विशेष : पुलिसिया तफतीश में पैसा-धौंस ही है अहम् कड़ी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 26 जुलाई 2015

विशेष : पुलिसिया तफतीश में पैसा-धौंस ही है अहम् कड़ी

न्याय के बदले लाठी मिलेगी या सत्ता की धौंस व फर्जी मुकदमा दर्ज कर इसी तरह उत्पीड़न होता रहा तो लोगों में आक्रोश आएगा ही। व्यवस्था के खिलाफ यही आक्रोश कभी युवाओं को अपराध की ओर अग्रसार करता है तो तभी संगठित हो जाने पर नक्सलवाद का जन्म देता है। जिसका मतलब होता है सच के लिए लड़ने वाला, पैदा हो जाते हैं और चंबल में बागी। सरकार का यही हाल रहा तो नक्सलवाद अब झारखंड और छत्तीसगढ़ से निकल कर यूपी जैसे शहरों में भी अपनी जडें जमा लेगा  

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अगर कोई मुकदमा जीतना है तो जरुरी है कि आपका हाथ चांदी का हो, पैर लोहे का और जिगर फौलादी। यह पंक्तियां यूपी के गुंडाराज की गुंडा हो चुकी पुलिस पर बिलकुल सटीक बैठती है। अगर इसमें आप कमजोर है तो अंजाम मुझे बताने की जरुरत नहीं। मतलब साफ है थानों के हवालात हो या फिर मुकदमों की पुलिसिया तफतीश के दौरान चश्मदीद गवाह व साक्ष्य नहीं पैसा व सत्ता की धौंस ही सबकुछ बोलता है। और यही पुलिसिया नाइंसाफी या यूं कहे गुंडागर्दी अंधा कानून के फैसले तक पहुंचने में इतनी देर लगा देता है कि अक्सर पीडि़त गुनहगार को सजा दिलवाने के पहले ही लस्त-पस्त-ध्वस्त हो जाता है। खासकर उस दौर में जब उपर अंकित लाइनों के मुताबिक लंबी लड़ाई लड़ने की उसमें कुबत ना हो तो उसकी सच्चाई झूठ के कब्र में दफन होते देर नहीं लगायेगी। जी हां, यूपी के सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव व सीनियर आईपीएस आफिसर अमिताभ ठाकुर, सीनियर जर्नलिस्ट सुरेश गांधी सहित ऐसे मामले एक-दो नहीं बल्कि हजारों ऐसे वाकया है जिसमें धमकी, लूटपाट, हत्या, डकैती, थानों में दर्ज फर्जी मुकदमें सहित बलातकार के हालात व साक्ष्य चीख-चीख कर दुहाई दे रहे है कि अमूक व्यक्ति दोषी है, लेकिन उसके बेसुमरा दौलत व रसूख के आगे सब हवा-हवाई है। गुंडाराज की गुंडा हो चुकी पुलिस की प्रताडना व खाउंबीर नीतियों के चलते एक-दो नहीं सैकड़ों पीडि़तों की सुलगते सवाल इन दिनों सुर्खियों में है। खून खौलाने से लेकर मरने-मारने तक की सोच पाल बैठे लोगों के हालात देखकर समझा जा सकता है कि किस कदर नक्सलवाद बढ़ता है। फिरहाल हाल की उपजी घटनाओं  व पुलिसिया हरकत से तो कहा जा सकता है कि क्या बेसुमार दौलत वाला कोई हैवान यहां कानून के राज की यूं ही धज्जियां उड़ाते जनतंत्र में बार-बार सेंध लगाने के लिए छुट्टे सांड की तरह छोड़ा जा सकता है? 

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ताजा मामला सीनियर पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर का है। टीवी न्यूज चैनल से लेकर सोशल मीडिया तक उनकी पत्नी नूतन ठाकुर द्वारा जारी आडियों टेप हर किसी ने सुना कि सूबे के सत्ताई आका मुलायम सिं की आवाज है तो धमकी दे रहे है कि सुधर जाओं वरना जसराना से भी बुरा हो जायेगा। इस धमकी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज करने को कौन कहें गुंडाराज की गंुडा हो चुकी पुलिस ने ठाकुर दंपत्ति पर पहले फर्जी बलातकार की रपट दर्ज की बाद में असंवैधानिक तरीके से उन्हें निलंबित कर दिया। इस धमकी के बाद भी सरकार के काले कारनामों को उजागर करने पर अब उनके संपत्ति की जांच शुरु हो गयी है। इससे भी बात ना बनी तो जैसा की सुना जा रहा है उनकी हत्या से भी इंकार नहीं किया जा सकता। ठीक इसी तरह भदोही में दौलतमंद बलाकार के आरोपी को जेल भेजवाने से लेकर बाहुबलि विधायक विजय मिश्रा के बालू खनन से लेकर हर काले कारनामों का पर्दाफाश करने पर लाखों रुपये लेकर आईएएस अमृत त्रिपाठी व आईपीएस अशोक शुक्ला ने षढयंत्र के तहत पहले खत्म हुए मुकदमों का आधार बनाकर पत्रकार सुरेश गांधी के खिलाफ गुंडाएक्ट दर्जकर सप्ताहभर के अंदर जिलाबदर की कार्रवाई की और हाईकोर्ट ने कार्रवाई पर रोक लगा दी तो पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं से मिलकर कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने 16 साल से जुटाई गृहस्थी व विवाह में मिले सामानो को लूटवा दिया। जब इस लूट पर न्यायालय ने 156 -3 के तहत कोतवाली भदोही में लूटेरे माफियाओं व कोतवाल संजयनाथ तिवारी के खिलाफ लूट की रपट दर्ज कराई तो मुकदमें फाइनल रिपोर्ट लगा दी। हालांकि न्यायालय में पुलिस की इस फर्जी तफतीश को चैलेंज किया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि सच और अभिव्‍यक्ति की आजादी की आवाज उठाने वालों को  इसी तरह पुलिस, प्रशासन और सरकार की करतूतें सामने आती रही तो कहा जा सकता है यूपी में गुंडों का राज है और उसकी पुलिस खुद गुंडई कर रही है। 

यह सारी घटनाएं दरअसल उन शहीदनामों की तरह हैं, जिन्‍होंने व्‍यवस्‍था से जुझने की जुर्रत की, और नतीजा में उनकी जितनी भी छीछालेदर हो सकती थी, विभाग, प्रशासन और सरकार की ओर से कर दी गयी। लेकिन ऐसी घटनाओं के बावजूद सच के सिपाही फिलहाल अभी तक तो घुटना नहीं टेके है आगे भी उम्मींद नहीं है। पुलिसवालों के हकों के लिए आवाज उठाने वाले सुबोध यादव को पुलिस महकमे ने सीधे बर्खास्‍त कर दिया। लेकिन इसके बावजूद सुबोध जी पूरी ईमानदारी से अपना संघर्ष जारी रखे हुए है। खास बात यह है कि अमिताभ ठाकुर के खिलाफ जिस अनुशासनहीनता की दुहाई देकर कार्रवाई की गयी है उससे तो यही साबित होता है कि इस सरकार में अनुशासनहीनता की परिभाषा ही बदल गयी है। अगर दमन, अभद्रता, गालियां, घूस, दलाली, लूटमार, माफियाओं, डकैतों, बाहुबलियों, अवैध खनन से लेकर हर कुकर्म का विरोध करना ही अनुशासनहीनता है तो फिर गुंडाराज नहीं तो और क्या कहा जायेगा। गाली-गलौज के बीच दो-पक्षीय मामलों के निपटाने में अवेध वसूली, अवेध गांजा शराब की बिक्री करवाना, रिक्‍शेवालों, खोमचावालों, मण्‍डी, दिहाड़ी मजदूर वाले आदि से वसूली करना, माफियाओं से मिलकर डकैती डलवाना, लूट की घटनाओं को करवाना, बलातकार के आरोपियों से लाखों-करोड़ों वसूलना आदि पुलिस की अच्छाईया सरकार को समझ में आ रही है। कोतवाल संजयनाथ तिवारी जेसे लूटेरा व डकैत इंस्पेक्टर को मलाईदार थानों पर पोस्टिंग, करोड़ों की अवैध संपत्ति रखनेवाला आईएएस अमृत त्रिपाठी की कमाउ जिले में तैनाती कर सरकार किस लोकतंत्र की दुहाई दे रही है। यह जनता समझ रही है बस मौके की तलाश है। शाहजहांपुर और बाराबंकी की घटना तो ब्रतानिया हुकूमत को भी मात दे दी। जहां एक महिला और एक पुरूष को जिन्‍दा फूंक डाला गया था। शाहजहांपुर की पुलिस ने एक पत्रकार के घर में उसे पेट्रोल डाल कर फूंक दिया था, जबकि बाराबंकी में एक पत्रकार की माता को पुलिसवालों ने बलात्‍कार में असफल होने पर जिन्‍दा फूंक डाला। वह तो इन पुलिसवालों की खुशकिस्‍मती है कि उनका महकमा और प्रदेश सरकार का हाथ उन पुलिसवालों के सिर पर सरपरस्‍ती पर रखा हुआ है। लेकिन कितने तक जनता 2017 का बेसब्री से इंतजार कर रही है। 

गोण्‍डा की घटना लोगों के जेहन में है जहां एक पुलिस अधीक्षक ने गो-सेवा आयोग-समिति के एक वरिष्‍ठ पदाधिकारी केपी पाण्‍डेय ने उनके घर पहुंच कर उन्‍हें पचास हजार रूपया की भेंट दी। साथ ही निवेदन किया कि चूंकि आपके जिले से गो-पशुओं का आवागमन रोक दिया गया है, इसलिए आप इस प्रतिबंध को हटा लें। ताकि हमारा गोवंश तस्‍करी का का धंधा बेधड़क चलता रहे। एसपी राणा ने इस बातचीत को रिकार्ड कर उसे अपने वरिष्‍ठ अधिकारियों को भेज दिया। लेकिन नजीजा दो-तरफा हुआ। एक तो यह कि तीन दिन के भीतर ही पुलिस कप्‍तान का तबादला कर दिया गया दूसरा यह कि गोंडा में गो-वंश की तस्‍करी धडल्‍ले से शुरू हो गयी। चंदौली के डीएसपी शैलेंद्र सिंह ने मुख्‍तार अंसारी की करतूतों से दो-दो हाथ करने की कोशिश की, उन्हें नौकरी ही छोड़नी पड़ गयी। सीनियर एडवोकेट एनके उपाध्याय कहते है न्याय के बदले लाठी मिलेगी या सत्ता की धौंस व फर्जी मुकदमा दर्ज कर इसी तरह उत्पीड़न होता रहा तो लोगों में आक्रोश आएगा ही। व्यवस्था के खिलाफ यही आक्रोश जब संगठित हो जाता है तो नक्सलवाद का जन्म होता है। जिसका मतलब होता है सच के लिए लड़ने वाला, पैदा हो जाते हैं और चंबल में बागी। सरकार का यही हाल रहा तो नक्सलवाद अब झारखंड और छत्तीसगढ़ से निकल कर यूपी जैसे शहरों में भी अपनी जडें जमा लेगा। सरकार के बाहुबलि विधायकों व सत्ता के ओहदेदार लोगों के कहने पर पुलिस ने शाहजहांपुर, बाराबंकी सहित अन्य जिलों में जिस तरह की बर्बरता दिखाई है। फर्जी मुकदमें दर्ज कर लोगों का उत्पीड़न किया है। पैसे लेकर व अपनी नौकरी बचाने के लिए फर्जी जांच रिपोर्ट न्यायलय से लेकर आयोग को भेजा है अत्याचार की चीख-चीख् कर गवाही दे रहा है। विश्वविद्यालयों से निकले तमाम छात्र और नौजवान अगर माफिया या अपराध की ओर अग्रसर हो रहे है या उनको समर्थन दे रहे हैं तो इसमें दोष व्यवस्था का है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दरवाजे पर पहुंचे शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करा रहे है तो कल्पना कीजिए उन पीडि़तों और किसानों की कौन सुनता होगा, जो देश के दूर दराज में अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। 

चंबल का इतिहास जिन्हें पता होगा वह जानते होंगे कि इस बीहड़ में लोगों को बंदूक उठाने के लिए किसने मजबूर किया? भ्रष्ट व्यवस्था और पुलिसिया जूल्म ने ही उन्हें बीहड़ की राह पकडाई। अगर आप कभी चंबल के इलाकें में जाएं तो वहां मलखान सिंह जैसे पुराने पूर्व दस्यु सरगनाओं से मुलाकात करें तो आप को पता चलेगा कि ये डाकू अपनी मर्जी से नहीं बने, बल्कि पुलिस और सामंती व्यवस्था ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया। जब अदालतों और व्यवस्था से उन्हें न्याय नहीं मिला तो अन्याय के खिलाफ बदले की भावना से ही उन्होंने बंदूक उठाई। ये डकैत खुद को डकैत नही, बल्कि गर्व से बागी कहते हैं। सभी की बागी बनने की पुलिसिया जुल्म की अपनी कहानी है। फूलन देवी, मानसिंह बीहड के पहले बागी थे। पक्के वसूलों बाले मानसिंह का उनके गांव खेड़ा राठौर में मंदिर भी है और लोग उनकी पूजा भी करते हैं। पंजाब में भी कुछ ऐसा ही हुआ, 80 के दशक में खालिस्तान आंदोलन के समय पंजाब में पुलिस ने जिस तरह से तमाम निर्दोष युवाओं पर जुल्म ढाया, उसने उन्हें आतंक की राह पकडाई। गुलजार की फिल्म माचिस उस सच्चाई को बयान करती है, तो तिगमांशू धूलिया की पानसिंह तोमर न्याय के लिए चंबल घाटी के सेना के एक सिपाही के डाकू बनने की कहानी है। इन उदाहरणों के जरिए यह बताने की कोशिश की जा रही हे अगर युवाओं के आक्रोश को पुलिसिया ठंडे से दबाने की कोशिश की गई तो, इसका भयानक दुष्परिणाम हो सकता है। 




(सुरेश गांधी)

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