भारत के छद्म सेकुलर ज़मातों में कितनी बेचैनी होती है जब भारत में नग्नता को प्रतिबंधित किया जाता हो या भारतीय संस्कृति के गलाघोटक नेहरूवियन स्वनाम लिख्खाड़ों जो जोक की भाँती संस्थानों के खून चूसते आये उनसे उन संस्थानों को मुक्त कराई जाती हो या भारत की समृध संस्कृति और ज्ञान जो आक्रन्ता मुग़ल और अंग्रेजो से इतर हो और उसपर गर्व करने की बात हो .भारत हज़ारों हज़ार वर्षो से वसुधैव कुटुम्बकम और पंथ निरपेक्षता को विश्व में पल्लवित करती आई है.अपने ज्ञान और विज्ञान से विश्व का मार्गदर्शन करती आई है तब जब विश्व में ना इसाईयत थी ना इस्लाम.जब विश्व अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ था तब इसी धरती पर ऋग्वेद का सृजन हुआ था.
इस्लाम की बर्वरता और इसाईयत का प्रहार ने हमारे साहित्य संस्कार को इस तरह से तोड़ मरोड़ कर गुलामी के काल में हमारे ऊपर लादा की हमने ये स्वीकार कर लिया की इस्लाम और इसाईयत ने भारत में आकर हमें नई और सभ्य जिंदगी दी?आज जब हम अपने अतीत को जानने समझने और अपनाने का प्रयास कर रहे है तो हमें ना जाने कितने अलंकारों से संवोधित किया जा रहा है.खैर यदि कुछ क्षणों के लिए बादल सूर्य को ढँक ले तो इसका मतलब ये नही की सूर्य शक्तिहीन हो गया या अपनी रौशनी समेट लिया हो वही हाल भारत की संस्कृति जो हिन्दू संस्कृति है का रहा है.भारत की संस्कृति महाभारत और रामायण की संस्कृति ही है ना की बाइबल और कुरआन की .ये मेरे या आपके कहने से नहीं है बल्कि इतिहास साक्षी है.यहाँ के कण-कण में वेद,उपनिषद ,रामायण,महाभारत और गीता का सन्देश ही छिपा है.विश्व में ये स्थापित मान्यता है जिसकी संस्कृति उसका राष्ट्र भारत में हिन्दुओ की ही संस्कृति रही है और यह भारत हिन्दू राष्ट्र ही है,इस तथ्य में कोई किन्तु परन्तु नही है और ना होगा,हमारी अपनी उपासना पद्यति अलग-अलग हो सकती है किन्तु सार्वभौम राष्ट्र की संस्कृति एक ही है और वो हिन्दू संस्कृति है.
आजकल भारत में गोश्त की सियासत चल रही है छद्म सेकुलरो के नेहरूवियन ज़मातों ने गोवध और गोश्त के बहाने एकबार फिर भारत को शर्मसार किया है.भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां गोवध कभी नही होनी चाहिए.कितु भारत की संविधान की धारा १४,१९ और २१ freedom of choice की गारंटी देता है इसकी गलत व्याख्या कर लोगो को भरमाया गया है. ये मुट्ठी भर ज़मात भारतीय संस्कृति में अमान्य गोवध और गोश्त पर सिआसत कर रहा है.
१५ सितम्बर १५ को उर्दू दैनिक*फारुकी तंजीम* रांची संस्करण ने अपने सम्पादकीय “गोश्त की सियासत” शीर्षक में लिखता है -....रामचन्द्रजी जब अयोध्या वापस हुए तो उन्होंने गाय की कुर्वानी दी थी........रामचन्द्रजी के दस्तरखान पर हर तरह के गोश्त परोसे जाते थे.......राज्य अहम आदमियो और दामाद के आमद पर गाय का गोश्त काटकर उसका गोश्त उन्हें खिलाना चाहिए......ब्राह्मण गाय के गोश्त का वह हिस्सा खाए जो रीढ़ की हड्डी से दूर रहता है.”जैसे अनर्गल मिथ्या और दुर्भावना से ग्रसित बातें लिखी है .यह हिन्दुओं की सहनशीलता है की ऐसे मनगढ़ंत और हिन्दुओ के धार्मिक मान्यता पर कुठाराघात करने बाले और लिखने बाले को इसलिए माफ़ करता है की वे इसी धरती के पूर्वजो के संतान और नासमझ हैं .अगर ये भारत के मूल पन्थो के बदले इस्लाम और इसाईयत पर मनगढ़ंत तो छोडिये जो सत्य है उसे लिखकर दिखाए तब उन ज़मातो की क्या हश्र होती है यह जगजाहिर है.
भारत के प्राचीन ग्रंथो की जिस कुटिल मानसिकता से अनुवाद हुआ उसका प्रतिफल ऐसे नेहरूवियन इस्लामी और इसाई संस्कृति विध्वंसको में दिख रही है.भारत के एक स्वनाम लेखक हुए नेहरुवियनो के आराध्य नाम है –राहुल सांस्कृत्यायन.उन्होंने एक पुस्तक लिखी है नाम है- “वोल्गा से गंगा” इस पुस्तक के पृष्ठ २२७ पर लिखते हैं-“..रंतिदेव के भोजनालय में प्रतिदिन दो हजार गाये मारी जाति थी,उनका गीला चमड़ा रसोईघर में रखा जाता था,उसी का टपका हुआ जल जो बहा,वही एक नदी बन गयी और चर्म से निकलने के कारण उसका नाम ‘चर्मण्वती’ पड़ा.” (स्मरण हो की आज का चम्बल नदी वही नदी है)हद तो गई ऐसे ऐसे लोगों की बौद्धिक वितंडवाद पर उनकी कुंठित मानसिकता पर .आखिर इतना बड़ा झूठ क्यों? राहुल सांस्कृत्यायन ने इस थोथी दलील को साबित करने के लिए जो तथ्य दिए वह विश्व के महान काव्य महाभारत के शांतिपर्व का श्लोक दिया है –
“महानदी चर्मराशेरूत्वलेदात् ससृजे यत:| तत्त्शचर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी” || (२९-१२३ गीतप्रेस)
(वहां भींगी पशुओं के चर्मराशि से जो जल बहता उससे एक विशाल नदी बन गयी जो चर्मण्वती {चम्बल}के नाम से विख्यात हुई.) अब यदि इस श्लोक के पूर्व के श्लोक को पढ़ें -
“उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तंसंशितव्रतम| ग्राम्यारणया महात्मानं रन्तिदेवयशस्विनम”||(२९-१२२ गीतप्रेस)
{कठोर व्रत का पालन करनेवाले ,यशस्वी महात्मा राजा रन्तिदेव गाँव और जंगलों के पशु अपने-आप यज्ञ के लिए उपस्थित हो जाते थे.}परन्तु राहुल संस्क्रत्यायन जैसे संस्कृत और संस्कार विहीन लोगो ने उसी नज़रिए से इस श्लोक को देखा जिसमे उनका परवरिश हुआ हुआ है. राजा रन्तिदेव के राज्य में दूध दुहने के लिए गायों के थन को धोने के लिए जिस जल का प्रयोग होता उससे एक विशाल नदी का प्रादुर्भाव हुआ.किन्तु कनक यानी सोना जैसे धातु देखा नही, कनक यानी गेंहू जैसा पौष्टिक अन्न देखा नही जिसने अपना जीवन कनक यानी धतूरा में जिया उससे कोई सोने और गेहूं की आशा कैसे कर सकता है?
किसी भी भारतीय वांग्मय में गोवध का उल्लेख नहीं है बल्कि संस्कृत की अपनी जानकारी के अभाव में मुलर और उसके नाजायज वंशजों ने अर्थ को अनर्थ बनाकर रखा जिसे देश में नेहरुवियनो के ज़मातों ने फैलाने का घृणित पाप किया. संस्कृत में एक वाक्य है –“प्रस्थम कुमारिका-मांसम आनय” इसका दो अर्थ है-१.कुमारी लड़की का एक सेर मांस लाओ २. कुमारी नामक ओषधिय पौधे का एक सेर गुदा लाओ . इसी तरह गोक्षुर का मतलब गाय का खुर या गोखरू नामक ओषधि भी है. अब यदि अंग्रेजी में देखें flesh का हिंदी अर्थ है जानवर की मांसल पेशियाँ या फलों और सब्जिओ का गूदेदार भाग उसी तरह संस्कृत में मांस का अर्थ भी होता है किन्तु विना सन्दर्भ समझे अपनी वुधिमता समाज पर थोपकर समाज को दिग्भ्रमित करने बाले गिरोहों ने भारतीय साहित्य के साथ बलात्कार ही तो किया है.
वेदों में गो को अघन्य यानी अवध्य माना गया है फिर गोवध की बात ही नही उठती है.जो लोग वेद में गोह्त्या करने की बात करते है वह मानसिक बिमारी से पीड़ित मार्क्स मैकाले मुल्ला और माइनो के मानस पुत्र है.ये ज़मात बेटी और पत्नी में फर्क नही समझ सकता क्योंकि दोनों की जाति एक यानी स्त्री ही तो है. शतपथ ब्राह्मण में एक श्लोक है-“एत द्रुह वै परमान्नाध्यम यय्न्मांसम”|{११.७.१.३.शतपथ ब्राह्मण} यदि अमरकोश में “परमान्न” का अर्थ देखे तो स्पष्ट है की-दुध,चावल और शक्कर मिलाकर बनाया गया व्यंजन परमान्न कहलाता है.{वर्तमान में खीर }चुकी अंत में मांसम लगा है तो खीर कैसे हो सकता है जो इस दृष्टिदोष के शिकार है उनके लिए तो यह व्यंजन मांस ही होगा.
भारत की समृद्ध साहित्य को जिसने सर्वाधिक क्षतविक्षत किया वह था कट्टर इसाई मैक्समुलर .इस अंध इसाई ने जो भड़ास अपने पत्र में लिखा वह दो संग्रहों में प्रकाशित है- १८६६ मुलर अपनी पत्नी को पत्र लिखता है ...This edition of mine and the translation of the Veda will hereafter tell to a great extent on the fate of India..Life and Letters of Frederich Max Muller vol-I.Ch.XV page 346 अपने पुत्र को लिखे पत्र में वह बाइबल को सर्वश्रेष्ट बताता है और लिखता है-----Would you say any one sacred book that is superior to all others in the world?....I say the New testament. Vol-II Ch.XXXII.page-339.१६ दिसम्बर १८६८ तत्कालीन भारत सचिव duke of Argyl को किस तरह से भारत में इसाइयत के प्रसार के लिए लिखता है ---The ancient religion of India is doomed and if Christianity does not step in,whose fault will it be. Vol-I.Chp-XVI,page 378 इतना ही नही मुलर जैसा भारत बिरोधी ब्रह्म समाज के श्री एन.के.मजुमदार को जो पत्र लिखा उससे स्पस्ट है की मुलर की मंशा क्या थी वह इस पत्र में लिखता है--Tell me some of your chief difficulties that prevent you and your countrymen from openly following Christ,..........India at least the best part of it,is already converted to Christianity.You want not pursuation to become a follower of Christ...The bridge has been built for you by those who came before you.Step boldly forward,it will not break under you.Vol-II.pp-415-416 यह व्यक्ति भारत के महान वेदों का जो अनुवाद किया वास्तव में इसने भारत की ज्ञान को विनाश में बदलने का पाप किया .
मैक्स मुलर ने जो किया वह किसी भी सार्वभौम राष्ट्र के द्वारा क्षमा के योग्य नही है .इन विदेशी अनुवादकों ने जिस तरह से भारत के साहित्य को तोड़-मरोड़ कर पेश किया उसका खामियाजा आजतक हम भारतीय भुगत रहे है.जो लोग Good governance is not food governance मानते हैं उन्हें समझना चाहिए की जैसा अन्न हम ग्रहण करते हैं वैसा ही हमारा तन-मन होता है.जैसा हमारा तन -मन होगा वैसा हमारा बुधि और सोच होगा इसी सोच के कारण जम्मू कश्मीर के अनंतनाग के लालचौक पर जन्माष्टमी के दिन गौकशी की जाति है.इसी सोच का नतीजा आज विश्व इस्लामी आतंक से ग्रस्त है. भारत की सनातन परम्परा में गौवध ना हुआ है और ना होगा जो मुलरों के अनुवादों के सहारे ये तोहमत लगाते आये है ऐसे लोग अपने ज्ञान को बढ़ाये .हम वैसे लोगों से जिन्होंने अपनी अधकचरी ज्ञान और मुलरों के अनुवादों के वैशाखी के सहारे चल रहे है वे इस धरातल पर आकर वेद,उपनिषद,पुराण,रामायण ,महाभारत या गीता का सही ज्ञान अर्जित करें. उन्हें अपनी कूपमंडूकता से निकलकर भारत की संस्कृति के उदात भावना को समझ कर गौवध या गौमांस को हिन्दू चिंतन से जोड़ने से बचना चाहिए.
---संजय कुमार आजाद---
शीतल अपार्टमेन्ट ,
निवारनपुर ,रांची-834002
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