किसी स्कूल की खास बात को, नवाचार को जस का तस आपके सामने दृष्य रूप में प्रस्तुत कर पाऊंगा या नहीं इस बात की चिंता ना करते हुए आखों देखी सुनाता हंू। जनपद बागेष्वर, ब्लाॅक गरूड़, के जूनियर हाईस्कूल पिंगलों की, गरूड़ विकास खण्ड से 12 किमी. दूर ग्वालदम-गरूड़ मार्ग से लिंक रोड द्वारा पिंगलो घाटी तक कच्ची-पक्की सड़क है। दूर-दूर छिटके घर, चारों ओर से कम ऊॅचे पहाड़ और खेतों की कतार जिसे कुमाॅउनी बोली में स्यार कहा जाता है, इस क्षेत्र की खुबसुरती में चार चांध लगा रहे हैं। जूनियर हाईस्कूल पिंगलो जहां पर अवस्थित है उसके आस-पास एक इण्टर काॅलेज, एक प्राइवेट स्कूल और सरकारी प्राथमिक विद्यालय है। सड़क से 200 मीटर दूर चढ़ाई पर चीड़ के जंगल के बीच स्कूल मजबूत चाहरदीवारी और बड़े से गेट के कारण दूर से ही पहचाना जाता है। चढ़ाई चढ़कर जैसे ही स्कूल गेट पार करके पहला कदम स्कूल के प्रांगण में पड़ता है तो सरकारी षिक्षा व्यवस्था के प्रति बनी तमाम मान्यताएं उड़न छू हो जाती हैं। सफेद कंकड़ों से बड़े से पत्थर पर बड़े सजावटी ढ़ंग से स्वागतम् लिखा है। प्रांगण के चारों ओर पुश्प वाटिका लगी हैं। वाटिका की सुरक्षा के लिए ईंट और लकड़ी से बाड़ की गई हैं। पुराने कनस्तरांे, पानी की बोतलों, मिट्टी के गमलों और लोहे की बाल्टियों का उपयोग बरामदे के किनारे फूल उगाने के लिए किया गया है। विभिन्न किस्म के छायादार-फलदार वृक्ष स्कूल में रोपे गये हैं। उनको समय-समय पर बारी-बारी से पानी दिया जाता है।
जैसे ही मैं स्कूल पहुंचा तो बच्चे प्रार्थना सभा के बाद कक्षा-कक्ष में बैठ चुके थे। कक्षा-कक्ष में बैठक व्यवस्था षानदार है। कक्षा की दीवारें जैसे अभी बोल उठें या कहा जाये कि जिन्दा दीवारें हैं। बड़ी सुन्दर कलाकृतियां दीवारों पर उकेरी गई हैं। दीवार के एक बड़े हिस्से में बच्चों की रचनात्मकता और उनकी विशयगत दक्षता का जीवन्त प्रमाण दीवार पर चस्पा है। दो अलग-अलग हिस्सों में बैठने की बजाय लड़के-लड़कियां सामूहिक रूप में बैठे हैं। इस बैठक व्यवस्था में एक स्तर की समानता का पुट दिखता है। बच्चों में आपसी सम्मान और धैर्य की समझ भी विकसित हो रही है। इस बात का पता कैसे चला? मैं पहले से कोई खास तैयारी करके नहीं गया था। क्योंकी कक्षा में बच्चों के साथ बात करने की योजना नहीं थी। बहरहाल बातों-बातों में परिचय के दौरान गंाव और षहर के स्कूली वातावरण पर एक बच्चे ने पूछ लिया कि गांव का सरकारी स्कूल अच्छा या षहर का प्राइवेट स्कूल? क्या वहां भी यही पढ़ाया जाता है जो हमें गुरूजी यहां पढ़ाते हैं? सवाल को बच्चों की ओर आगे बढ़ाते हुए मंैने बच्चों से ही सुनना चाहा कि उनका स्कूल क्यों अच्छा है? बच्चे बारी-बारी से हाथ उठा कर अपनी-अपनी बात रखते जाते, ऐसा हुआ ही नहीं कि सब एक साथ उत्सुकता से बोल पड़े और अपनी बात सबसे पहले रखने की होड़ में हों। इस बीच दो बच्चों ने एक साथ हाथ खड़ा किया और दोनों साथ में बोल उठे। पहले बच्चे को जैसे ही यह लगा कि सामने वाले ने पहले हाथ उठाया तो वह रूक गया और बड़े आदर से उसने अपने साथी से कहा तुमने पहले हाथ उठाया मुझसे पहले तुम बोलो। सामान्य तौर पर यह एक छोटी सी घटना है लेकिन इस घटना ने बच्चों के बीच मौजूद मूल्यों की बानगी दिखा दी थी। कक्षा-कक्ष के बाहर भी कुछ बच्चे छोटे-छोटे समूहों में बैठे हैं। इनके पास एक-एक चार्ट पेपर है। कुछ स्कैच पैन हैं। बच्चे कोई लेख पढ़कर उस पर चर्चा कर रहे हैं। चर्चा के बाद स्वयं ही किसी एक को चुनते हैं जो बड़े समूह में प्रस्तुतिकरण देगा। सामूहिक रूप से सीखने की परम्परा भी बन रही है जिसमें रोज नये प्रयोग और तरीके जुड़ते जाएंगे। कोई बच्चा चार्ट में लिख रहा है। तो कोई बात-चीत को स्वयं पहल लेकर आगे बढ़ा रहा है। सामूहिक रूप से सीखने की दिषा में यह एक अभिनव प्रयोग कहा जा सकता है। बच्चों से बात-चीत के दौरान कुछ षब्दों की ओर ध्यान आकर्शित हुआ जैसे- अनुषासन, आदत का बनना, भय रहित षिक्षण और स्कूली स्वायत्ता। इन षब्दोें के साथ बच्चों से फिर मिलने की बात कह और उनका धन्यवाद कह कर मैं कक्षा से बाहर आया और षिक्षक से मिला। बहुत सी बातें स्कूल के सन्दर्भ में हुई और इस बीच षिक्षक ने मुझे स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक में आने का आग्रह किया। अवष्य सर, मेरे लिए एक नया अवसर होगा। रटा-रटाया जुमला कह कर मैं स्कूल से निकल गया।
ठीक एक सप्ताह बाद मैं पुनः स्कूल पहुंचा लेकिन इस बार एक संकुल समन्वयक भी मेरे साथ थे। यह देखने के लिए कि स्कूल मैनेजमेंट कमेटी और स्कूल में कार्यरत षिक्षक ऐसा क्या खास कर रहे हंै कि सब ओर चर्चा है। ठीक दस बजे बैठक षुरू हुई। 170 अभिभावक इस बैठक में षामिल हो चुके थे, इनमें महिलाओं की संख्या अधिक थी। कुछ और आ ही रहे थे। लोगों की उपस्थिति को दर्ज करने के लिए दो छात्र एक पंजिका लेकर घूम रहे थे। बैठक की सभी व्यवस्था विद्यार्थियों के सुपुर्द थी। इनका साथ दे रहे थे गाॅव के कुछ युवक जो सम्भवतः इसी विद्यालय से पढ़े थे। दोनों षिक्षक साथी बारी-बारी से कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। बैठक में जिला पंचायत सदस्य, खण्ड षिक्षा अधिकारी सहित विधायक प्रतिनिधि भी मौजूद थे। कुछ देर घोशणाओं का दौर चला। लेकिन सबसे प्रभावषाली बात यह लगी कि अभिभावकों ने स्वयं की पहल से विद्यालय के लिए दरी, कम्प्यूटर, व्हाईट बोर्ड, आदि खरीदा था। जनप्रतिनिधियों से पुस्तकालय के लिए पुस्तकें उपलब्ध कराने की बात हो चुकी थी। बैठक के दौरान बच्चो ने चाय-बिस्कुट भी बाटें, पानी भी सभी को पिलाया। दो सौ के करीब लोगों के समूह को बच्चों की टोली व्यवस्थित रूप से देख रही थी। इन कार्यों को करने में बच्चों की दक्षता झलक रही है। उनका आत्मविष्वास भी बढ़ रहा है। किसी कार्यक्रम को कुषलता के साथ करने की दक्षता भी बढ़ रही है। इस बीच स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष ने एक प्रस्ताव रखा जिसे सभी ने सराहा। क्या था यह प्रस्ताव? प्रस्ताव था बच्चों द्वारा स्कूल परिसर को स्वच्छ रखने के सन्दर्भ में। बच्चों के साथ बारी-बारी से दो-दो की संख्या में अभिभावक भी रोजाना प्रार्थना सत्र में षामिल रहें और साथ ही स्वच्छता में भी। इससे दो लाभ हुए, 22 समूह बने। प्रत्येक समूह में दो लोग षामिल थे। बारी-बारी से यह स्कूल आने लगे और बच्चो के साथ झाड़ू-पोछे से लेकर कक्षा-कक्ष की स्वच्छता में योगदान करने लगे। अभिभावक का भरोसा बनाने और स्कूल को एक नई दिषा देने में दोनों षिक्षकों की मेहनत और उनकी रचनावादिता का महत्वपूर्ण योगदान है। मैं इस दृष्य को अपनी आॅखों के सामने घटता देख रहा था। वास्तव में यह बदलाव की ओर जाता हुआ एक सफल प्रयोग है जो अब धीरे-धीरे कई सुधारों के साथ कक्षा-कक्ष और लोकजीवन का व्यवहार बनने लगा है।
विपिन जोषी
(चरखा फीचर्स)


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें