दया....दया ....दया......दया...आखिर दया-याचिका किसके लिए? दया की प्रक्रिया किसके ऊपर लागू होना चाहिए? क्या लोकतंत्र में वैसे आतंकियो के लिए दया की गुंज़ाइश होनी चाहिए जिसने निर्दोष का खून किया हो? जिसने लोकतंत्र को ध्वस्त करने का प्रयास किया हो? जिसने देश की संप्रभुता को चुनौंती दिया हो? जिसने इस देश की आर्थिक सामाजिक राजनितिक हर पहलुओं को लहुलुहान किया हो? वैसे लोगो के साथ क्या दया की रत्ती भर भी गुंजाइश होनी चाहिए? क्या एसे जिहादी या आतंकी का कोई अधिकार होना चाहिए? क्या ऐसे नरपिशाचों का भी कोई मानव अधिकार या धर्म होता है? कोई सामान्य और अनपढ़ व्यक्ति भी इस तरह के सारे प्रश्नों का एक ही ज़बाव देगा. नहीं..नही ...नहीं दया ....कदापि नही.
किन्तु भारत का दुर्भाग्य है की इसी देश में इसी देश के तथाकथित बुधिजीवी एक दुर्दांत आतंकी जिसने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को १२ मार्च १९९३ को आरडीएक्स के धमाकों से दहला दिया था. इस भयानक बम धमाको में २५७ लोग मारे गये ७१३ लोग घायल हुए. मुंबई के १३ स्थानों पर हुए इस भीषण धमाके में अरवों की सम्पति का नुकसान हुआ .इस धमाकों के द्वारा एक तरह से मुबई को श्मशान में बदलने का पूरा प्रयास किया गया था.इस धमाके में दाउद इब्राहिम और उसके गिरोह का पूरा हाथ था. इसी अपराध में आतंकी याकूब मेनन १९९४ में गिरफ्तार होता है और २२ साल के लम्बी कानूनी के बाद टाडा कोर्ट से लेकर उच्चतम न्यायालय तक सभी न्याय की मंदिर ने इस आतंकी को इसके घृणित अपराध को देखते हुए फांसी की सज़ा को बरकरार रखा इस आतंकी ने फांसी से बचने के लिए दया की हर वो याचिका लगाईं. रिब्यु पिटिशन मर्सी पिटीशन क्युरेटीव पिटिशन यानी न्याय के दामन पर दया का जितना अधिकतम इस्तेमाल हो सकता था उपयोग किया उस आतंकी को बचाने के लिए .किन्तु फिर भी अपैक्स कोर्ट ने फांसी की सजा बरकरार रखी जिसके तहत आतंकी याकूब मेनन को ३० जुलाई २०१५ को सुबह ७ बजे तक हर हाल में फांसी की सजा पर अमल करने की बात कही गयी.
इस देश का दुर्भाग्य है की वोटो की राजनीति करने बाले गिरोह लोकतंत्र को लहुलुहान करते हुए भारत को हमेशा दुनिया के नज़रों से गिराने का कुत्सित देशद्रोही पाप करते रहा है. देश ४० नामचीन (गद्दार?) आतंकी पोषको ने भारत के राष्ट्रपति को इस आतंकी को फांसी नही देने के लिए एक पत्र लिखा. राष्ट्रपति को पत्र देते समय ऐसे लोगों को ज़रा भी ए शर्म नही आया की जिस आतंकी के लिए दया की याचना कर रहे हैं वह इस देश की संप्रभुता और संविधान को तारतार करते हुए सैकड़ों निर्दोष लोगों के मौत का आरोपी है? हद तो तब हो गये जब एक आतंकी के लिए अंतत:सुप्रीम कोर्ट अपने इतिहास में पहली बार सारी कानूनी प्रक्रियाओं को पालन कर सजा सुनाये जाने के बाद भी आधी रात के बाद उसकी बात सुनाने को बैठी. देश की न्यायिक व्यवस्था को शर्मसार करने बाले गिरोहों को सही रास्ता दिखाने के लिए शीर्ष कोर्ट ने आधी रात में भी प्रशांत भूषण,आनंद ग्रोवर और नंदा ग्रोवर जैसे अधिवक्ता जो इस देश की शीर्ष अदालत को कठघरे में खड़ा करने का दुस्साहस किया था ऐसे लोगो के छींटे कोर्ट के दामन पर नही पड़े इस लिए शीर्ष कोर्ट ने इन तीनो की घृणित दलीलों को ध्यान से सूना . सारे साक्ष्यों को देखने सुनाने के बाद शीर्ष अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची की आतंकी याकूब के मामले में कहीं कोई कसर नही बची है और उसकी सजा न्यायोचित है.
भारतीय न्याय प्रणाली की परम्परा रही है की भले हज़ार गुनाहगार छुट जाए किन्तु एक वेगुनाह को सजा नही मिले.और आतंकी याकूब मेनन के मामले में भारत की शीर्ष अदालत ने दुनिया को यह दिखा भी दिया.अंतत: आतंकी याकूब मेनन को आज फांसी के फंदे पर लटका मुंबई धमाके में पीड़ित परिवार के घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया गया है . इस तरह भारत में एक आतंकी को उसके किये अपराधों के लिए दिए सजा पर जिस तरह का स्यापा मचता रहा वह निंदनीय और चिंतनीय है .यह भारत में ही संभव है जहां एक खूंखार आतंकी के अधिकारों की रक्षा और स्यापा करने के लिए भारत में गद्दारों का गिरोह तैयार रहता है. कभी निर्दोष नागरिकों के अधिकारों के लिए ये लोकतंत्र विरोधियो ने इतना जागरूकता नही दिखाया? बास्तव में भारत की न्याय प्रक्रिया ने इस आतंकी को २२ साल जीने का जो अधिकार दिया वह गलत था ऐसे नर पिशाचों को तो एक दिन भी जीने का अधिकार नही था .
जिस वेशर्मी और वेहुदगी से आतंकी मेनन के लिए शीर्ष अदालत के फैसले पर अपना विषवमन ये समाजद्रोही गिरोह कर रहा है वैसे में ऐसे देशद्रोहियो पर यदि समय रहते अंकुश नही लगाया गया तो लोकतंत्र में न्याय व्यबस्था पंगु हो जाएगी.न्याय के नाम पर न्याय का गला घोंटा जाता रहेगा और ऐसे दुर्दांत खुनी बचता रहेगा.शीर्ष अदालत को ऐसे मामलों पर स्वत:संज्ञान लेते हुए इन गिरोहों के देशद्रोही मानसिकता पर रोक लगाने का कठोरतम प्रयास करना चाहिए. ताकि न्याय की प्राकृतिक अवधारणा और उसकी विश्वसनीयता आम लोगों में कायम रहे. आज इस देश में इस्लाम मत से जुड़े दो घटनाए मिडिया में छाये रहा एक दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति और भारत के युवाओं के आदर्श औरआम लोगों के आँखों का तारा डॉ.ए पी जे अब्दुल कलाम की रामेश्वरम में इस नश्वर शरीर को सुपुर्द-ए-ख़ाक किये जाने का और दुसरा आतंकी याकूब मेनन का, जिस तरह से याकूब के मामले पर राजनीति की जा रही है खासकर अपने आपको मुसलमानों का रहनुमा मानने बाले सांसद अस्सुउदीन ओवैसी और समाजवादी पार्टी के अवू आज़मी जैसे लोग. ये कभी मुसलमानों को कलाम बनने की प्रेरणा नही दे सकता है.ओवैसी और आज़मी जैसे लोग इस देश में इतने खतरनाक है जो मुस्लिम कौम को सिर्फ आतंकी बनने की प्रेरणा देता है .ऐसे घातक लोगों के गिरोह के कारण ही याकूब मेनन जैसा पढ़ा लिखा लोग कलाम बनने के जगह आतंकी रास्ता को चुनता है.अब समय आ गया है की ओवैसी और आज़मी जैसे घातक लोगो को मुस्लिम समाज अपने बच्चों के भविष्य के लिए धक्के मारकर अपने समाज से निकाले.
अवू आज़मी ने जिस वेशर्मी से कहा की – मुंबई बम धमाके बाबरी मस्जिद की ध्वस्त किये जाने की प्रतिक्रिया है तो अवू आज़मी यदि ऐसा होता तो अपनी आँखों से देखिये की भारत के कितने मदिर आज भी मस्जिद की शक्ल में इसी देश की धरती पर खड़ी है और लाखों मदिरो को आतंकी इस्लामियो ने ज़मींदोज़ किया, उसकी प्रतिक्रिया यदि इस देश के बहुसंख्यक समुदाय देता तो आज इस देश का मिज़ाज कुछ और होता? फिरकापरस्तो के गिरोह से जुड़ा शशि थरुर जैसे लोग ट्विट करता है –एक इंसान को फांसी पर चढ़ा दिया गया मै दुखी हूँ,इतना ही नही सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इसने सरकार प्रायोजित हत्या कहकर देश की सर्वोच्च न्याय संस्था पर ऊँगली उठाने की हिमाकत की है ऐसे देशद्रोही और दहशतगर्दों का हमदर्द शशि थरूर यह बता सकते है की क्या देश का शीर्ष न्यायालय ने एक इन्सान को जो वेकसुर था को फांसी पर लटका दिया? क्या १९९३ के बम ब्लास्ट में मारे गये २७३ इंसान नही थे? ऐसे दिग्भ्रमित लोग लोकतंत्र के लिए नासूर होते है. मिडिया के एक ख़ास समूह ने जिस तरह से आतंकी याकूब मेनन पर अनर्गल वह्सों का सिलसिला चलाया वह पत्रकारिता के नाम पर धब्बा है.एक आतंकी के फांसी पर जो रिपोर्टिंग हो रही है वह भारत जैसे देश में ही संभव है. पत्रकारिता के नाम पर देश की संवेदना को भड़काने बाली रिपोर्टिंग देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है. ऐसे रिपोर्टिंग पर तुरंत रोक लगनी चाहिए.इन मिडिया समूहों के फांसी पर किये रिपोर्टिंग उसके चाल और चरित्र को उजागर करती है जिसे कभी भी कोई देशभक्त सही नही कह सकता .भारत सरकार को ऐसे सनसनीखेज खबर और समाजद्रोही वार्ताओं पर हरहाल में देशहित के लिए रोक लगानी चाहिए.
आतंकी याकूब रात भर सो नहीं पाया उसने फांसी से पहले नाश्ता नहीं किया.... इसकी चिंता रखने बाले ये कैसे भूल गये की २२ साल से कितने परिवार इस आतंकी के कारण सो नहीं पा रहे,चल नहीं पा रहे या सदमे से उबर नहीं पाए उनके बारे में ऐसे कृतघ्न लोगों की संवेदनशीलता कहाँ मर ज़ाती है?भारत के स्वनामधन्य तथाकथित बुद्धिजीवी जो डालरों पर वीके है जिनके लिए देश और देश की प्रतिष्ठा कोई मायने नही रखती, जो भारत को सिर्फ भोग भूमि मान यहाँ के संसाधनों का जोंक की तरह दोहन कर अपना और अपने निर्लाज संतानों का परवरिश कर रहा है जो संविधान की शपथ लेकर राष्ट्रीय स्मिता के साथ बलात्कार करता हो ऐसे देशद्रोहियो का सामाजिक वहिष्कार होनी चाहिए. बोलने की आजादी के नाम पर अपने कलुषित विचारों से देश के तानावाना को छिन्न भिन्न करने वाले लोगों से तुरंत भारत के खजाने से मिलने वाले सहयोग या सुरक्षा वापिस होनी चाहिए ऐसे भेड़ियो के गिरोहों के लिए कानूनी बाड़ इतनी सख्त हो की देश की गरिमा और संप्रभुता से देश की सर्वोच्च न्याय पर कोई भौक नहीं सके.अब समय आ गया है की देश की न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका तीनो मिलकर ऐसे जघन्य देशद्रोही कुकृत्य करने वाले लोगो के लिए २२ साल नहीं २२ दिनों में फैसला सुनाकर समाज को इन भेड़ियो और इसके समर्थन में जुटे गिरोहों पर कठोरतम कारवाई करे ऐसा कानून बनाकर भारत के लोकतंत्र की रक्षा कर न्याय के दामन पर दया के नाम पर लगने बाले छीटें से रक्षा करें.
---संजय कुमार आजाद---
शीतल अपार्टमेंट निवारनपुर
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