'मुंबई हमले की गलती स्वीकारे पाकिस्तान' - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 4 अगस्त 2015

'मुंबई हमले की गलती स्वीकारे पाकिस्तान'


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मुंबई पर 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकवादी हमले में पाकिस्तान की भूमिका की पोल-पट्टी खुद एक पाकिस्तानी सेवानिवृत्त अधिकारी ने खोल दी है। उसने साफ कहा है कि पाकिस्तान को इस जघन्य नरसंहार में अपनी गलती स्वीकार कर लेनी चाहिए। पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी (एफआईए) के पूर्व निदेशक जनरल तारिक खोसा ने समाचार पत्र डॉन में मंगलवार को प्रकाशित अपनी टिप्पणी में लिखा है, "मुंबई की घटना से पाकिस्तान को निपटना है। इसकी साजिश पाकिस्तान की धरती पर रची गई थी और इसे यहीं से संचालित किया गया था।"

खोसा ने लिखा है कि पाकिस्तान को हर हाल में मान लेना चाहिए कि उसने पाकिस्तानी आतंकवादियों को समुद्र के रास्ते मुंबई तक पहुंचने देने की गलती की थी। इसके लिए जरूरी है कि सच का समाना किया जाए और अपनी गलती मान ली जाए।  खोसा ने कहा, "देश के समूचे सुरक्षा तंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस वीभत्स आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाले और इसकी साजिश रचने वाले लोग कानून के कटघरे में खड़े किए जाएं।"  खोसा ने कहा कि यह मामला काफी लंबे समय से लटका हुआ है।

उन्होंने लिखा है कि बचाव पक्ष की मामला लटकाने की रणनीति, न्यायाधीशों का बार-बार बदला जाना और मामले के अभियोजक की हत्या और कुछ प्रमुख गवाहों का मूल गवाहियों से पलट जाना, अभियोजन पक्ष के लिए गंभीर धक्का साबित हुआ है।  खोसा ने कहा कि पहली बात यह है कि हमले का मुख्य गुनहगार अजमल कसाब और मामले के मास्टरमाइंड पाकिस्तानी थे। दूसरी बात यह कि हमले को अंजाम देने वाले आतंकवादियों ने सिंध में थट्टा के पास प्रशिक्षण लिया था और यहीं से वे समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे थे। 

उन्होंने कहा है, "जांचकर्ताओं ने प्रशिक्षण शिविर की पहचान की थी और उसे अपने नियंत्रण में ले लिया था। मुंबई हमले में इस्तेमाल किए गए विस्फोटक उपकरणों के खोल यहां से बरामद हुए थे।"  खोसा ने लिखा है, "तीसरी बात यह कि जिस भारतीय नौका से आतंकवादी मुंबई पहुंचे थे, उसे अगवा करने के लिए इस्तेमाल की गई मछली पकड़ने वाली नौका वापस बंदरगाह लाई गई थी और उसे रंगने के बाद छिपा दिया गया था। जांचकर्ताओं ने उसे बरामद किया था और पाया कि इसका संबंध आरोपियों से है।"

खोसा ने लिखा है, "चौथी बात यह है कि आतंकियों ने जो डोंगी मुंबई बंदरगाह के पास छोड़ी थी, उसका इंजन भी पाकिस्तान से ताल्लुक रखता था। जांचकर्ताओं ने पाया कि यह जापान से लाहौर आयात किया गया था और वहां से कराची की एक दुकान तक पहुंचा। लश्कर-ए-तैयबा के एक आतंकी ने इस दुकान से इसे डोंगी के साथ खरीदा। इस सौदे में हुए लेन-देन का ताल्लुक भी मामले में गिरफ्तार आरोपियों से निकला।" खोसा ने लिखा है कि पांचवीं बात यह कि कराची के जिस कमरे में बैठकर इस पूरे अभियान को संचालित किया गया, उस तक भी जांच एजेंसियां पहुंचीं और उसे सील किया गया।

खोसा ने कहा कि छठी और बड़ी बात यह है कि आरोपी कमांडर और उसके तमाम नायब पहचान लिए गए और पकड़े गए। सातवीं बात यह कि हमले के लिए धन देने वाले कुछ विदेशी भी पकड़ लिए गए। खोसा ने लिखा है कि मुंबई कांड अपने आप में अलग तरह का है। दूसरे के अधिकार क्षेत्र में साजिशों के तार जोड़ना और इसे साबित करना बहुत जटिल काम है और इसके लिए बहुत मजबूत सबूत की दरकार होती है। इसलिए जरूरी है कि दोनों देशों के कानून से जुड़े लोग एक-दूसरे पर उंगली उठाने के बजाए एक साथ मिल कर काम करें। 

खोसा ने पाकिस्तान से पूछा है, "क्या एक राष्ट्र के रूप में हम अपने अंदर असहज कर देने वाली सच्चाइयों का सामना करने की हिम्मत जुटा सकते हैं और अपनी जमीन को तबाह करने वाले आतंक के दानवों से लड़ सकते हैं। " खोसा ने अपने लेख में भारत पर भी उंगली उठाई है। उन्होंने समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट कांड की 'अधकचरी जांच', बलूचिस्तान में अलगाववाद को कथित रूप से हवा देने और कराची एवं फाटा में आतंकवादियों की मदद करने का आरोप लगाया।  उन्होंने लिखा है, "भारत और पाकिस्तान, दोनों को अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए। साथ रहने का हुनर सीखना चाहिए और शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दे सुलझाने चाहिए। " 

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