कांग्रेस की थैली से जैसे जैसे सिक्कों की खनक कम होती जा रही हैं वैसे वैसे कांग्रेसियो की सहन की क्षमता भी कम होती जा रही है? जिस हनक में यह परिवार और इसके चाटुकार जीते रहने के आदि रहे है उसका हास होने की स्थिति में पुरे कुनबे को सनक जाना क्या मानवीय फितरत या कुछ और है.खासकर नेहरु गांधी परिवार के कुनवे की परवरिश तो हमेशा देश के खजानो से ही होता रहा है.जनता की गाढ़ी कमाई से दिया गया टेक्स से,नेहरुगान्धी परिवार के पालकी ढ़ोने वालों ने, ऐसी नीतिया बना रखी ताकि सरकारी खर्चे पर अपनी दरियादिली का इज़हार कर यह परिवार भारत के भोले भाले जनता पर अपना जादू बरकरार रख सके . भला हो इंटरनेट का जो इस परिवार की काली करतूतों और स्याह चेहरा को धीरे धीरे बेनकाव कर रही है.
अभी हाल में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी के जीवन से जुड़े जो दस्तावेज ज़ारी हुए उससे नेहरु की छवि देश में खलनायक की भूमिका में आ रही है.रही इंदिरा गांधी की बात तो देश में आपातकाल लागू कर लोकतंत्र के प्रति कैसी भावना रखती थी किसी से छिपा नही था. और मिस्टर क्लीन के लवादा में राजिव गांधी १९८४ के सिख दंगो में वैसे नरसंहारक के रूप में थे जिसके कुकृत्य से हिटलर भी पीछे छुट गया था.ऐसे तीन लोगों के छवि फिरकापरस्त कांग्रेस ने मिडिया और सरकारी पैसे के सहारे जो बना रखी थी उसका तिलिस्म टूटते देख इस परिवार के वारिशो को आपे से बाहर होना समीचीन है क्या ?
अभी कुछ दिन पूर्व श्री जवाहर लाल नेहरु के जन्मदिन पर कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने जिस तरह का स्यापा रची वह कांग्रेस की कुटिल मानसिकता का परिचायक था.श्रीमती सोनिया गांधी ने जिस तरह के अनर्गल आरोप केंद्र के मत्थे मढ़ी वह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है.किन्तु कांग्रेस को लोकतंत्र के प्रति आस्था ही कब रही जो वह इसका ख्याल रखेगी?भारत विभाजन कराकर सत्ता का स्वाद चखने बाली कांग्रेस ने कभी भी देश हित को सर्वोपरि नही रखा इसकी चिंता सिर्फ और सिर्फ सत्ता पर काबिज रहने की हथकंडों में बीता.वरना भारत से पीछे विदेशिओं के हाथों मुक्त हुए देश हमसे आगे नही निकलते.हम विकास तो दूर अपनी बुनियादी सुविधाओं जैसे रोटी कपडा और मकान के लिए तरस रहे है.ऐसी शिक्षा नीति और सामाजिक वातावरण बनया की आज भी हम गुलाम मानसिकता में जीने को आज़ादी समझ रहे है.
श्रीमती सोनिया गांधी जिस तरह की पुत्रमोह में ग्रसित है वह भारत के लोकतंत्र के लिए घातक है.एक अयोग्य को ज़बरदस्ती लोकतंत्र के ढाँचे में फिट करने को बाबली कांग्रेस अध्यक्षा जिस रीतिनीति को अपना रही है वह आज़ादी के पूर्व की सामाजिक विषमता को ही उभार रही है और यह उभार भारत की एकता और अखंडता के लिए घातक है.खैर एक माता के लिए अपने पुत्र की चिंता लाजिमी है ?
इसी तरह फिरकापरस्त तंजीम कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के पुत्र और इसी तंजीम के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने अपने मरहूम दादी के जन्म दिवस पर जो बोल बोले वह इस खानदान पर टाट के पैबंद के सामान है.जिस तरह से देश के वर्तमान प्रधानमन्त्री के प्रति अपनी भडास निकाली वह भी उस मुद्दे को लेकर जिसके गुनाहगार राहुल खुद है वह उनके मानसिक दिवालियेपन को दर्शाता है.बिहार विधानसभा में कुछ सीटों को जीतकर जिस अभिमान का प्रदर्शन वो कर रहे है वह निंदनीय है.
पिछले दो लोकसभा चुनावों में जिस तरह से भारत के प्रधानमन्त्री को यह परिवार अपने कैद में रखे था और अपने इशारों पर नचाता आया उससे मरहूम होते ही उसकी तडपन इस कदर होगी जैसे जल बिन मछली की तड़पन होती है और उस तड़पन में वे क्या बोल रहे है मानो उन्हें खुद स्मरण नही हो चेहरे का हावभाव और मुंह के बोल विपाश्ना के बावजूद भी नही सुधर पाई?
आरोप श्री राहुल गांधी के नागरिकता पर लगाया गया है. श्री राहुल के द्वारा समर्पित एक कम्पनी जिसके उच्च ओहदे पर राहुल खुद है उसके दस्तावेजों में इन्होने खुद को ब्रिटिश नागरिकता होने की बात स्वीकारी है.इसकी सुचना ना तो लोकसभा चुनावों में दिए अपने हलफनामे में दी और ना ही भारत सरकार को इसकी सुचना है. इसी कागज़ात के आधार पर राहुल के भारतीय नागरिकता पर श्री सुब्रमण्यम स्वामी ने सबाल खड़ा किया है.
भारत में दोहरी नागरिकता लागू नहीं है यदि इन्होने उस दस्तावेज में खुद को ब्रिटिश नागरिकता स्वीकारा है तो इनके भारत की नागरिकता स्वत: समाप्त हो जाति है. इसके बाद ये भारत में चुनाव नही लड़ सकते है?यदि इन्होने इसकी सुचना भारत सरकार को नही दी है और चुनाव जीत चुके है तो अब इनकी सदस्यता रद्द होनी चाहिए और इनके ऊपर कानून सम्मत कारवाई होनी चाहिए. मुद्दा श्री स्वामी ने उठाया वह भी राहुल जी द्वारा दिए दस्तावेज के आधार पर फिर इतनी तीखी मिर्ची क्यों लगी ?
यदि ये गलत है तो श्री स्वामी पर इन्हें तुरंत मुकदमा करना चाहिए. इस पुरे प्रकरण में केंद्र सरकार कहाँ है? राहुल की स्थिति खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे बाली है.जिस अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल अपनी दादी के जन्मदिन पर राहुल ने देश के प्रधानमन्त्री के लिए किया वह अत्यंत निंदनीय है.देश के प्रधानमन्त्री को कोसने के बजाय अपने कुकृत्यों को सुधारने का प्रयास करे तो ज्यादा वेहतर होता.
माँ-बेटे ने नेहरु और इंदिरा के जन्मदिन पर जो स्यापा किया वह फिरकापरस्त कांग्रेस का चाल और चरित्र को उजागर करता है. एक विपक्ष के रूप में कांग्रेस अभी भी अपने आप को खडा नही कर पा रही है. हताशा और निराशा में जिस असहिष्णुता के नाव पर चढ़ बिहार के चुनावी बैतरनी में दो-चार पा ली है वह इसके इस रवैये से जन्नत के बजाय जहन्नुम में ले जा सकती है?क्या कांग्रेस का वैचारिक पतन हो चूका है?
भारतीय राजनीति का वर्तमान स्तर जिस तरह से निचे गिर रही है वह लोकतंत्र को कलंकित कर रही है और इस हमाम में सत्ता और विपक्ष दोनों नगे है? शालीनता और शिष्टाचार को तिलांजली देकर हम इसी तरह आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नही जब लोकतंत्र गुण्डातन्त्र में तब्दील हो जाएगी?लोकतंत्र में जनता की आवाज विपक्ष होती है .देश का दारोमदार विपक्ष के आलोचनाओं पर टिका होता है किन्तु वर्तमान में विपक्ष जिस रास्ते को अख्तियार किये है वह चिंतनीय है. देश की एकता और संप्रभुता के साथ खिलवाड़ करती विपक्ष लगता है की वह भारत के संस्कार और संस्कृति के बजाय विदेशियो की आवाज है.जिस भाषा का इस्तेमाल श्रीमती सोनिया गांधी और श्री राहुल गांधी कर रहे है वह ना तो लोकतंत्र में विपक्ष की भाषा हो सकती है और ना ही इससे कांग्रेस का वैचारिक स्तर ऊँचा हो सकता है.
संजय कुमार आज़ाद
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