आस्था की लहरों पर उमड़ता-घुमड़ता शिव भक्ति का सैलाब। इसी के साथ श्रद्धा व भक्ति की अनोखी छटा लेकर आया सावन का महीना। गली-मुहल्लों से लेकर सड़कों और देवालयों में लगने लगा है हरहर महादेव का जयकारा। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी से लेकर हरिद्वार तक और बाबा बैजनाथ के धाम देवघर से लेकर महाकाल की नगरी उज्जैन तक, जहां-जहां भगवान शिव का वास है भक्ति की अविरल धारा बहने लगी है। कहते है इस बार विशेष संयोग होने से उपद्रव करने वाली शक्तियां शांत रहेगी। शनि व हनुमान जी की कृपा होगी। चंद्रमा मकर राशि में भ्रमण कर रहा है और मकर राशि के स्वामी भी शनि है। इस स्थिति में शाम 6 बजे से पहले किसी भी शिव मंदिर में की गयी पूजा सवा लाख महामृत्युजंय मंत्र के जाप के बराबर फल मिलेगा
शिव के ताप को बुझाने वाली कांवड़ यात्रा शुरु हो गयी है। लेकिन इस बार का सावन बेहद खास है। क्योंकि इस साल के सावन में जो संयोग बना है वह 144 साल बाद आया है। विशेष योग, त्योहारों व नौग्रहों के संयोग की स्थिति के कारण यह सावन सौभग्यशाली है। चंद्र भगवान शिव के नेत्र है उनका दुसरा नाम सोम है। सोम ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ है। इसीलिए सोमवार का व्रत करने से सभी शारीरिक, मानसिक व आर्थिक कष्ट दूर हो जाते है। ऊँ नमः शिवाय मंत्र मानों जीवन सफल कर देता है। कहते है सावन का हर सोमवार बेहद खास होता है। इस दिन धरती पर उतर आते है साक्षात महादेव। भक्तों को भोले बाबा देते है मनचाहा वरदान। किसी भी भक्त को नहीं लौटाते खाली हाथ। विध्धि-विधान से पूजा व जलाभिषेक करने से मिल जाता है हर इच्छा पूरी होने का वरदान। वैसे भी सावन का महीना, शिव का सबसे प्रिय महीना है। यह वो महीना है जब शिव भक्तों पर कृपा अपरंपार बरसाते हैं। क्योंकि इस महीने में वर्षा प्रकृति उत्साह का वातावरण दिखाई देता है। प्राकृतिक सम्पदा बिना मोल के प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहती है, जो की शिव को अति प्रिय है। इसीलिए शिव साक्षात धरती पर आते हैं। शास्त्रों में भी इस महीने को शिव की पूजा के लिए सबसे उत्तम महीना माना गया है। मान्यता है कि सावन के सोमवार को विधिपूर्वक शिव का पूजन और व्रत रखने वालों को शिव कभी निराश नहीं करते। चाहे वह संतान प्राप्ति की अभिलाषा हो या फिर मनपसंद जीवन साथी की तलाश शिव अपने सभी भक्तों की इच्छा पूरी होती है। भोले-भंडारी शिव-शंकर अपने भक्तों को हर संकट से उबारते हैं, मुश्किल घड़ी में उन्हें राह दिखाते हैं। तभी तो देवता भी अपने कष्टों के निवारण के लिए भोले-भंडारी की ही शरण में जाते हैं। इस दिन पति-पत्नी दोनों को मिलकर शिव की आराधना करनी चाहिए। क्योंकि भोले शंकर गरम तो है ही लेकिन दिल के बेहद नरम भी, इसलिए उनकी चैखट से उनके भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता।
सावन के सोमवार के व्रत के लिए हरा रंग शुभ माना जाता है इसलिए इस दिन हरा रंग पहनना और हरे रंग का पकवान खाने की सलाह दी जाती है। भगवान शिव के इस व्रत मे व्रती सुबह विधि पूर्वक उनकी पूजा की जाती है। इसके लिए गंगा जल, दूध-घी, फल-फूल विशेष रुप से वेलपत्र के पत्तों से उनकी अर्चना की जाती है। इस दिन सावन के महीने में भक्त जब भोले बाबा के दरबार में सच्चे मन से आराधना करते हैं तो उन्हें साक्षात शिव शंकर का आशीर्वाद मिल जाता है। खास बात यह है कि सावन का महीना चतुर्मास में से एक माना जाता है। इस साल वर्षों बाद सावन के महीन में कई सारे शुभ योग बन रहे हैं। रक्षाबंधन त्यौहार के साथ 21 दिन बाद श्रावण मास सम्पन्न होगा। इस बार का सावन मास विशेष योग और त्योहारों की सौगात तथा नव ग्रहों की स्थिति के कारण भी विशेष शुभ माना जा रहा है। इस सावन में चार सोमवार रहेंगे। संयोगवश इन चारों सोमवार को भी विशेष तिथियां रहेंगी। 03 अगस्त को पहला सोमवार है। इस दिन शतभिषा नक्षत्र व गणेश चतुर्थी रहेगी। शिव व गणेश पूजा के लिए यह सोमवार खास रहेगा। 4 अगस्त को मोना पंचमी है। 08 अगस्त को सर्वार्थ सिद्दी अमृत योग, 10 अगस्त को दूसरा सोमवार, इस दिन एकादशी होने से शुभता अधिक रहेगी। 11 अगस्त को भौम प्रदोष व्रत, 12 अगस्त को मास शिवरात्रि, 13 अगस्त को गुरु पुष्य, अमृत सिद्दी एवं सर्वार्थ सिद्दी योग, 14 अगस्त को हरियाली अमावस्या, 17 अगस्त को तीसरा सोमवार एवं हरियाली तीज। इस दिन स्वर्ण गौरी पूजन व व्रत रखने का विधान है। 18 अगस्त को दूर्वा चतुर्थी है। 19 अगस्त को नागपंचमी है। 21 अगस्त को श्रावणी कर्म। 24 अगस्त को चैथा सोमवार है। इस दिन श्रावण शुक्ल नवमी तिथि व ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। 26 अगस्त को पुत्रदा एकादशी है। 29 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा व रक्षा बंधन पर्व रहेगा। इन तिथियों की गई शिव पूजन का विशेष पुण्य लाभ अर्जित होगा।
सावन सोमवार से गौरी शंकर की कई कथाएं प्रचलित है। कहते है सांत कुमारों ने जब भगवान शिव से सावन प्रिय होने के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि जब देवी शती ने अपने पिता दक्ष के घर में योग शक्ति से शरीर त्याग किया था तो उससे पहले देवी शती ने हर जन्म में महादेव को पति के रुप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी शती पार्वती के रुप में हिमालयराज के घर में पुत्री के रुप में जन्म लिया। पार्वती ने युवा अवस्था के सावन महीने में निराहार रहकर कठोर व्रत व तपस्या कर भगवान भोलेनाथ को प्रसंन किया। उसके बाद से ही महादेव के लिए सावन का महीना विशेष प्रिय हो गया। कहा यह भ्ज्ञी जाता है कि पार्वती के श्राप से कुष्ठ पीडि़त पूजारी ने जब सावन सोमवार का व्रत रखा तो उसे इस रोग से सदा-सदा के लिए मुक्ति मिल गयी। पूजारी को स्वस्थ देखकर मां पार्वती ने भी अपने पुत्र के लिए बड़े श्रद्धाभाव से इस व्रत को रखा। सावन सोमवार की महत्ता इस मान्यता से भी है कि सावन के महीने में शिव का प्राकृतिक लिंग धरती पर स्थापित हुआ था। इसलिए सावन सोमवार पर शिव भक्त बड़ी संख्या देश के अलग-अलग मंदिरों में बड़े ही श्रद्धा और आस्था से शिव पूजा के लिए इकठ्ठा होते है। सावन माह में की जाने वाली शिव की उपासना और वो भी सावन के सोमवार को की जाने वाली शिव भक्ति हर भक्त के जीवन में सुख लाती है। सावन माह के सोमवार व्रत की कड़ी में चैथे और अंतिम सोमवार का व्रत बेहद शुभ है। मान्यता है कि अगर आपने आखरी सोमवार का व्रत रख कर लिया और भोलेनाथ की पूजा कर ली तो सभी सोमवारों का फल और पुण्य प्राप्त हो जाएगा।
कहते है भगवान भोलेनाथ का रावण से बड़ा भक्त कोई नहीं था। रावण हिमालय पर्वत पर जाकर शिवलिंग की स्थापना करके कठोर तपस्या करने लगा। कई साल तक तप करने के बाद भी भगवान शंकर प्रसन्न नहीं हुए तब रावण ने अपने सिर की आहुति देने लगा, जिससे भगवान शिव को प्रसन्न हो गए। रावण को जब इच्छित वरदान मिल गया तब उसने भगवान शिव से अनुरोध किया कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। भगवान शिव ने लंका जाने से तो इंकार कर दिया लेकिन इस शिवलिंग में अपने को समाहित कर दिया। शिव ले जाने से पहले शर्त यह थी कि इस ज्योर्तिलिंग को रास्ते में कहीं भी भूमि पर नहीं रखना अन्यथा यह वहीं पर स्थापित हो जाएगा। छल से भगवान विष्णु समेत अन्य देवताओं ने बाबा बैजनाथ धाम में इस शिलिंग को स्थापित करा दिया। इसके बाद रावण को खाली हाथ लंका लौटना जाना पड़ा। बाद में सभी देवी-देवताओं ने आकर इस ज्योर्तिलिंग की पूजा की और विधिवत रूप से स्थापित किया। मान्यता है कि अब भी हर सावन में रावण बाबा बैजनाथ धाम पहुंचकर जलाभिषेक करता है। कहा यह भी जाता है कि रावण ने ही कांवर परंपरा की शरुवात की थी। तभी से यहां श्रावणी मेला लगता है। जो दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है।
एक अन्य कथानुसार त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने पवित्र सावन के महीने में ही विहार स्थित सुल्तानगंज से गंगाजल कांवर में भरकर भगवन भोले शंकर को अर्पित किया था। कहा यह भी जाता है कि श्रावण में ही समुन्द्र मंथन हुआ था और मंथन के दौरान निकले विष को विषपान कर भगवन शंकर नीलकंठ कहलाये। विष के प्रभाव को कम करने के लिए शिव शंकर ने अपने माथे पर अर्धचंद्र धारण किया। इतना ही नहीं सभी देवता शिव पर गंगाजल डालने लगे। और तभी से सावन के महीने में शिव भक्तों द्वारा शिवलिंग पर गंगा जल अर्पित करने के की परंपरा हुई। बाबाधाम के कण-कण में शिव विराजमान हैं। सावन के महीने में बाबा का दरवार काफी सुहाना हो जाता है। बाबा वैधनाथ कांवर और कांवरिया अतिशय प्यारा है। बाबा के दरवार में वही आते हैं जिन्हें बैधनाथ बुलाते हैं। इनके दरवार में दुनिया से थककर जब कोई भक्त आता है तो उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। सुलतानगंज से बाबाधाम की 105 किमी की कांवर यात्रा बहुत कठिन है, लेकिन बाबा की कृपा से बच्चे, बूढ़े साथ-साथ शरीर से लाचार व्यक्ति भी हंसते-हंसते दरबार पंहुच जाते हैं। श्रद्धा और भक्ति का अनूठा मिशाल देखना है तो एक बार सावन के महीने में बाबा के दरवार जाना होगा। ऐसी मान्यता है काशी स्थित विश्वनाथ की पूजा से मोक्ष मिलती है। उसी तरह बाबा से मोक्ष मिलती है। महाकाल की पूजा से अकाल मृत्यु नहीं होती इसी प्रकार मल्लिकार्जुन एवं अन्य ज्योतिर्लिंग के पूजा की महत्ता है लेकिन विश्व में एकमात्र देवधर वैधनाथ ज्योतिर्लिंग है जिसके दर्शन मात्र से प्राणियों के सारे पाप धुल जाते हैं और उन्हें केवल्य की प्राप्ति होती है। महर्षि नारद ने हनुमान जी से कहा था की यही वह धाम जहाँ भोले शंकर पाप और पुण्य का विचार किये बगैर सभी प्राणियों को मोक्ष प्रदान करते हैं। मत्स्य पुराण में बाबा नगरी को आरोग्य प्रदान मन गया है।
(सुरेश गांधी)


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें