बिहार चुनाव : ...और फिर षुरू हुआ ‘जमूरे’ का खेल ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 1 अगस्त 2015

बिहार चुनाव : ...और फिर षुरू हुआ ‘जमूरे’ का खेल !

  • - चुनावी समर में पानी की तरह जनता का पैसा बहाने वाली पार्टी के सदस्य दिल पर हाथ रख कर नहीं कह सकते कि उसने चुनाव आयोग की निर्धारित खर्च सीमा का उल्लंघन नहीं किया है
  • - सांसद बनने के बाद पप्पू यादव लगातार ‘गब्बर रिटन्र्स‘ की भूमिका में हैं, आमजनों के मुद्दों पर पप्पू यादव खुलकर सामने आ रहे हैं

pappu yadav
कुमार गौरव, सहरसा: वफा जिनसे की वो बेवफा हो गये...वो वादे मोहब्बत के क्या हो गये...। जमूरा आता है...तमाषा दिखाता है... कलाबाजी करता है...रस्सी पर चलाता है...वाहवाही लूटता है...कटोरा लेकर बच्चे को घुमाता है...पैसे बटोरता है और चलते बनता है...। हमारी हैरत कुछ देर का कौतूहल होती है। इनाम में तालियां बजाते हैं। मन किया तो बटुआ से निकाल कर दो चार पैसे न्योछावर किये और अपने काम धंधे में रम गये। कहीं कुछ नहीं बदलता। सब कुछ सामान्य रहता है। चुनावी वादे भी हमारी जिंदगी में जमूरे के खेल जैसा ही है। चुनाव के वक्त आते हैं और गूलड़ के फूल की तरह गायब हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा कोसी प्रमंडल समेत सूबे के कई अन्य लोकसभा क्षेत्रों का भी है। अमूमन हरेक लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों की गलियों व मोहल्लों में चर्चा आम हो चली है। सड़क गली मैदान के चारों तरफ जमूरों का मजमा लगने को दौर षुरू हो चुका है। चुनावी मौसम है तालियों की गड़गड़ाहट बटोरी जा रही है। वोट के लिए करतब दिखाये जा रहे हैं। रैलियों में लोगों को ढ़ो ढ़ोकर लाया जा रहा है। रैलियों में मुफ्त का खाना पीना, सब कुछ। पिछले चुनावी मौसम से बेहतर सुविधा की गारंटी दे रहे हैं राजनीतिक दल। इस काम में कोई पीछे नहीं है। ईमानदारी का दम भरने वालों को भी वोटर्स को घूस देने से गुरेज नहीं। टीवी के परदे पर वादों की झड़ी लगायी जा रही है। किसी को हिसाब देने की जरूरत नहीं कि वोटर को सपने दिखाने के नाम पर धन कहां से लाया जा रहा है और कितना धन लुटाया जा रहा है। पहले के मुकाबले चुनाव आयोग ने भी दरियादिली दिखाई है और खर्च सीमा बढ़ा दी है। जीतने वाला दिल पर हाथ रख कर नहीं कह सकता है कि उसने चुनाव आयोग की निर्धारित खर्च सीमा का उल्लंघन नहीं किया है। जमूरों के बीच प्रतिद्वंदिता छिड़ी है। एक से बढ़ कर एक वायदे किये जा रहे हैं। स्वर्ग सजा देने का भरोसा भरने की कोषिष। लंबे चैडे़ इष्तिहार। खुद को महान और दूसरों को बेईमान साबित करने का प्रचार। वोट के बदले जीवन में सुविधाओं का अंबार लगा देने का दावा। जब तक हम अपना वोट नहीं डाल देते, ये नजरों से ओझल नहीं होंगे। वोट डालते ही फिर सन्नाटा...। सब गायब हो जाते हैं। लोकतंत्र के बाजार में हर पांच साल पर ऐसी जमूरेबाजी सजती है। करतब चलता है...पांच साल पहले का दिन हमें याद नहीं रहता। हरेक बार हम वादे को नया मान कर यकीन कर लेते हैं। गलती से याद आ जाये कि फलां वादा तो पूरा हुआ ही नही ंतो वादा करने वाला मजबूरियां गिना देता है। कभी गंठबंधन की मजबूरी तो कभी नौकरषाही की अकर्मण्यता की दुहाई। गिड़गिड़ाते हुए जमूरा बता जाता है कि इस बार बख्ष दो। फुल मेजोरिटी मसलन पूर्ण बहुमत दो। मजबूर नहीं रहूंगा तो सारे वादे पूरे कर दूंगा...। हम जानते हैं कि फुल मेजोरिटी देना हमारे वष की बात नहीं। सो उसका बहाना तो बना ही रहेगा...। वोट डालना हमारा धर्म है, धोखा खाने के बावजूद हम जमूरे की मजबूरी खत्म होने की दुआ भर कर सकते हैं।

दिलचस्प होगा बिहार विस चुनाव: यह विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है। एक तरफ जदयू-राजद की नैया खुद सीएम नीतीष कुमार व लालू प्रसाद यादव संभाल रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपा की कमान स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी। इसके अलावा, बहुत कम समय में जीतन राम मांझी ने खुद को साबित किया है। उन्होंने एक ऐसा माहौल खड़ा कर दिया है कि बिहारी आवाम हम को एक विकल्प के तौर पर देखने लगे हैं और तो और साइकिल का साथ छोड़ हम का दामन थामने वाली लवली आनंद व उनके बेटे के आने से कोसी की राजनीति एक बार फिर अंगराई लेगी और नकीनन यह सूबाई राजनीतिक समीकरण को भी एक नया आयाम देगा। लेकिन फिलहाल यह लड़ाई सिर्फ बड़े मियां/छोटे मियां और नरेंद्र मोदी व उनकी सहयोगी पार्टियों के बीच है। वहीं जन अधिकार मोर्चा के पप्पू यादव ने भी सरकार के खिलाफ विभिन्न मुद्दों पर मोर्चा खोल दिया है। सांसद बनने के बाद वो लगातार गब्बर रिटन्र्स की भूमिका में हैं। आमजनों के मुद्दों पर पप्पू यादव खुलकर सामने आ रहे हैं। वो चाहे महंगाई का मुद्दा हो, डाॅक्टर्स की फीस का मामला हो, आपदा में आमजनों को मुआवजा राषि देने व दुख सुख में उनके साथ रहने का मामला हो...हर मसले पर पप्पू यादव हल्ला बोल रहे हैं। जिस कारण कोसी व सीमांचल में उनकी लोकप्रियता एक बार फिर चरम पर है और अबकी बार लालू नीतीष की जोड़ी को जन अधिकार मोर्चा कड़ी टक्कर दे सकता है। बात यदि वामपंथियों की करें तो सूबे में एक बार फिर लाल झंडे का असर दिखने लगा है। कामरेडों की रैलियों में जुट रही भीड़ इस बात को इंगित कर रही है कि अब षायद राश्ट्रीय या फिर क्षेत्रीय पार्टियों से धीरे धीरे लोगों का मोहभंग हो रहा है। हाल ही में पटना, बेगूसराय, सहरसा समेत कई अन्य जिलों में हुई वामपंथियों की रैली में अच्छी खासी भीड़ जुटी थी और मजेदार बात तो यह है कि यह भीड़ भाड़े पर नहीं जुटाई गई थी बल्कि स्वतः स्फुर्त थी। हालांकि विस चुनाव में वामपंथियों को कितनी सीटें मिलेंगी यह तो स्पश्ट नहीं है लेकिन वामपंथी पार्टी का असर तो दिखेगा जरूर।   

बेहद सजग हैं क्षेत्रीय पार्टियां: चुनावी समर में कूदने से पहले क्षेत्रीय पार्टियों ने काफी होमवर्क किया है। जातिगत समीकरण बनाने के लिए जदयू राजद ने केंद्र सरकार से जातिगत आंकड़ा पेष करने की मांग की है और सूबे में एक बार फिर मंडल कमंडल की राजनीति अंगराई लेने लगी हैं। इन मुद्दों से परे अमूमन हरेक पार्टियां कांग्रेस की राह पर आगे बढ़ रही हैं। दरअसल कांग्रेस ने देष पर लंबे अरसे के षासन ने राजनीतिक खेल के तमाम खिलाडि़यों को राज हथियाने का एक अनुकरणीय माॅडल भी दिया है। लोस चुनावी समर में उतरने से पहले भाजपा इस माॅडल को पूरी तरह से आत्मसात कर चुकी थी और परिणाम भी सामने आया। अब तो अमूमन हरेक पार्टियों ने महिला से लेकर मीडिया तक, श्रमिक से सरमायेदार, किसान से कमेरा, उपभोक्ता से व्यापारी, विद्यार्थी से बुद्धिजीवी, पेषेवर से अकुषल, संगठित से असंगठित, युवा, बेरोजगार, दलित महादलित, आदिवासी, पिछडा, अगडा, अल्पसंख्यक, षिक्षक, वकील, डाॅक्टर, सैनिक, कर्मचारी, अफसर, पेंषन भोगी, षहरी व ग्रामीण, वनवासी हर किसी के लिए पार्टी में प्रकोश्ठ तैयार किया है और हर एक के सामने फेंकने के लिए छोटे बडे़ टुकड़े मौजूद हैं। भारत में राजनीति में सब कुछ संभव है. छोटे व क्षेत्रीय दल भी बडी पार्टियों को चुनौती देते हैं जो लोकतंत्र के लिए अच्छा है लेकिन स्वार्थ, जाति और धर्म के नाम पर जिस तरह राजनीति हो रही है वह हमारे लोकतंत्र के लिए चिंता का विशय है। 

कोई टिप्पणी नहीं: