यह एक सच्चाई है कि खर्च करने से सारी चीज़े खत्म हो जाती हैं। माल, दौलत, पैसा, खज़ाने इन चीज़ों से अगर ज़मीन व आसमान के बीच का रिक्त स्थान भर भी दिया जाए और मनुश्य थोड़ा-थोड़ा करके इसमें से खर्च करता रहे तो यह बात पूरे विष्वास से कही जा सकती है कि यह सब कुछ खत्म हो जाएगा। लेकिन यह बात 100 प्रतिषत सच है कि ज्ञान एक ऐसी पूंजी है जिसको जितना खर्च किया जाए उतना ही इसमें बढ़ोत्तरी होती है। वैसे तो आज़ादी के 67 सालों के बाद हमारे देष की षिक्षा व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है लेकिन सीमावर्ती और दूर-दराज़ क्षेत्रों में षिक्षा व्यवस्था की बात की जाए तो स्थिति बहुत अच्छी नज़र नहीं आती। भारत सरकार ने देष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य षिक्षा देने के लिए कानून बना रखा है ताकि सभी बच्चे षिक्षा हासिल कर सकें। मगर देष के ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में षिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति को देखकर लगता है कि सरकार जिस सपने को सच में बदलना चाहती है उसके पूरे होने की संभावना बहुत कम नज़र आती है। जम्मू प्रांत के सीमावर्ती जि़ले पुंछ में भी सरकार की लाख कोषिषों के बाद भी यहां षिक्षा की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। सरकार की ओर से षिक्षा की स्थिति में बदलाव लाने के लिए योजनाएं तो बहुत सारी चल रही हैं लेकिन पुंछ जैसे दूरदराज़ क्षेत्र तक पहुंचते पहुंचते यह योजनाएं दम तोड़ देती हैं। अगर यह सब इसी तरह चलता तो देष के पूर्व राश्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का वह सपना पूरा नहीं हो पाएगा जो उन्होंने 2020 तक सबको षिक्षित होने का देखा था।
पुंछ जि़ले की तहसील मंडी का अड़ाई गांव वैसे तो प्रकृति के अनमोल सुदंरता से मालामाल है लेकिन षिक्षा के मामले में यह गांव काफी पिछड़ा हुआ है। इस गांव में तीन पंचायतें हैं जिनमें अड़ाई मलकां, अड़ाई हवेली और अड़ाई पीरां षामिल हैं। इस गांव की जनसंख्या लगभग 14 हज़ार है। इस गांव के बीचों बीच से एक नदी गुज़रती हैै जिसकी वजह से लोगों को आने जाने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस नदी के कारण यहां के बच्चे षिक्षा से वंचित हो रहे हैं। नदी को पार करके बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। बरसात के दिनों मेें नदी में पानी बढ़ जाने के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। नदी में गिरने के कारण हर साल कोई न कोई दुर्घटना सामने आती रहती है। इस गांव की एक पंचायत को छोड़कर बाकी दो पंचायतों में अभी भी रोड नहीं है और न ही नदी के एक पार से दूसरी पार जाने के लिए किसी पुल का निर्माण हुआ है। इस बारे में स्थानीय मोहम्मद षफी (60) कहते हैं कि-‘‘अड़ाई कटठ्ा से बन और बज्जा अंदरवाला तक 12 किलोमीटर तक इस नदी पर सिर्फ दो ही पुल हैं जिसके कारणे लोगों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यह नदी तोती, सैलां, गली, अंदरवाला और राहवाला से निकलकर अड़ाई कटठ्ा पहुंचकर लोरन से मिल जाता है।’’
मोहम्मद इकराम (48) के मुताबिक-‘‘गांव के लगभग 250 से 300 छात्र-छात्राएं इस नदी के दोनों ओर के स्कूलों जिनमें हाईस्कूल अड़ाई पीरां, हाईस्कूल अड़ाई मलकां, मिडिल स्कूल हवेली, प्राईमरी स्कूल बटनाड़ा, हायर सेकेंडरी स्कूल ब्वाएज़ मंडी और हायर सेकेंडरी स्कूल गल्र्स षामिल, पढ़ने जाते हैं। इस नदी को पार करने में किसी भी नौजवान मनुश्य को बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है तो ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि इन बच्चों को रोज़ाना स्कूल में पढ़ाई के लिए नदी पार करके जाने में कितनी कठिनाई होती होगी।’’ यह गांव चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है। जंगल बहुत ज़्यादा होने के कारण यहां आमतौर से मौसम खराब ही रहता है। बरसात के दिनों में इस नदी में पानी बहुत ज़्यादा भर जाता है। जिसके कारण नदी को पार करना बच्चों, बूढ़ों और औरतों के लिए आसान नहीं होता है। बरसात के दिनों में नदी में पानी अधिक होने के कारण छात्र-छात्राएं स्कूल नहीं जा पाते जिसके कारण बरसात के मौसम में स्कूलों में बच्चों उपस्थिति न के बराबर रहती है। खासतौर से छात्राएं नदी पार न करने के कारण स्कूल नहीं आती है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि स्कूल में पढ़ाई न होने के कारण बच्चे परीक्षा में फेल हो जाते हैं। फेल हो जाने के कारण यहां के अधिकतर बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़कर मज़दूरी करने लगते हैं। दो वक्त की रोटी के लिए कम उम्री में ही मज़दूरी षुरू करके यह बच्चे अपना बचपन दांव पर लगाकर दर-दर की ठोकरे खाते है। जिससे इनके बचपन के साथ साथ इनकी जवानी भी बर्बाद हो रही है। इसके अतिरिक्त पुल न होने के कारण बहुत से माल-मवेषी नाले को पार करते समय डूब जाते हैं। उपसरपंच मोहम्म्द असलम मलिक, हाजी मुमताज़ हुसैन मलिक, मौलवी फरीद मलिक, हाजी मोहम्मद अय्यूब चैहान और बहुत सारे दूसरे गणमान्य लोगों ने बताया कि इस नाले पर पुल न होने के कारण आए दिन बच्चे दुर्घटना का षिकार होते रहते हैं।
एक ऐसा ही दिल दहला देने वाली दुर्घटना नदी पर पुल न होने के कारण मोहम्मद इकबाल के दो बच्चों के साथ 17 मई, 2014 को हुआ था। मोहम्मद इकबाल की लड़की नजमा बानो और लड़का मोहम्मद ताहिर पहली और दूसरी कक्षा में गवर्नमेंट प्राईमरी स्कूल बटनाड़ी में पढ़ते थे। स्कूल की छुट्टी के बाद दोनों घर वापस आ रहे थे कि रास्ते में मरड़ी नामक जगह पर नदी को पार करते समय पानी की धारा के साथ बह गए। उस समय नदी में पानी का बहाव बहुत तेज़ था। बच्चों ने बचने की बहुत कोषिष की लेकिन वह नदी की धारा के तेज़ बहाव के सामने कमज़ोर हो गए। नदी की तेज़ धारा ने दोनों को एकदम अपनी चपेट में ले लिया। मोहम्मद ताहिर किसी तरह 20 मीटर दूर एक पत्थर से टकराकर रूक गया जहां से उसे निकाल लिया गया। लेकिन नजमा बानो नदी की तेज़ धारा में बहकर लगभग 200 मीटर दूर बड़े-बड़े पत्थरों के बीच में जाकर फंस गई। बहुत तलाष करने के बाद इस बच्ची को निकालकर अधमरी हालात में मंडी अस्पताल पहुंचाया गया जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोशित कर दिया। मोहम्मद अहमद जिसने इस बच्ची को बाहर निकाला था वह इस बच्ची को पानी से बाहर निकलने में कामयाब तो हुआ मगर वह खुद भी बुरी तरह ज़ख्मी हो गया था। यह दुर्घटना अड़ाई की जनता के लिए एक दिल दहलाने वाला दुर्घटना थी। उस बच्ची के माता-पिता पर क्या गुज़री होगी जो स्कूल से बच्चों के आने का इंतेज़ार कर रहे होंगे और उन्हें यह खबर मिली होगी? इसकी पीड़ा वही समझ सकते हैं जिसने इस प्रकार की पीड़ा का अनुभव किया है। अतीत में भी इस तरह के हादसे सामने आते रहे हैं। लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। क्या इस गांव की जनता के साथ यही न्याय है? क्या इस गांव की जनता को सिर्फ वादों पर ही पाला जाता रहेगा? क्या मरने वाली बच्ची के माता-पिता की कुछ इच्छाएं नहीं थीं ? क्या जिस मां ने अपनी बच्ची के बालों में तेल लगाकर, कंघी करके और वर्दी पहनाकर स्कूल भेजा था, क्या उसने कभी सोचा था कि षाम को उसे अपनी बच्ची को कफन पहनाकर कब्र के हवाले करना पड़ेगा? क्या यहां के लोग अपनों को खोकर यूं ही आंसू बहाते रहेंगे? क्या उनकी मांगों को नहीं माना जाएगा? यह वह सवाल है जो यहां की जनता की ज़बान पर हमेषा रहते हैं। यहां नाले पर पुल न होने से लोगों का दो तरह से नुकसान हो रहा है। एक तो आमजन जिन्हें पुल न होने के कारण भिन्न-भिन्न परेषानियो ंका सामना करना पड़ता है दूसरा बच्चों की षिक्षा पर पड़ने वाला प्रभाव। अगर पुल का निर्माण हो जाए तो सारी समस्याएं स्वतः खत्म जाएंगी। मगर कोई भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि इस समस्या को सुनने को तैयार ही नहीं है। मीडिया के ज़रिए भी न जाने इस मामले को कई बार उजागर किया जा चुका है। लेकिन समस्या का अब तक कोई हल नहीं निकल सका है। अब तो लोगों की उम्मीदें भी जबाब दे गई हैं। बस इस उम्मीद के साथ लोग जिंदगी के सफर में आगे बढ़ रहे हैं कि कभी तो नाले पर पुल का निर्माण होगा।
मोहम्मद रियाज़ मलिक
(चरखा फीचर्स)

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