विशेष आलेख : कैसे जोगेंद्र के परिवार को साधा मुख्यमंत्री ने - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 23 जून 2015

विशेष आलेख : कैसे जोगेंद्र के परिवार को साधा मुख्यमंत्री ने

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उत्तर प्रदेश की सरकार इन दिनों तमाम राजनीतिक मुश्किलों से घिरी हुई है। विधान सभा चुनाव की तैयारी डेढ़ वर्ष पहले से ही मजबूती के साथ शुरू करने वाले सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का सांगठनिक पराक्रम नई बनी परिस्थितियों में निस्तेज नजर आ रहा है। अखिलेश सरकार के लिए गले की हड्डी बने तमाम मामलों में सबसे ज्यादा गरम मामला शाहजहांपुर के सोशल मीडिया पत्रकार जोगेंद्र सिंह की जला कर हत्या किए जाने का है। हालांकि यह साफ नहीं है कि उनकी हत्या हुई या उन्होंने खुद ही अपने आप को जला लिया है लेकिन इस मामले में उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी राममूर्ति वर्मा भी नामजद हैं और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ïउन्हें हटाना नहीं चाहते। पहले तो उन्होंने इस मामले को नजरअंदाज करके दफन कर देने की रणनीति अपनाई थी लेकिन यह पैंतरा उन्हें चक्रव्यूह में घेरने का कारण बन गया। राजभवन ने इसमें अत्यधिक सक्रियता दिखाई। यहां तक कि राज्यपाल राम नाइक ने अखिलेश यादव को इस मुद्दे पर राजभवन में तलब कर लिया। उधर हाईकोर्ट में एक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर अदालत ने उनसे 16 जून को एक सप्ताह के अंदर 8 जून को पत्रकार के साथ हुए उक्त हादसे की स्थिति रिपोर्ट मांग ली। सबसे बड़ी मुश्किल तब हुई जब कल सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के पत्रकार सतीश की याचिका पर केेंद्र और राज्य सरकार दोनों से दो सप्ताह में यह जवाब दाखिल करने को कहा कि क्यों न इस मामले को सीबीआई को जांच के लिए सुपुर्द कर दिया जाए।

इसके बाद मुख्यमंत्री के सामने अपनी सरकार की फजीहत बचाने के लिए जोगेंद्र सिंह के परिजनों को संतुष्ट करके सरकार के पक्ष में करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। कल तक जोगेंद्र सिंह के पिता और पत्नी जब गांव में अनशन पर बैठे थे तो सरकार ने उनकी परवाह नहीं की थी। यहां तक कि भारतीय प्रेस परिषद की ज्यूरी के सदस्यों ने भी जब उनसे मुलाकात की तब भी राज्य सरकार और उसका प्रशासन अपने गुमान में चूर रहा लेकिन सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लगा कि अब ज्यादा देरी सरकार के अस्तित्व पर भारी साबित होगी। सरकार के दूतों ने आखिर कल पूरे दिन श्रम किया और आज वे जोगेंद्र सिंह के पिता व बेटे को लखनऊ लाने में सफल हो गए। मुख्यमंत्री ने अपने आवास पर तीस लाख रुपए की आर्थिक सहायता उन्हें मंजूर करने की घोषणा की साथ ही जोगेंद्र सिंह के दोनों बेटों को सरकारी नौकरी देने का भी वादा कर दिया है। इसके बाद जोगेंद्र सिंह के पिता द्वारा अनिश्चितकालीन आंदोलन स्थगित कर देना लाजिमी था।
सरकार की इस पेशबंदी से लगता है कि अब इस मामले की जांच राज्य सरकार की ही एजेंसी करेगी। भले ही जिला पुलिस की जगह जांच सीबीआई को सौंप दी जाए। 

बीबीसी जैसी विश्वसनीय विश्व समाचार सेवा ने लिखा है कि जोगेंद्र सिंह शाहजहांपुर में सपा के दो नेताओं की भिड़ंत का मोहरा बन गए। जब उन्होंने राममूर्ति वर्मा के खिलाफ अंधाधुंध लिखना शुरू किया तो सारे शाहजहांपुर में यह प्रचार था कि वे यह काम पूर्व विधायक देवेंद्र पाल सिंह के इशारे पर कर रहे हैं जो कि राममूर्ति वर्मा की वजह से उनकी सीट छिन जाने के कारण उनसे खफा हैं। उसके बाद राममूर्ति वर्मा ने जोगेंद्र सिंह को सबक सिखाने के लिए उनके एक पूर्व साथी अमित भदौरिया को डमी पत्रकार के रूप में खड़ा किया। उसने देवेंद्र पाल सिंह के खिलाफ लिखने के साथ-साथ जोगेंद्र सिंह को मुकदमे में भी फांस दिया। इसके बाद जोगेंद्र सिंह की अपने घर जलने से मौत कैसे हुई इसे जांच का विषय कहा जा सकता है लेकिन राममूर्ति वर्मा के प्रभाव की वजह से ही अमित भदौरिया के संदिग्ध मुकदमे में पुलिस ने उनके घर गैर जरूरी दबिश दी थी। मामला यहीं से बिगड़ा। अगर राममूर्ति वर्मा में राजनीतिक सूझबूझ होती तो वे संयम से काम लेते और जोगेंद्र को सबक सिखाने के लिए इस तरह पुलिस का दुरुपयोग नहीं करते। इसमें उनके राजनीतिक कैरियर के लिए खतरे की स्थितियां पैदा हो जाने का अंदेशा पहले ही था। उन्होंने वास्तव में पुलिस को जोगेंद्र सिंह की जला कर हत्या के लिए प्रेरित किया है या नहीं लेकिन वे कहीं न कहीं मुख्यमंत्री को मुश्किल में डालने के जिम्मेदार तो हैं ही और इस समय राजनीतिक नजाकत का भी तकाजा यह है कि उनके मंत्री पद की बलि लेने में मुख्यमंत्री को कदापि देर नहीं करनी चाहिए। 

शायद ऐसा होगा भी। उधर जोगेंद्र सिंह की महिला मित्र जो कि उनके जलने के घटनाचक्र की चश्मदीद है उसने अदालत के सामने कलमबंद बयान में जोगेंद्र द्वारा खुद अपने को आग लगाने की बात कही गई है। हालांकि उसका यह बयान पूर्व कथन से एकदम उलटा है लेकिन न्याय हित में सभी बयानों और परिस्थितियों पर गौर करना होगा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मन में भी जोगेंद्र सिंह के मामले में परस्पर विरोधी तथ्यों के सामने आने से स्वाभाविक दुविधा रही। इसी कारण उन्होंने अभी तक राममूर्ति वर्मा का जो संरक्षण किया उसके लिए एकदम से नहीं कहा जा सकता कि उनका कोई जानबूझकर दुराशय इसमें रहा होगा। जोगेंद्र सिंह के मामले से हमेशा की तरह एक बार फिर पत्रकारों के लिए आचार संहिता का सवाल जिंदा हो गया है। पत्रकारों से सभी वर्ग इसलिए आतंकित रहते हैं कि उनके पास सभी को बेनकाब करने की सुविधा उपलब्ध है पर इसके साथ साथ उनके ऊपर एक बड़ी जिम्मेदारी भी आ पड़ती है कि वे खुद के किसी आचरण को विवादों की फेहरिस्त में गिनने का अवसर तैयार न करें। पत्रकार की सबसे बड़ी सुरक्षा और संबल लोगों में उनके प्रति भरोसे का है जो पत्रकार के विवादित होने और प्रेरित होकर खबर लिखने से टूटता है। साथ ही पत्रकारों को अपने लेखन में भाषा के प्रति बहुत सतर्कता बरतने की जरूरत होनी चाहिए। वह अश्लीलता की हद तक आक्रामक हुए बिना भी किसी की कठोर आलोचना कर सकता है बशर्ते उसकी भाषा पर पकड़ हो जो एक पत्रकार के तौर पर उसके लिए निहायत जरूरी है।

बहरहाल जोगेंद्र सिंह हत्याकांड मामले का तो अखिलेश सरकार के लिए सुखद पटाक्षेप हुआ मालूम पड़ता है लेकिन विधान परिषद में मनोनयन के लिए उनके द्वारा प्रस्तावित सूची में शामिल संजय सेठ पर पड़े आयकर के छापे और आर्थिक अपराधों में उनकी अनुमानित की जा रही बड़ी संलिप्तता व आगरा के एक ठग शैलेंद्र अग्रवाल के साथियों और सहयोगी के रूप में दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों की भूमिका का उजागर होना यह मुद्दे अभी भी उनका पीछा कर रहे हैं और इनमें राजभवन अथवा अदालत का ज्यादा जोर न पडऩे की वजह से मुख्यमंत्री सम्यक निर्णय लेने में कोताही कर रहे हैं जो निश्चित रूप से उन्हें दागदार कर रहा है।



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के  पी  सिंह
ओरई 

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