आंदोलन की नई अंगड़ाई में भविष्य के लिए प्रभावी रूप से परिवर्तनकारी निहितार्थ छिपा देख रहे हैं।

सरकार में आने के बाद मोदी में विश्व नेता बनने की महत्वाकांक्षा का ऐसा विस्फोट हुआ कि वे दुनिया के सारे प्रमुख नेताओं को अपना मुरीद बनाने में जुट पड़े। इस दौरान उनका काफी कुछ वैचारिक कायाकल्प हुआ है। खास तौर से भूमंडलीकरण की नीतियों का उन पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। इसके चलते उनका और संघ का रास्ता लगातार अलग-अलग होता चला जा रहा है। न केवल हिंदुत्व के विवादित मुद्दों के मामलों में ऐसा है बल्कि उनकी उद्योग परस्त नीतियों से भी संघ परिवार में असंतोष है। श्रम कानूनों में उन्होंने जो तोड़मरोड़ हाल में की है संघ के आनुषांगिक संगठनों ने उनके खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया है। हालांकि अभी संघ नहीं मान रहा कि मोदी उसके भस्मासुर हो सकते हैं लेकिन संघ में मोदी के स्वतंत्र खयालातों को लेकर एक तरह का संदेह तो पनपने ही लगा है।

कुलीनों के हितों का पोषण और इसी के विस्तार के रूप में उदार आर्थिक नीति को बढ़ावा राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा की पहचान बन चुके हैं। अभी तक कांग्रेस को इस धारा की राजनीति का अगुवा माना जाता था लेकिन आज मुख्य धारा की इस राजनीति के सर्वोपरि ध्वजा वाहक के रूप में मोदी मान्य हो चुके हैं। नीतियों के मामले में भारतीय मतदाताओं की समझ अभी भी बहुत प्रौढ़ नहीं है लेकिन उनकी छठी इंद्रिय अचेतन में सही संकेतों को फीड करती है जिसके आधार पर वे कहीं न कहीं यह देख पा रहे हैं कि परंपरागत राजनीतिक दलों में मूल रूप से कोई अंतर नहीं बचा है। मोदी के विकल्प का सवाल आने पर इसी कारण मुख्य विपक्षी दल के प्रति वे उत्साह नहीं दिखा पाते लेकिन दिल्ली के चुनाव में जिस तरह अरविंद केजरीवाल को आज की परिस्थितियों में व्यापक समर्थन मिला और जिसके कारण मोदी को पूरी ताकत लगा देने पर भी इस भीषण सर्दी में पसीना आ गया उससे यह साफ है कि अगर नीतियों के मामले में सचमुच कोई अलग माडल लेकर सामने आए तो लोकतांत्रिक तकाजे के अनुरूप जनता मोदी को ही सर्वस्व सौंपने की बजाय उसे परखने की कोशिश करने के लिए भी तैयार है। इसी से जुड़कर अन्ना हजारे और गोविंदाचार्य की जोड़ी के आगाज से भविष्य के लिए राजनीति में एकदम नए अंकुरण की संभावनाएं पैदा हो जाती हैं।

कारपोरेट आधारित आर्थिक नीति कुल मिलाकर मानवीयता विरोधी है। यह हर तरीके से साबित हो चुका है। पूंजी और संसाधनों का जबरदस्त केेंद्रीकरण, इस नीति पर चोटी पर बैठे लोगों के मुनाफे की हवश पूरी करने के लिए व्यापक समाज की बलि चढऩा और परंपरागत नैतिकता व मूल्यों को दकियानूस करार देकर खारिज किया जाना उक्त नीति की अनिवार्य नियति है। स्वार्थ परता की पराकाष्ठा पर पहुंचाकर मनुष्य के सामाजिक गुण की हत्या यह कारण बन रही यह नीति अंततोगत्वा उन लोगों के लिए भी असहनीय तनाव और कुंठा का कारण बन रही है जो इससे सर्वाधिक लाभान्वित होने की प्रवंचना में जी रहे हैं। ऐसे में नैतिकता पर आधारित पुरानी व्यापार व्यवस्था के नए संस्करण की ईजाद का तकाजा बढ़ता जा रहा है। उदार अर्थ व्यवस्था के विश्व व्यापी घटाटोप की वजह से इस दिशा में आविष्कार के लिए सुचिंतित तौर पर कोई कदम आगे नहीं बढ़ पा रहा है लेकिन समय के गर्भ में कहीं न कहीं बड़ी उथल-पुथल जरूर हो रही है। मोदी के महाकाय होते व्यक्तित्व के सामने अरविंद केजरीवाल का चुनौती बनकर उभरना हो या कारपोरेट के खिलाफ लघु कुटीर उद्योग की संस्कृति के पुनर्जीवन के लिए अन्ना हजारे-गोविंदाचार्य के आंदोलन की सुगबुगाहट। यह इसी अंदरूनी उथल-पुथल के ऊपरी लक्षण हैं। अंदरूनी उथल-पुथल के यह लक्षण आगे चलकर बहुत निर्णायक और विस्फोटक रूप में भी सामने आ सकते हैं।




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के पी सिंह 
ओरई 

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