भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारतीय जनता ने संविधान निर्माताओं के माध्यम से अपने सभी नागरिकों के लिए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के साथ-साथ विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और पूजा पद्धति की स्वतंत्रता, सामाजिक स्तर तथा अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त किया। इसी के आधार पर सभी नागरिकों के बीच में ऐसा भाईचारा विकसित करने की घोषणा की गई, जिसमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
संविधान का यही संकल्प देश के भीतर होने वाले शासकीय, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व धार्मिक क्रियाकलापों के सही दिशा में होने की जांच करने का मापदंड है। हमारे संविधान में कई संशोधन हुए हैं, आगे भी होंगे, परंतु भाईचारे, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की सुरक्षा पर कहीं समझौता नहीं हो सकता। दुर्भाग्य से दो-तीन हजार साल पहले हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था कायम हुई जो बाद में जातिवादी व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। इसमें बहुत बड़े श्रम आधारित वर्ग के शोषण की व्यवस्था बन गई, जिसके कारण समाज कमजोर हुआ और गुलामी का शिकार हो गया। विदेशी आक्रांताओं ने भी हमारी इस कमजोरी का अधिकतम लाभ उठाने के प्रयास किए और काफी हद तक इसमें सफल भी रहे। गुलामी के दौर में समाज को विखंडित करने की अनेक कुचालें चलकर देश को और ज्यादा कमजोर करने के षड्यंत्र होते रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन में इन कड़वी सच्चाइयों का अनुभव होने के कारण ही देश-समाज में आ चुकी विसंगतियों को दूर करने के लिए ही संविधान की प्रस्तावना में उपरोक्त संकल्प लिया गया और उसकी पूर्ति के लिए प्रावधान किए गए। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए दलित व जनजातीय समुदायों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया, जो दस वर्ष के लिए था और इन शोषित समुदायों को सकारात्मक प्रतिस्पर्धा में बराबरी पर लाने, सामाजिक, आर्थिक न्याय दिलाने के लिए जरूरी समझा गया। इसका कुछ तो लाभ इन समुदायों को पहुंचा भी, परंतु पिछड़ेपन की समस्या का सबके लिए समाधान इससे संभव भी नहीं था, क्योंकि सरकारी नौकरी में उसे चार प्रतिशत लोगों को ही खपाया जा सकता है।
शेष को तो अलग-अलग व्यवसायों में रोजी कमानी ही पड़ेगी। जो आरक्षण का लाभ उठाकर सरकारी नौकरी में आ गए उन परिवारों की अगली पीढ़ी शिक्षा में भी आगे बढ़ी। इससे आरक्षण का लाभ बार-बार उन्हीं परिवारों को मिलता गया। इससे शोषित वर्ग के भीतर एक समृद्ध वर्ग का उदय हुआ, परंतु शेष शोषित समुदाय की समस्याएं बनी रहीं। समाज में धीरे-धीरे सरकारी नौकरी की प्रतिष्ठा और आर्थिक स्तर अपेक्षा और जरूरत से ज्यादा गति से बढ़ते गए। इससे अन्य पेशों के मुकाबले हर कोई सरकारी नौकरी के प्रति लालायित होने लगा। एक तरफ सिफारिश और अन्य तरह की तिकड़में लगाने का दौर चल पड़ा, तो दूसरी ओर आरक्षण एक राजनीतिक हथियार बनता चला गया। मंडल आयोग के लागू होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्गों को भी आरक्षण मिल गया। तब से हर जाति में अन्य पिछड़ा वर्ग में स्थान बनाने की होड़ मची है।
इसने बिलकुल नई तरह के जातिवादी, धु्रवीकरण और जातिवादी राजनीति को जन्म दिया। वोट बैंक की राजनीति फलने-फूलने लगी है, जिसके सांप्रदायिक रूप भी प्रकट होने लगे हैं। इसके मुकाबले समृद्ध जातियां भी आरक्षण पाने की होड़ में शामिल हो गई हैं। जाट, गुज्जर और पाटीदार आरक्षण आंदोलन इसी श्रेणी में आते हैं। हाल में गुजरात के समृद्ध पटेल समुदाय ने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग में एक उग्र आंदोलन किया है। इस आंदोलन ने एक समय हिंसा का रूप धारण कर लिया, जिससे संपत्ति का नुकसान हुआ और आठ लोगों की जान गई। हालांकि आरक्षण के मसले पर यह कोई पहला आंदोलन नहीं है और ऐसा भी नहीं माना जा सकता है कि यही आखिरी होगा। आरक्षण को लेकर पहले भी कई आंदोलन हो चुके हैं। गुजरात के पटेल समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग की हालिया घटना आरक्षण के मुद्दे पर नए सिरे से एक गहन व व्यापक बहस की जरूरत महसूस करवा रही है।
हालांकि उच्चतम न्यायालय ने आदेश पारित किया है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता, फिर भी कुछ प्रदेशों में जैसे कि तमिलनाडु, केरल आदि में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण का प्रावधान है। बहुत से राजनीतिक दल आरक्षण की सीमा बढ़ाने की वकालत करते रहते हैं, तो क्या सरकारी नौकरी में आरक्षण को शोषण मुक्ति का एकमात्र मार्ग मान लिया गया है। सरकारी नौकरी में जो 97 प्रतिशत जनता नहीं खप सकती है, उसका भविष्य क्या होगा। आरक्षण का प्रश्न वर्तमान विकास मॉडल की विसंगतियों से भी जुड़ा हुआ है। पूंजीवादी विकास मॉडल का प्राण तत्त्व तकनीक है। इसमें मानव के बजाय मशीन को प्राथमिकता दी जाती है और यह मशीनीकरण हर स्तर पर केंद्रीयकरण की प्रक्रिया को जन्म देता है। इसके कारण संसाधन कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाते हैं और रोजगार के अवसर बहुत सीमित हो जाते हैं।
भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में रोजगार के अवसरों का पैदा न होना एक विस्फोटक स्थिति को जन्म देता है। हमारे राजनेता इस स्थिति को आरक्षण से जोड़कर और भी भयावह बना देते हैं। आज जब हम स्किल इंडिया की बात कर रहे हैं, तो प्रकारांतर से बेरोजगारी की समस्या को गांधीवादी तरीके से हल करने की दिशा में ही जा रहे हैं। गांधी ने बहुत पहले ही इस बात को पहचान लिया था कि भारत में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए स्वरोजगार एक अनिवार्य तत्त्व है और स्वरोजगार के लिए ‘हाथ में गुण’ होना जरूरी है। उन्होंने इसी लिए शारीरिक श्रम को महत्ता प्रदान की थी और उनकी यह कोशिश थी कि शिक्षा विचारों की जुगाली पैदा करने वालों के बजाय खेतों में काम करने वाले हाथ भी पैदा करे। गांधी की यह मान्यता आज भी भारत के लिए उतनी ही प्रासंगिक है। स्वरोजगार और लोगों को सक्षम बनाकर ही भारत से बेरोजगारी दूर भगाई जा सकती है। दुर्भाग्य से इस दिशा में पहल करने की बात तो दूर, इसके बारे में सोचना भी बंद कर दिया गया है।
बेरोजगारी की समस्या का जवाब समाज को खोजना है और ऐसे जातिवादी उन्माद पैदा करने वाले नेताओं से बचना होगा, क्योंकि ये लोग संविधान की मूल भावना के विरुद्ध काम करके नागरिकों में भाईचारा नष्ट करने का कार्य करते हैं। ये लोग शोषण मुक्ति के लिए व्यापक प्रयासों को तीन प्रतिशत लोगों की सरकारी नौकरी की लड़ाई तक सीमित करके दिग्भ्रमित कर देते हैं। असली लड़ाई तो हर व्यवसाय, जिसमें कृषि और पशुपालन मुख्य है, को लाभकारी और सम्मानजनक बनाना है। इसी से सबकी समस्याओं का समाधान होगा। सौ प्रतिशत समाज कभी सरकारी नौकरी में नहीं खपेगा। इसलिए आरक्षण को सही परिप्रेक्ष्य में समझ कर पुनः परिभाषित करने का समय आ गया है, ताकि समाज को आगे बढ़ने की सही दिशा मिले और हर वर्ग के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त हो।
अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान
चिपको सूचना केंद्र,
कामला, चंबा, हिमाचल प्रदेश )

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें