आखिरकार बिहार की सत्ता मे बदलाव नही हुआ और राज्य के 34वें मुख्यमंत्री के रूप मे नीतीश कुमार एक बार फिर बिहार की कमान सम्भालेगें ।बिहार में महागठबंधन को पूर्ण बहुमत मिल गया है और दिल्ली के बाद एक बार फिर बिहार में एनडीए को मुंह की खानी पड़ी है। इस हार से यह पता चलता है कि मोदी की लहर अब थम गयी है और बिहार की जनता ने मोदी को पूरी तरह से नकार दिया है।दिल्ली के बाद बिहार के लोगों ने भी मरेदी के पिजयी रथ को रोक दिया है जिसका हरीयाणा ,महाराष्ट्र और झारखण्ड के लोगों ने स्वागत किया था इस जीत ने जहां एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बिहार में नीतीश का कोई विकल्प नहीं है, तो वहीं दूसरी तरफ इस जीत ने लालू को भी बिहार की सियासत में एक नई संजीवनी दे दी है। महागठबंधन की इस जीत का असर काफी दूर तक जाएगा। इस हार से बीजेपी के लिए आने वाले दिनों में परेशानी और बढ़ेगी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के करिश्माई नेतृत्व पर सवाल उठेंगे।हार के बाद बीजेपी को सियासी हार का डबल
डोज मिल गया है। इस चुनाव में हार के हाद बीजेपी के चुनाव प्रचार अभियान, बूथ मैनेजमेंट और रणनीति पर भी सवाल उठेंगे। बीजेपी ने बिहार में जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना हर दांव चला। चुनाव के पहले बिहार को 1.25 लाख करोड़ रुपये का पैकेज दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली सब में सुधार का वादा किया। लेकिन जनता को बीजेपी के वादों पर एतबार नहीं रहा। बीजेपी ने जनता को जंगलराज से डराने की कोशिश की लेकिन जनता पर इसका उलटा असर हुआ। महिलाओं, मुसलमानों और पिछड़े तबके के लोगों ने नीतीश और लालू की जोड़ी पर पूरा भरोसा जताया। शायद ही किसी राज्य के चुनावों ने समूचे देश मे ऐसी हलचल और उत्सुकता पैदा की हो जितनी बिहार के 15वें विधान सभा चुनावों ने पैदा की है ।कई मायनों मे बिहार का ये चुनाव न केवल पिछले चुनावों से अलग था वरन देश के दूसरे राज्यों के विधान सभा चुनावों से भी अलग था ।भाजपा के लिये ये चुनाव कितना अहम था कि मोदी को बिहार मे दो दर्जन से अधिक चुनावी सभाऐं करनी पड़ी ।
देश के चुनावी इतिहास मे ये पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री ने राज्य के चुनावा मे इतनी सभाऐं की हों ।नीतीश की वापसी से ज़्यादा लालू यादव का बिहार की राजनीति मे दोबारा उदय इस चुनाप की अहम बात है ।नतीजे बता रहें हैं कि लालू आज भी बिहार चुनाव और राजनीति के लिए प्रासंगिक बने हुए हैं ।शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इस बार भाजपा या जदयू नही वरन लालू का राजद बिहार विधान सभा मे सबसे बड़ा दल बन कर उभरेगा । एसे समय में जब लगने लगा था कि लालू का राजनीतिक भविष्य अब संकट में है और यहां से मुख्यधारा की राजनीति में आना इतना आसान नहीं है, ऐसे में बिहार चुनाव ने लालू को राजनीतिक जीवनदान
दिया है। जो मुकाबला पहले मोदी बनाम नीतीश दिख रहा था वह आगे बढ़ने के साथ मोदी बनाम लालू हो गया था।चुनाव बाद नतीजों ने भी साबित कर दिया कि असल मुकाबला किसके बीच था । बिहार के सामाजिक ताने बाने और जातीय समीकरण के बीच इस चुनाव में बेशक लालू कहीं ज्यादा ताकत से उभर कर सामने आए हैं और हो सकता है कि भविष्य मे इसका खामियाजा नीतीश कुमार को ही भुगतना पड़े।लेकिन नतीजों के फौरन बाद लालू और राजद के बड़े नेताओं ने जिस तरह से नीतीश के नेतृत्व पर भरोसा जताया है उससे तो यही लगता है कि फिलहाल लालू के लोग चुनाव पूर्व हुये मुहावदे यानी नीतीश के पीछे चलने के लिये तैयार हैं ।लालू यादव ने साफ कर दिया है कि , नीतीश कुमार ही होंगे बिहार के सीएम।
बिहार के नतीजे इस बार कई सवालों के जवाब देरहें हैं जो इससे पहले किसी चुनाव मे नही उठे थे ।नतीजों ने साफ कर दिया कि अक्सर चुनाव रैलियों मे भीड़ का आना और उसका उत्साह वोट मे नही तब्दील होता है ।बिहार मे प्रधानमंत्री की चुनावी रैलियों मे भीड़ तो उमड़ी लेकिन उसने उस पैमाने पर ईवीएम मे भाजपा का बटन दबाने से इंकार कर दिया ।बिहार की जनता ने ये भी जवाब दे दिया कि तमाम राज्यों मे अब केवल मुस्लिम वोटों का बंटवारा ही भाजपा की जीत का सूत्र नही बन सकता ।मीडिया प्रबंध और विज्ञापन वार से हवाई दावों के जरिये भी मैदान फतह नही किया जा सकता है ।ये कहने मे भी कोई संकोच नही कि बिहार जनता ने लालू यादव के उस जंगल राज्य के लिये उन्हें माफ कर दिया जिसके चलते वह एक दशक पहले कुर्सी से उतारे गये थे ।कहतें हैं कि सियासत मे वही कामयाब होता है जो हवा का रूख भांप कर सियासी चाल चले ,बिहार चुनाव मे आरजेडी सुप्रिमों ने ये काम बड़ी खूबी से किया ।भाजपा की करारी हार ने ये भी सवाल पैदा कर दिया कि क्या अब मोदी जी के काम पर सवाल खड़े हो रहे हैं ? जनता को उनके वादे ,मन की बात और तमाम घोषणऐं केवल कागजी लगने लगी है ।माना जा रहा है कि बिहार के नतीजों का देश की राजनीति पर खासा असर होगा ।बिहार का जनादेश उन मुद्दों का जनादेश है जो इस समय देश के सामने है । आने वाले सालों मे असम, उत्तर प्रदेश, पंजाब, बंगाल में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों पर इसका साफ़ असर दिखेगा । सबसे बड़ा असर ये होगा कि भाजपा के विपक्ष में नए समीकरण बनेंगे। एनडीए के घटक दलों पर मोदी की पकड़ भी कमजोर पड़ सकती है ।नतीजों के फौरन बाद महाराष्ट्र मे भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने साफ कहा कि ये हार मरेदी की हार है और आज अगर महराष्ट्र मे चुनाव हो तो ऐसे ही नतीजे आयेगें ।यही नही शिवसेना ने ये भी कहा कि नीतीश कुमार देश के राजनीतिक पटल पर भी उभर सकते हैं । बिहार के चुनाव देश का राजनीतिक एजेंडा भी तय करने वाला है। आरएसएस का दृष्टिकोण भी इस चुनावों के नतीजों से प्रभावित होगा। उदाहरण के लिए आरक्षण मुद्दे पर मोदी के एजेंडे को संघ को स्वीकार करना पड़ सकता है ।
चुनावों से ठीक पहले संघ ने आरक्षण नीति की समीक्षा करने की मांग की थी, जबकि बाद में मोदी ने चुनावी सभा में कहा था कि उनके जीते जी आरक्षण नहीं हटेगा।दरअसल, बिहार के नतीजों को देश की नब्ज टटोलने के रूप मे भी देखा जा रहा हैं कि पिछले डेढ़ साल में मोदी की स्वीकार्यता कितनी मजबूत हुई है।वह अब अपने राजनीतिक एजेंडे को अधिक आत्मविश्वास और शक्ति के साथ लागू करने की स्थिति में नही होंगे , उनके लिए चुनौतियां लंबे अरसे तक कम हो जाएंगी।पार्टी के भीतर मोदी के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू हो सकता है। उनकी निजीकरण की प्रक्रिया से पार्टी के बहुत से नेता दुखी हैं, ख़ुद बिहार के कई नेता मोदी के ख़िलाफ़ बयान दे चुके हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत और भाजपा गठबंधन की हार के कई कारण हैं।महागठबंधन के लिए सबसे बड़ा फायदा हुआ नीतीश का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होना। ऐसे में लोगों को लालू के साथ गठबंधन के बावजूद नीतीश के भीतर लोगों का भरोसा बरकरार रहा।बिहार में छोटी जाति के लोगों ने महागठबंधन पर अपना भरोसा जताया। लोगों सामाजिक मुद्दों पर महागठबंधन का साथ देते हुए अपना वोट दिया। जिस तरह से नीतीश कुमार ने बिहार में पिछलें सालों में विकास किया उसने लोगों का मोह नीतीश से भंग नहीं होने दिया।वहीं अगर भाजपा गठबंधन की हार पर नजर डालें तो कई ऐसी वजहें हैं जिसके चलते बिहार में भाजपा गठबंधन की हार हुई है। इस चुनाव का सांप्रदायिकरण होना ही भाजपा गठबंधन के लिए खतरनाक साबित हुआवहीं भाजपा गठबंधन में सीटों का बंटवारा भी इस गठबंधन की हार की अहम वजह बना। भाजपा के अलावा अन्य पार्टियों ने अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शन नहीं किया। देखा जाए तो अगर भाजपा अपने बूते पर ज्यादा सीटें लड़ती तो मुमकिन था कि वह अधिक सीटें जीत पाती। बहरहाल इन छोटी-छोटी पार्टियों के चलते वोटों का बंटवारा हुआ जिसका भुगतान भी भाजपा को करना पड़ा। नेताओं के बिगड़े बोल, मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया गया बयान और दादरी कांड को हवा ने भी अपनी भूमिका निभई है। बतौर सीएम पहले भी नीतीश कुमार लोगों की पहली पसंद थे। यही कारण रहा कि नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन को चुनाव लड़ने का फायदा मिला। बीजेपी ने इस बार नीतीश कुमार को कमजोर समझने की जो गलती की है, उसकी वजह से पार्टी को खासा नुकसान हुआ है। पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के पैटर्न को फॉलो करते हुए भाजपा ने बिहार में भी अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया था। भाजपा की इसी रणनीति को नीतीश ने अपना चुनावी मुद्दा बनाकर बिहारी बनाम बाहरी के नारे पर चुनाव लड़ा। इसकी एवज में प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने धुंआधार चुनावी रैलियां की। इन रैलियों में मोदी का प्रधानमंत्री होना तो कारगर रहा परन्तु अमित शाह को बाहरी मानकर बिहार की सरकार ने स्वीकार नहीं किया। बिहार जैसे राज्य में जहां आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करती है, दाल की बढ़ती कीमतों ने खेल
कर दिया। मोदी के विकास का नारा यहां काम नहीं आया वरन महंगी होती दाल ने भाजपा के समर्थन में खड़े वोटरों को सोचने पर मजबूर कर दिया। मोदी की अगुवाई में भाजपा एक ऐसा संगठन बन गया है जहां हर फैसला आलाकमान के निर्देशों पर होता है। बिहार में भी यही हुआ। यहां स्थानीय मुद्दों और पार्टी के स्थानीय नेताओं की अवहेलना की गई। साथ ही शत्रुघ्न सिन्हा, लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ लोगों को चुनाव प्रचार से दूर रखा गया। इस मुद्दे पर शत्रुघ्न सिन्हा और आर. के. सिंह जैसे लोगों ने सार्वजनिक तौर पर अपनी शिकायत भी जाहिर की। इन सभी बातों ने राज्य में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में मदद की । प्रधानमंत्री ने नीतीश कुमार तथा लालू प्रसाद यादव पर सीधे व्यक्तिगत हमले किए जिनका खामियाजा भी पार्टी को भुगतना पड़ा। यही उनके साथ दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी हुआ था ।
बीजेपी के सहयोगी दल एलजेपी, आरएलएसपी और हम ने पिछड़े तबके के वोट में सेंधमारी करने में नाकाम रही और ये वोट बैंक महागठबंधन की तरफ चला गया जो चुनाव में जीत हार में निर्णायक साबित हुआ।अब भाजपा मे जब हार के लिए सिरों पर ठीकरे फोड़ने वालों की तलाश की जाएगी तो पता चलेगा कि वह हार के लिये किासको गुनहगार मरनती है । बहरहाल शॉटगन से पहले ही घायल हो चुकी थी भाजपा, अब पहुंची कोमा में है।नीतीश कुमार सत्तर साल के बिहार मे जनता वरिवार के 14 वें सीएम होगें ।साल 2005 और 2010 के बाद एक बार फिर बिहार की जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकार चुनी है। नई सरकार से जनता को बड़ी उम्मीदें हैं। जिसपर खरा उतरना महागठबंधन की सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी ।
** शाहिद नकवी **

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