भाजपा को केेंद्र में स्पष्ट बहुमत मिलने और कट्टरवादी छवि के बावजूद नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता स्थापित हो जाने से हिंदू संगठनों का मनोबल बौरा जाने की हद तक बढ़ गया था और उन्होंने एकदम संयम को तिलांजलि देकर विवादित हरकतों का ऐसा तूफान खड़ा किया कि भारत सारी दुनिया के निशाने पर आ गया। यह दूसरी बात है कि विश्व बिरादरी के पहाड़ के नीचे खड़े होने के बाद नरेंद्र मोदी को अपनी सीमाओं का अहसास हो जाने से गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपनाई गई नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी कारण उन्हें संघ प्रमुख को कई बार कहना पड़ा कि वे उनकी सरकार के मजबूती से पैर जमाने तक इस वानर सेना को वे काबू में रखने में सहायता करें। ऊपरी तौर पर संघ प्रमुख ने भले ही उनका सहयोग किया हो लेकिन जिस तरह की बयानबाजी उन्होंने खुद जारी रखी उससे उन्मादी हिंदू संगठनों को लगातार बल मिलता रहा। हालत यह हो गई कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा जिनका मोदी ने पलक पांवड़े बिछाकर दिल्ली में स्वागत किया था इस मुद्दे पर उनकी फजीहत करने से अपने को रोक नहीं सके। नई दिल्ली से रवाना होने के पहले सीरी फोर्ट आडीटोरियम में चुनिंदा लोगों की सभा में उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भारत में धार्मिक टकराव बढ़ा तो वह अपने को प्रगति की लीक पर बहुत दिनों तक कायम नहीं रख पाएगा।
जब ओबामा के इस भाषण को भाजपा समर्थित हिंदू संगठनों की गतिविधियों से जोड़ा गया तो भारत से नए नवेले संबंधों में दरार पैदा होने की बन रही आशंका को टालने के लिए अमेरिका ने यह स्पष्टीकरण दिया कि राष्ट्रपति के उक्त बयान को भाजपा के संदर्भ में नहींदेखा जाना चाहिए। इससे मोदी को थोड़ी-बहुत तसल्ली मिली ही थी कि अगले दिन ब्रेक फास्ट प्रेयर के भाषण में ओबामा ने फिर यह कहकर उनकी सरकार की साख पर गोला दाग दिया कि अगर महात्मा गांधी इस समय जीवित होते तो भारत में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता के कारण उन्हें गहरा सदमा लग गया होता। दिल्ली की हार के साथ ओबामा के बयान का यह आघात मोदी को पस्त करने वाला साबित हुआ है। इसी कारण मोदी ने आनन-फानन में दिल्ली में चर्च में हुई चोरी की घटना को लेकर पुलिस कमिश्नर को तलब किया और उन्हें चर्च व गिरजाघरों की पूरी हिफाजत करने के निर्देश दिए। जैसे इतना ही काफी नहीं था। इसके बाद ईसाइयों के एक कार्यक्रम में पहुंचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल ईसाइयों समेत देश के सभी अल्पसंख्यक समुदायों को उनकी सुरक्षा के बारे में आश्वस्त किया बल्कि यह कहने में भी गुरेज नहीं किया कि अगर धार्मिक उन्माद और हिंसा फैलाने की कोशिश की गई तो उनकी सरकार सख्त कार्रवाई करेगी।
नरेंद्र मोदी की फतह के बाद भारत को रातोंरात हिंदू राष्ट्र बना देने की गली-गली में घोषणा करते घूम रहे संघ परिवार और उनसे प्रेरित संगठनों के बुद्धिहीन नेताओं के लिए प्रधानमंत्री का यह बयान तमाचा की तरह है। गणतंत्र दिवस के दौरान जारी किए गए संविधान की प्रस्तावना के विज्ञापन में जानबूझकर दिखाई गई बाजीगरी से संघ परिवार को शायद यह भ्रम हो गया था कि धर्मनिरपेक्ष संविधान को उनका महाबली चुटकियों में बदल डालने में सक्षम है। दिक्कत यह है कि पूरा संघ परिवार इतिहास में जी रहा है। मध्यकाल का वह भारत आज के समय में आप्रासंगिक हो चुका है। आज नई संरचना का भारत है। ठीक उसी तरह जैसे पंद्रहवीं शताब्दी के पहले के अमेरिका और वर्तमान अमेरिका का अंतर। आज बाबी जिंदल कहते हैं कि उन्हें भारतीय मूल का अमेरिकन न कहकर सिर्फ अमेरिकन कहा जाए जबकि अमेरिकी नागरिक के तौर पर उनका रूपांतरण कई पीढिय़ों पुराना नहीं है। सिर्फ एक पीढ़ी पहले यानी उनके पिता अमेरिका चले गए थे और उन्होंने वहां की नागरिकता ले ली थी। आज अमेरिकन समाज के अधिकांश अगुवा ऐसे ही हैं जिनका मूल अमेरिकन से कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद वे अमेरिकन प्राइड की बात मजबूती से कहते हैं और उन्होंने राष्ट्रवाद की नई परिभाषा को गढ़ा है। दुनिया भर में हर देश का वर्तमान महत्वपूर्ण हो गया है और देश की दिशा उसी के आधार पर तय हो रही है। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो स्वाभाविक तौर पर उनकी दुनिया संकुचित थी। उनके कार्यकाल में गुजरात में हुए मुसलमानों के दमन से उन्हें उस समाज का हीरो बनने का मौका मिला जो रामराज का कायल है यानी जिसमें वर्ण व्यवस्था का अनुशासन अनुलंघनीय रहा है।
यह मोदी की बहुत बड़ी सफलता थी लेकिन राष्ट्रीय नेता की भूमिका में आने और उसके बाद मजबूत विश्व नेता के रूप में खुद को तराशने की जद्दोजहद के बीच मोदी के सोच का फलक व्यापक हुआ है और नजरिया भी काफी कुछ बदल गया है। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वे जिस तरह के जज्बाती थे प्रधानमंत्री के तौर पर वैश्विक वास्तविकताओं का दीदार करने और समझने के बाद उनके वह तेवर बरकरार नहीं रह गए हैं। गुजरात से दिल्ली आने तक की उथल-पुथल में वे देश की कई सामाजिक वास्तविकताओं से भी परिचित हुए हैं जिसमें यह भी है कि हिंदू राष्ट्र के स्थापित होने के माने उनके लिए क्या हो सकते हैं। धर्म को बहाल करने के लिए हिंदू राष्ट्र बनने पर हो सकता है कि उनकी बलि चढऩा अपरिहार्य हो जाए। दूसरे वे यह भी जानते हैं कि विश्व नेता की मान्यता उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए इस देश में कितनी मूल्यवान हैं। रूढि़वादी ताकतों का अपने प्रति मोहभंग का खतरा टालने के लिए विश्व नेता के रूप में स्वीकार्यता से उन्हें काफी मदद मिल सकती है इसलिए वे यह हैसियत हिंदू संगठनों के उत्पात के कारण गंवाने का जोखिम कभी भी मोल नहीं ले सकते।
मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के तत्काल बाद यह आभास कराया था कि वे राज्यों में वर्चस्व कायम किए ताकतों के साथ सामंजस्य बिठाकर काम करेंगे। कांग्रेस के सर्वग्राही सत्तावाद की तुलना में उनकी शैली दूसरे तरीके की होगी और वे आदर्श संघवाद को अपनी सरकार के तौरतरीकों में निभाएंगे लेकिन आठ महीने बाद ही उन्होंने यह लबादा उतार फेेंका है। सबसे पहले उनका दुराव समानधर्मी यानी हिंदूवाद का अनुसरण करने वाली क्षेत्रीय ताकतों से शुरू हुआ है। शिवसेना के साथ उनके बढ़ते मतभेदों के निहितार्थ को इसी रूप में देखा जाना चाहिए। वे महाराष्ट्र में अब शरद यादव के साथ पींगें बढ़ा रहे हैं जिन्हें प्रमुख बैकवर्ड लीडर माना जाता है। संघ परिवार मुस्लिम परस्ती की वजह से सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह से भारी खार खाए हुए है। अभी तक उसे उत्तर प्रदेश में अपने लिए कोई गुंजायश नजर नहीं आ रही थी जिससे मुलायम सिंह के साथ संबंध सुधारना उसकी मजबूरी हो गया था लेकिन जब से लोक सभा चुनाव में पार्टी को भारी सफलता मिली है हिंदूवादी संगठन मुलायम सिंह को सबसे बड़ा वर्गशत्रु मान रहे हैं। दूसरी ओर मोदी ने मुलायम सिंह से भी निजी दोस्ताना में नई गर्मजोशी भरने के लिए उनके पौत्र के तिलक समारोह में आने की इच्छा जता डाली है। मुलायम सिंह भी बैकवर्ड नेता हैं। नरेंद्र मोदी संघ परिवार और हिंदू एजेंडे से अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए जो नया तानाबाना बुन रहे हैं उससे भी पता चल जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने ऊंची चोटी से देश के सामाजिक भूगोल का विहंगावलोकन किया तो किस तरह की नई चेतना से वे लैस हो चुके हैं जिसका कड़वा स्वाद संघ परिवार के रूढि़वादी नेतृत्व को आने वाले दिनों में और ज्यादा चखना पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री के ताजा रुख पर संघ परिवार की कोई प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है क्योंकि पूरा संघ परिवार फिलहाल उनमें दिखी अप्रत्याशित बदलाव की झलक से फिलहाल स्तब्ध होगा। दूसरी ओर इस बीच एक घटना और हुई है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के कानपुर प्रवास के दौरान मुस्लिम उलेमाओं ने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की। पहले तो उन्होंने मुस्लिम उलेमाओं के अनुरोध को अनदेखा कर दिया था पर जब यह मामला मीडिया में आ गया तो संघ प्रमुख दबाव में आ गए। इसके बावजूद वह स्वयं उलेमाओं से नहीं मिले। उन्होंने संघ में अल्पसंख्यक मामले देख रहे इंद्रेश को यह जिम्मा सौंप दिया। इस मुलाकात में संघ को बेनकाब करने के लिए उलेमाओं ने छह सवाल पेश कर दिए जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि संघ का हिंदू राष्ट्र का खाका क्या है। अगर वह हिंदू धर्मग्रंथों पर आधारित है तो इसका मतलब है कि दलितों का मंदिरों में प्रवेश फिर वर्जित करना पड़ेगा। अगर संघ का हिंदू राष्ट्र इससे अलग है तो इसका मतलब होगा कि हिंदू धर्म में धार्मिक संस्कृति नहीं है। इंद्रेश इसका जवाब नहीं दे सके। मीडिया में भी इसे लेकर संघ की काफी किरकिरी हुई है। हिंदू धर्म शास्त्रों के आधार पर कल्पित हिंदू राष्ट्र में दलितों की ही नहीं समूचे शूद्र समुदाय की हैसियत दोयम दर्जे की हो सकती है। इस कारण इस सवाल का जवाब तो खुद मोदी साहब भी संघ प्रमुख से जानना चाहेंगे।
के पी सिंह
ओरई

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