आलेख : जब तबले की बोल जीवंत कर देते थे ‘लछू महराज‘ - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

आलेख : जब तबले की बोल जीवंत कर देते थे ‘लछू महराज‘

विश्व विख्यात तबला वादक पद्मश्री लच्छू महाराज को भारत सरकार ने 1972 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा था लेकिन उन्होंने उस वक्त पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। वह कहते थे कि किसी कलाकार को अवार्ड की जरूरत नहीं होती। श्रोताओं के दिल से निकली वाह और तालियों की गड़गड़ाहट सबसे बड़ा पुरस्कार है 



lachhu-maharaj
बनारस घराने के प्रख्यात तबला वादक पद्मश्री लक्ष्मी नारायण सिंह उर्फ लच्छू महाराज की थिरकने वाली अंगुलियां खामोश हो गईं। कहते है जब उनकी अंगुलियां तबले पर पड़ती थी तो लोग मंत्रमुग्ध हो झूमने लग जाते थे। उन्होंने अपनी बोल ‘ताक धिन धिन्ना‘ को सिद्ध कर अनोखा बना दिया जो तबला जगत में हमेशा याद किया जायेगा। यह उनकी खासियत ही थी कि जब तबला वादन करते थे तो श्रोताओं के साथ रुहानी रिश्ता कायम कर लेते थे। वे बनारस का शुद्ध बाज तो बजाते ही थे, साथ ही अन्य घरानों की बंदिशें भी उसी घराने की वादन शैली के अनुरूप ही प्रस्तुत किया करते थे। तबला के वह खजाना थे। पूरी दुनिया घूमी लेकिन ठीहा बनारस ही बनाया। बनारस उनके रोम-रोम में बसा हुआ था। वह कहा करते थे, ..‘काशी कबहूं न छोड़िये विश्वनाथ दरबार‘। अंतिम सांस भी उन्होंने काशी में ही ली। उनके जाने के बाद तबलावादन करने वालों की दुनिया में बड़ी कमी का अहसास होगा। उनकी पांच घरानों-लखनऊ, इजरास, पंजाब, दिल्ली और बनारस पर समान पकड़ थी। उनकी थाप, तबले पर जब पड़ती तब मानों तबला बोल उठता था। वह सोलो तबलावादन के तो मास्टर थे। मंच से ज्यादा उन्हें आंतरिक खुशी तब मिलती थी जब वह अपनों के बीच तबला वादन करते थे। यह उनका फक्कड़पन ही था जो उन जैसी ऊंचाई पर पहुंचे कलाकारों में दुर्लभ दिखता है। शिष्यों को भी सिखाते वक्त, पूरी रौ में रहते थे। लच्छू महाराज का निधन संगीत जगत की बड़ी क्षति है। वह किशन-युग के अंतिम तबला वादक रहे जिनकी पूरी दुनिया कायल हुई। स्वतंत्र तबला वादन के क्षेत्र में आधी सदी के कालखंड में उन-सा कोई दूसरा नहीं हुआ, उन्हीं का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। तबला उनके लिए खिलौना था। तबले के बोल को जीवंत करने की क्षमता उनमें थी। कहा जा सकता है उनके तबले का एक युग समाप्त हो गया। लेकिन उनके द्वारा रिकार्ड की गयी एलबमों और संगीत समारोहों में वह सदा जीवित रहेंगे। जब जब तबले के बनारस घराने की चर्चा होगी, उनके नाम की चर्चा होगी। उनके शिष्यों द्वारा उनकी परंपरा सदैव आगे बढ़ती रहेगी।  

तबले में क्या नहीं जानते थे, लेकिन घमण्ड एकदम नहीं था। थोड़ा मिजाजी थे, अपने आप में ज्यादा रमे रहते थे। इसलिए लोग उन्हें गुस्सा वाले समझते थे। ऐसा नहीं था, वह नरम दिल इंसान थे। फिल्म अभिनेता गोविंदा उनकी बड़ी बहन निर्मला अरुण के पुत्र हैं। गोविंदा, लच्छू महाराज का बहुत चहेता रहे और गोविंदा भी इन्हें ज्यादा मानते थे। वह मुम्बई में फिल्म शूटिंग में थे, लेकिन सूचना मिलते ही शूटिंग छोड़ घर लौट गए। लच्छू महाराज का जन्म 16 अक्टूबर 1944 को संकटमोचन इलाके में हुआ था। उनके पिता वासदेव सिंह देश के चोटी के तबला वादको में से थे। बचपन में तबले के प्रति ललक देख उनके पिता वासुदेव सिंह भी बखूबी उनका साथ दिया। शायद यही वजह रही कि बचपन से ही उन्हें तबले की ध्वनि आकर्षित करती थी। इससे यह पता चलता है कि उनके मन में तबला सीखने की कितनी ललक थी। जैसे जौहरी हीरे की परख कर लेता है, वैसे ही उनके पिता ने भी लच्छू के अंदर छुपे कलाकार को पहचान गये और तरह-तरह की विधाओं से उन्हें निपुण करते रहे। वह अपने पिता के ही सानिध्य में रियाज करते रहे। पिता के आशीर्वाद और अपनी मेहनत और लगन से वह एक कुशल तबला वादक बन गये। शीघ्र ही उनका नाम सारे भारत में लोकप्रिय हो गया। अपने वादन के चमत्कार से उन्होंने बडी-बडी संगीत की महफिलों में श्रोताओं का मन मोह लिया। सधे हुए हाथों से जब वे तबले पर थाप मारते थे तो श्रोता भाव विभोर हो जाते थे। दायें और बायें दोनों हाथों का संतुलित प्रयोग आपके तबला वादन की विशेषता थी। 14 साल की उम्र से ही जब संगीत की दुनिया में अपने तबले की आवाज बिखेरी तो फिर थमा नहीं। खास यह रहा कि प्रारंभिक शिक्षा और कॉलेज के बाद उन्होंने कला के क्षेत्र में अपने आप को स्थापित करना शुरू कर तो पलट कर पीछे नहीं देखा। ठान लिया कि अपने तबले की आवाज को दुनिया भर में बिखेरेंगे। जिस तरह पं. लच्छू महाराज ने अपने पिता पं. वासुदेव नारायण सिंह से तबले की बारीकियां सीखी थीं, उसी तरह उन्होंने उसे अपने शिष्यों को भी सिखाया। उनकी शिष्य परंपरा में सैकड़ों तबला वादकों के नाम दर्ज हैं जो विभिन्न देशों में अनूठे वादन कौशल का प्रदर्शन कर गुरु का नाम रोशन कर रहे हैं। एक बार एक बड़े संगीतकार बेटे को लेकर उनके पास आये थे। बोले, इतना सिखा दीजिये कि आजीविका चला सके। गुरुजी खफा हो गए। बोले, संगीत साधना है। संगीतकार को लौटा दिया। यही भाव उन्होंने भतीजे प्रशांत के साथ शमशेर मेहंदी, सदानंद सिंह, रामाश्रय पांडेय, बबलू मुखर्जी समेत शिष्यों में भी जगाए। वास्तव में जौहरी पिता वासुदेव प्रसाद सिंह से यह सीखा उन्होंने। जिनकी कला की भूख कलाकारों की सेवा-सत्कार से मिटती तो बच्चों में बंटती थी। सीधा संदेश था, संगीत-कला कमाने खाने की चीज नहीं, यह तो दिलों को सजाने और छा जाने की चीज है। इसे उन्होंने दिलो-दिमाग में बैठाया। इसने ही उन्हें हर दिल अजीज बनाया। 


72 वर्षीय पं. लच्छू महाराज ने बॉलीवुड की कई फिल्मों में भी ताल दिया था। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समारोहों और एलबमों में अपने तबले का दम दिखाते रहे। परिणाम यह हुआ कि भारत में तो ख्याति तो मिला ही विश्व के विभिन्न हिस्सों में भी समान रुप से लोकप्रिय होते चले गए। बताते है कि तबले के विषय में लोगों की धारणा थी कि यह केवल एक संगति वाद्य ही है। आपने इस धारणा को बदलने में बहुत योगदान किया। वास्तव में उनका तबला वादन इतना आकर्षक था कि जिसके साथ भी आप संगत करते, उसकी कला में भी चार चाँद लग जाते थे। वे कलाकार के मूड और शैली के अनुसार उसकी संगत करते थे। सिर्फ एक संगतकार के रूप में ही नहीं, अपितु एक स्वतंत्र तबला वादक के रूप में भी उन्होंने बहुत नाम कमाया। भारत में भी और विदेशों में भी आपने तबले को एक स्वतंत्र वाद्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। खासियत यह थी कि एक प्रतिभा सम्पन्न कलाकार के साथ-साथ आप एक कुशल गुरु भी थे। उनके अनेक शिष्य थे, जिन्होंने तबले को और अधिक लोकप्रिय करने में बहुत योगदान किया। उनके शिष्य-परंपरा उनके ही पद-चिह्नों पर चल कर बनारस घराने की विधा को आगे बढ़ा रहे है। तबला बजाते समय जिन संगीत प्रेमियों ने उनके मुंह के बोल सुने थे, उन्हें ज्ञात था कि जितना सुन्दर वे बजाते थे, उतने ही सुन्दर और स्पष्ट बोल उनके मुख से निकलते थे। कठिन तालें भी वे बड़ी सुगमता से बजाते थे। उनके तबले की संगीत श्रोताओं पर जादू करती थी, उनके ठेके में एक भराव था, और दांये और बांये तबले का संवाद श्रोताओं और दर्शकों पर विशिष्ट प्रभाव डालता था। 

कहते हैं न महान कलाकार एक महान इंसान भी होते हैं, ऐसे ही महान आदरणीय लच्छू महाराज जी भी थे। लच्छू महाराज को भारत सरकार ने 1972 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा था लेकिन उन्होंने उस वक्त पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। वह कहते थे कि किसी कलाकार को अवार्ड की जरूरत नहीं होती। श्रोताओं के दिल से निकली वाह और तालियों की गड़गड़ाहट सबसे बड़ा पुरस्कार है। स्वाभिमानी, अक्खड़ लच्छू महाराज ने आजीवन सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। लच्छू महाराज अपने मस्तमौला और खाटी बनारसी अंदाज के लिए जाने जाते थे। वह अपनी चाहत पर ही तबला बजाते थे, कभी किसी की मांग पर तबला नहीं बजाया। गुरू-भक्ति, गुरू-कृपा एवं साधना के कारण उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी और ये देश के प्रसिद्ध संगीत समारोहों में आमंत्रित किये जाने लगे तथा उस समय के मूर्धन्य कलाकारों के साथ तबला संगति करके, कलाकारों एवं संगीत रसिकों के हृदय में लोकप्रिय कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। इनके वादन की सबसे प्रमुख विशेषता थी - पटाक्षरों की शुद्धता-स्पष्टता एवं तैयारी साफ सुनाई देती थी। पहले बनारस घराने तथा अन्य सभी घरानों में ‘धिरधिरकिटतक‘ बोल का सीमित वादन होता था, परन्तु उन्होंने देश-दुनिया के बड़े आयोजनों में तबला वादन किया। तबले की थाप पर सबको झूमने के लिए मजबूर कर देते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि जब वह ‘ताक धिन धिन्ना‘ की धुन निकालते तो पूरा माहौल झूम उठता था। लच्छू महाराज की खासियत थी कि वह चारों घराने का तबला बजाते थे। लच्छू महाराज सात भाइयों में दूसरे नंबर थे। उनके परिवार में पत्नी टीना और एक बेटी है। वर्तमान में दोनों स्विटजरलैंड में हैं। वह फिल्म अभिनेता गोविंदा लच्छू महाराज के भांजे हैं। जबकि गायक शमशेर अली समेत कई नामी-गिरामी कलाकार इनके शिष्यों की सूची में शामिल हैं। संकट मोचन मंदिर परिसर में होने वाले संगीत समारोह यानी हनुमत दरबार बराबर भाग लेते रहे थे। लच्‍छू महाराज एक्‍टर गोविंदा के मामा थे। 





(सुरेश गांधी)

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