इतिहास कभी -कभी अपने को दोहराता है। पहले जहां भाजपा खड़ी थी दिल्ली में वहीं आम आदमी पार्टी खड़ी है। खुद आप ने कभी कल्पना नहीं की थी कि वह सत्तर सीटों में से तीन पर भाजपा को समेट देगी और दिल्ली को कांग्रेस मुक्त बना देगी। आप को यह ऐतिहासिक जीत ऐसे मौके पर मिली है जबकि बेदम हो चुकी कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष मनौती मांग रहा था कि कोई ऐसा जादूगर मिले जो मोदी मैजिक के प्रभाव को कम कर दे। केजरीवाल ने यह कमाल कर दिखाया है, ऐसे में यह यह जानने की उत्सुकता स्वभाविक है कि आखिर ये सब कैसे हुआ। कहां तो त्रिमूर्ति नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरूण जेटली की संसाधनों से सुसज्जित भारी भरकम सेना और कहां कुंआ खोदकर पानी पीने वाली आप। क्या लोगों के सिर से नमोनिया उतरने लगी है ? इसको समझने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी की उस रणनीति को समझने की जरूरत है जिस पर अमल कर अभी तक वह चुनाव जीतते आये हैं। मोदी ने लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में अपनी ब्रांडिंग विकास पुरुष के रूप में की और पैंसठ फीसदी युवा आबादी वाले देश के सपनों में नया रंग भरा। युवाओं को रोजगार, किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य, उद्योगपतियों को निवेश व उद्योग के लिए सहूलियतें देने, कालाधन वापस लाने व सुशासन के साथ साथ सबका साथ सबका विकास और अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारों ने लोगों पर जादुई असर किया। यूपीए के दस साल के भ्रष्ट शासन, महंगाई व कमजोर नेतृत्व से उबे देश ने जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारें तोड़कर मोदी में ऐसा विश्वास व्यक्त किया जिसकी कल्पना खुद मोदी ने भी नहीं की थी लेकिन सत्ता में आने और एक के बाद एक चार राज्यों में मिली सफलता ने मोदी और उनके रणनीतिकारों में यह दंभ भर दिया कि सब कुछ अच्छा हो रहा है। इस दौरान कुछ कानूनों में परिवर्तन, किसानों की बदहाली, भाव- भगिमाओं और पहनावे से उनकी छवि आम आदमी की बजाय एलिट नेतृत्व की बनी। हालांकि जंग ए मैदान में मोदी को इस बात का एहसास हो गया कि मिनी इंडिया बन चुके इन्द्रप्रस्थ का मूड कुछ अलग है और इसीलिए उन्होंने खुद पीछे हटने और सेनापति बदलने का निर्णय लिया लेकिन यह निर्णय आत्मघाती साबित हुआ क्योंकि दिल्ली प्रदेश के नेता व कार्यकर्ता इससे खीझ गये। इसके अलावा दिल्ली के नेताओं को दरकिनार कर केंद्रीय नेतृत्व का हावी होना, पूरे मंत्रिमंडल को चुनाव प्रचार में उतारना, बाहरी नेताओं पर ज्यादा भरोसा करना, उम्मीदवारों के नाम का ऐलान देर से करना, बिजली-पानी के मुद्दे को ज्यादा तरजीह न देना, पूर्ण राज्य के मुद्दे को भुला देना और विजन डॉक्यूमेंट मतदान से चंद रोज पहले लाना, ऐसे ढेरों हार के कारण हैं। लेकिन इन कारणों से कोई भी पार्टी जीत -हार सकती है, सपनों से परे एकतरफा जनादेश नहीं आ सकता!
दरअसल यह चुनाव जिस फिनॉमिना की हार है, दूसरी तरफ उसी फिनॉमिना की जीत भी है। अरविंद केजरीवाल ने वही किया जो कभी नरेंद्र मोदी ने किया था। लोगों को यह विश्वास दिलाया कि जो गलती हो गई उसे वे दोबारा नहीं करेंगे और जीते तो बिजली बिल हॉफ, पानी माफ, हर सिर को छत, युवाओं के लिए स्कूल -कॉलेज, वाई-फाई, रोजगार, संविदा वाले कर्मचारियों को पक्की नौकरी, महिलाओं को सुरक्षा, पूरी दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे और वो सारी सुविधाएं देंगे जो एक दिल्लीवासी को चाहिए। केजरीवाल ने वादों का पिटारा खोलते समय सिर्फ इस बात का ध्यान रखा कि लोगों को क्या चाहिए न कि यह कि वह क्या दे सकते हैं। उदारवाद की कोख से पैदा हुई नई पीढ़ी का मौजूदा दौर में निर्णायक दखल है और उसे चाहिए रोजगार और सुविधाएं, निचले तबके को चाहिए सस्ती बिजली, मुफ्त पानी और सिर ढकने के लिए छत, अल्पसंख्यकों को अपनी सुरक्षा की चिंता थी लिहाजा सबने मिलकर आप और उसके अगुआ अरविंद केजरीवाल को जिताने के लिए वोट दिया। कांग्रेस लड़ाई के पहले ही दिन से बाहर दिख रही थी इसलिए अल्पसंख्यकों ने अपना वोट खराब नहीं किया। इस जंग में आप ने निजी हमले और नकारात्मक प्रचार से अपने को दूर रखते हुए विकास व सुविधाओं पर अपने को केंद्रित रखा। उस लोकपाल को भी आखिरी पैदान पर रखा जिस पर वह पिछला चुनाव लड़े थे क्योंकि आम आदमी को रोजगार और सुविधाओं की दरकार थी। आप की शुरू से इस बात की कोशिश करती रही कि इस लड़ाई को केजरीवाल बनाम मोदी न बनने दिया जाए। उसे इस बात का एहसास था कि लोग खासतौर से युवा मोदी में मजबूत नेतृत्व व विकास पुरुष की छवि देखते हैं। भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनका रुख सख्त है लिहाजा आप ने अपनी वेबसाइट पर केंद्र में मोदी और दिल्ली में केजरीवाल का प्रचार किया। जबकि जीत के जुनून में भाजपा चूक कर गई, किरण बेदी को उतारने के बावजूद जब उसे लगा कि पार्टी कमजोर पड़ रही है तो उसने नरेंद्र मोदी रूपी ब्रह्मास्त्र को चला दिया। कॉस्मोपोलिटन दिल्ली या दूसरे शब्दों में मिनी इंडिया यह बात अच्छी तरह समझ रही थी कि नरेंद्र मोदी दिल्ली के मुख्यमंत्री हो नहीं सकते लिहाजा उसने अरविंद केजरीवाल में विश्वास व्यक्त किया। भाजपा बार-बार लड़ाई को मोदी बनाम केजरीवाल बनाती रही और केजरीवाल न सिर्फ उससे दूर भागते रहे बल्कि चेहरा और चरित्र से यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि वह मोदी और उनकी सेना के सामने कुछ नहीं हैं। एक आम आदमी भला उनसे कैसे मुकाबला कर सकता है। ऐसा करके केजरीवाल प्रतीकात्मक राजनीति व प्रचार करते रहे जिसने आम आदमी के स्वाभिमान को जगाया। शहरी राज्य होने की वजह से दिल्ली का मिजाज एकदम अलग है यहां का मतदाता ग्रामीण और शहरी में बंटने की बजाय गरीब शहरी और साधन संपन्न शहरी में बंट गया। पहला वर्ग जो कि लगभग पचहत्तर फीसदी है आप के साथ चला गया जबकि दूसरा भाजपा के साथ रहा। राजनीति संदेश से चलती है और इस परिणाम का संदेश यही है कि जो करेगा वही रहेगा, इंतजार के लिए किसी के पास वक्त नहीं है।
विद्याशंकर तिवारी (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार है )
परिचय- लेखक पिछले पच्चीस साल से पत्रकारीय लेखन कर रहे हैं। दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा जैसे राष्ट्रीय अखबारों में दिल्ली में मुख्य संवाददाता, मेट्रो संपादक, ब्यूरो प्रमुख, व राजनीतिक संपादक के रूप में कार्य करने के अलावा इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स में भी वरिष्ठ पदों पर रहे। वर्तमान में क्रोनिकल समूह की राजनीतिक पत्रिका प्रथम प्रवक्ता में कार्यकारी संपादक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। राजनीति, समाज व समसामयिक विषयों पर लेखन के साथ-साथ न्यूज चैनल्स पर होने वाली बहस में भी लेखक की भागीदारी रहती है।

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