विशेष : अपनी बात - ओह! मेरे भगवान, आप कहां हो ? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 28 जून 2015

विशेष : अपनी बात - ओह! मेरे भगवान, आप कहां हो ?

ओह! मेरे भगवान, आप कहां हो ?

भगवान ने जवाब दिया - ‘मैं तुम्हारे अन्दर ही तो हूं, परन्तु तुमने मेरे लिये कोई जगह ही नही छोड़ी है। जब भी तुम मन मे खाली हो, अकेले हों, पूर्णतः अह्म-विहीन जागृति मे हों, तभी मैं प्रकट हो जाता हूं।‘वस्तुतः ईश्वर कोई वस्तु नही है जिसे कहीं से खींचकर लाया जा सके और न ही उसके लिये किसी स्थान विशेष पर जाने की आवश्यकता है। ईश्वर हमारे मन की उस स्थिति मे आभासित होता है जब हम ‘अपने-स्वयं‘ की चेतना मे जागृत रहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति उसके अस्तित्व का आभास कर सकता है। ईश्वर का वास हमारी आस्था में है और यह हम पर निर्भर करता है कि हमारी आस्था उसमें कितनी दृंढ़ता के साथ है। सामान्यतया हम देखते हैं कि व्यक्तियों मे, ईश्वर के अस्तित्व की आस्था अधिकतर उनकी इच्छाओं की पूर्ति होने की शर्त पर ही निर्भर करती है। इस कारण उन्हे अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होने का भय होने के कारण ही वे ईश्वर के अस्तित्व मे विश्वास रखते है और उनके लिये, भय के कारण से ही ईश्वर का अस्तित्व है। 

इच्छाओं की पूर्ति हुई तो उनके लिये ईश्वर है और इच्छाओं की पूर्ति यदि नही हुई तो ईश्वर के प्रति उनकी आस्था कमजोर हो जाती है और फट से वे मंन्दिर बदल लेते हैं। ईश्वर के प्रति आस्था आशावादी दृष्टिकोंण के साथ दंृढ़तापूर्वक होना चाहिये। इच्छा-पूर्ति मे संशय और निराशा हमारी कामना को कमजोर करती है। कोई भी इच्छा निराशावादी भाव के साथ होने पर वह निरर्थक हो जाती है। हम अपनी कामना को शंका-रहित  हो कर ईश्वर के समक्ष दृंढ़ आस्था के साथ प्रस्तुत नही करते हैं और ईश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध मे शंका का भाव लिये रहते हैं, परिणामतः एक निराशा बनी रहती है। सामान्यतया हम उसके अस्तित्व का अनुभव नही कर रहे हंै, जबकि वह प्रत्येक क्षंण हमारे समक्ष है। प्रत्येक दिन वृक्षों पर हरी-हरी, पत्तियां विभिन्न प्रकार के सुगंधित, सुन्दर पुष्प, इनमे विभिन्न प्रकार के परिवर्तन नवीनता के रंग कौन भर रहा हैं ? 

भले ही इसकी प्रक्रिया के सम्बन्ध मे वैज्ञानिक विश्लेषणात्मक स्पष्टीकरण बता दिया जावे, परन्तु वह पर्याप्त नही है। कुछ दार्शनिक, ईश्वर को ऊर्जा (एनर्जी) अथवा चेतना के स्वरूप मे मानते है, ऊर्जा को कभी स्पर्श नही किया जा सकता, इसे कभी देखा नही जा सकता और न ही किसी स्थान विशेष पर इसे रखा जा सकता है। जिस तरह विद्युत बल्ब से होने वाला प्रकाश विद्युत की उत्पत्ति है, वह विद्युत नही है, और हम विद्युत को स्पर्श भी नही कर सकते। उसी तरह सम्पूर्ण प्रकृति ऊर्जा की उत्पत्ति है दूसरे शव्दों मे ईश्वर की उत्पत्ति हैं। ल्यूसिले गेमब्रेल ने कहा है ’’आप इस पृथ्वी पर ईश्वर के एक अनुपम उपहार हैं। आप एक चमकते हुये सितारें हंैं। जब आप स्वयं को आयना के समक्ष प्रत्येक दिन सुबह देखते हंै तो अपने आप से कहें ‘मैं संभावना हूं, मैं आनन्द हूं, मैं मुक्त हूं, मैं प्रसन्न हूं, मैं प्रेम हूं और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मैं ‘‘हूं‘‘।
                         

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लेखक- राजेन्द्र तिवारी, 
अभिभाषक, छोटा बाजार दतिया
फोन- 07522-238333, 9425116738
नोट:- लेखक एक वरिष्ठ अभिभाषक एवं राजनीतिक, सामाजिक व प्रशासनिक विषयों के समालोचक हैं। 

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