समाजवादी पार्टी में क्षत्रिय नेतृत्व को लेकर आपस में ही ठन गई है। एक समय था जब राजा भैया समाजवादी पार्टी के क्षत्रिय चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट किए जा रहे थे लेकिन आजकल ग्राम्य विकास राज्य मंत्री अरविंद सिंह गोप पार्टी हाईकमान के चहेते बन गए हैं और राजा भैया की जगह उन्हें बढ़ाया जा रहा है जबकि राजा भैया हाशिए पर डाल दिए गए हैं।
महाराणा प्रताप जयंती पर क्षत्रिय भावनाओं का सम्मान करने के लिए अखिलेश सरकार द्वारा अवकाश की घोषणा के श्रेय को लेकर अरविंद सिंह गोप और राजा भैया खुलेआम एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए। एक ओर कई जिलों में प्रताप जयंती पर क्षत्रिय महासभाओं द्वारा कराए गए आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर अरविंद गोप ने अवकाश के लिए क्षत्रिय समाज की ओर से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आभार जताया। दूसरी ओर राजा भैया समर्थकों ने अरविंद गोप की काट में कोई कसर न रखते हुए पोस्टर और होर्डिंग लगवाकर यह साबित किया कि प्रताप जयंती पर छुट्टी राजा भैया के प्रयासों की देन है।
अरविंद गोप और राजा भैया के बीच चल रही इस खींचतान को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के परिवार में वर्चस्व को लेकर चल रही जंग से भी जोड़ा जा रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राजा भैया को उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि की वजह से शुरू से ही नापसंद करते हैं और प्रतापगढ़ में सीओ जियाउल हक की हत्या के बाद तो उन्हें राजा भैया से जैसे एलर्जी ही हो गई। मुलायम सिंह के दबाव में उन्होंने राजा भैया की मंत्रिमंडल में वापसी तो कर ली लेकिन राजा भैया की सरकार में वह प्रमुखता नहीं रह गई जो पहले देखी जाती थी। दूसरी ओर पार्टी को एक क्षत्रिय चेहरे की जरूरत भी थी। इस मामले में अरविंद गोप पर अखिलेश यादव ने इसलिए भरोसा किया कि उनकी पृष्ठभूमि राजनीतिक है। वे लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ से होकर मुख्य धारा की राजनीति में आए हैं। उनका कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है। नई पीढ़ी में हर समाज में नेतृत्व की स्वीकार्यता के लिए पैमाने बदले हुए हैं। इसी को ध्यान में रखकर अखिलेश हर जाति के चेहरे के बतौर उन लोगों को अपनाने के पक्षधर हैं जो अपेक्षाकृत निष्कलंक छवि के हों और साथ ही जिनकी पृष्ठभूमि राजनीतिक हो। जिनका विवादों से रिश्ता है उन सबको अखिलेश ने अपने जमाने में किनारे किया है। वे ऐसा ही सुलूक आजम खां के साथ भी करते लेकिन उन पर अखिलेश का जोर नहीं है।
राजा भैया के विरुद्ध उनकी प्रतिकूल भावनाओं के पीछे अमर सिंह का भी एक कोण है। अमर सिंह को लेकर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के परिवार में ही तमाम दांवपेंच खेले जा रहे हैं। शिवपाल सिंह उनकी खुलेआम पैरवी कर रहे हैं जबकि रामगोपाल जबरदस्त विरोध में हैं और यह भी स्पष्ट हो चुका है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पूरी तरीके से रामगोपाल के प्रभाव में हैं। राजा भैया के बारे में माना जाता है कि उनके गाडफादर आज भी अमर सिंह ही हैं। इस कारण उन्हें हैसियत में रखने के पैंतरे मुख्यमंत्री शुरू से ही आजमा रहे हैं। अरविंद सिंह गोप की क्षमताओं पर शुरू में उन्हें पूरा विश्वास नहीं था लेकिन अब जबकि अरविंद सिंह ने पूरे प्रदेश में अपनी जगह बना ली है तो उनके लिए गोप को आगे करके राजा भैया को बौनसायी करना सरल हो गया है।
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तक अखिलेश और रामगोपाल की पेशबंदी के आगे असहाय हो चुके हैं। उन्होंने कुछ समय पहले अपने आवास पर पूरे परिवार को इकट्ठा किया था। इसके एक दिन पहले उनकी अमर सिंह से लंबी बातचीत हुई थी। इसी को लेकर वे अमर सिंह की पार्टी में वापसी के लिए परिवार में माहौल बनाना चाहते थे लेकिन रामगोपाल ने अब खुलेआम इसको नकार कर मुलायम सिंह को एक तरह से चुनौती सी दे डाली है। इतना ही नहीं जनता दल परिवार के महाविलय से राज्य सभा में उनका नेता पद छिन जाने के जो आसार बन रहे थे उससे बिफर कर रामगोपाल ने यह भी कह दिया कि बिहार विधान सभा के चुनाव होने के पहले तक महाविलय संभव नहीं है। अप्रत्याशित रूप से लालू उनके साथ आ गए हैं। इससे पहले मुलायम सिंह यादव महाविलय को लेकर जिस तरह से दृढ़ता के साथ इसे अंतिम फैसला घोषित कर चुके थे उसको देखते हुए अनुमान यह था कि अब पार्टी में किसी की हिम्मत नहीं होगी कि इसमें अड़ंगेबाजी करे पर रामगोपाल ने खुलेआम उनके फैसले को नकार दिया और मुलायम सिंह की बोलती बंद है। परिवार के अंदर की यह अदावत समाजवादी पार्टी के भविष्य को आखिर कहां ले जाएगी यह सियासी पंडितों के लिए अटकल का विषय है लेकिन फिलहाल तो राजा भैया के धुंधले चल रहे सितारे अरविंद सिंह गोप के अचानक तेजी से दैदीप्यमान होने के कारण अस्ताचल में डूबते नजर आ रहे हैं। आगे जो भी हो।
के पी सिंह
औरई
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें