वसंत जिसके नाम से ही मानो रोम-रोम पुलकित हो उठता है। प्रकृति के साथ तारतम्य बनने लग जाता है। न ज्यादा न शीत और न गर्मी। हर किसी को यह ऋतु लुभाने लगती है। पशु-पक्षी से लेकर पूरी धरा पर इसकी खुशी नयी उर्जा के रुप में दिखाई पड़ने लगती हैं तभी तो हर मन कह उठता है स्वागत है वसंत...
मन में उमंगे भरती, प्रकृति और पुरुष को जोड़ने वाली ऋतु है यह। जिस उत्साह के साथ जीवन में परिवर्तन का मनुष्य ने स्वागत किया है वही परिवर्तन त्योहारों के रुप में हमारी परंपरा में शामिल होता गया। वसंत पंचमी भी ऋतुओं के उसी सुखद परिवर्तन का एक रुप है। इसके कई रंग है। यह प्रकृति के नए श्रृगार का पर्व हैं। प्रेम और उल्लास का उत्सव है। इस समय प्रकृति अपने निखार पर होती है। चारों ओर फूल खिलकर, खुशबू और रंग की वर्षा कर रहे होते हैं। धरती, जल, वायु, आकाश और अग्नि सभी पंचतत्व मोहक रुप में होते हैं। सर्दी की अधिकता के कारण जो पक्षी और जंतु अपने घरों में छिपे होते है, वे भी बाहर निकलकर चहकने लगते हैं। नवजीवन का आगमन इसी ऋतु में होता है। खेतों में पीली-पीली सरसों, अपने पीले-पीले फूलों से किसान को हर्षित करती हैं। यानी ऋतुओं में खिला हुआ, फूलों से लदा हुआ, उत्सव का क्षण हैं वसंत। मौसम का राजा है वसंत। शायद ही किसी मौसम की रुमानियत के इतने गुण गाये होंगे, जितने बसंत के गाये गए हैं। और क्यों ना हो? सबसे खुशनुमा, तमाम फूलों-फसलों से संपंन है ये महीना। इस समय पंचतत्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने हो जाते हैं। या यूं कहें मौसम और प्रकृति में मनोहारी बदलाव देखने को मिलता है। पेड़ों पर फूल व बौर झूम रहे होते है। दक्षिण से आने वाली हवाएं बर्फीली शीत लहरे मीठी ठंड में बदल गयी होती है। सरसों की धानी चादर पर पीली छिंट बिखरी पड़ी होती है। फूल झर-झर झड़ रहे होते है। या यूं कहें पूरी प्रकृति पीली छठा, पीली चादर ओढ़ मदमस्त होकर झूम रही होती है। ‘सरसैया क फुलवा झर लागा, फागुन में बाबा देवर लागा‘, के बोल आबोहवा में तैरने लग जाते हैं। तब सुनाई देने लगती है बसंत की आहट। सच! कहे तो प्रकृति उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो गया है। उसका सौन्दर्य लौट आया है।
तभी तो इस दिन पीले रंग का खास महत्व है। मंदिरों में देवी-देवताओं को लगाये जाने वाले भोग भी वसंती रंग के ही होते है। वसंत के राग गाये-बजाये जाते है। जहां देखों प्रकृति में बसंती रंग लहलहा रहा होता है। इस दिन उत्तर भारत के कई भागों में पीले रंग के पकवान बनाए जाते हैं। बसंत का अर्थ है मादकता। बसंत का रंग भी बसंती रंग अर्थात पीला रंग माना गया है। यह रंग पीले रंग और नारंगी रंग के बीच का रंग होता है। इसलिए इस दिन पीले रंग का महत्व मानते हुए कई लोग पीले रंग का भोजन भी करते हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं। इस समय धरती पर उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है।
वसन्तोत्सव का आध्यात्मिक तात्पर्य
शीत की विदाई और वसंत के आगमन पर बच्चे और युवक सभी आनन्दोत्सव मनाते हैं, जिसका नाम होली है। उत्तर भारत के लोग शीत की जड़ता या जाड्य भाव को शेष कर मानो वसन्त की सक्रियता और सजीवता में प्राण की पुनः प्राप्ति करना चाहते हों। यह बिहार में ‘फगुआ’ नाम से प्रचलित है। किन्तु पंजाब के लोग आज भी होली के एक दिन बाद भी होला गीत गाते हैं। चैतन्य महाप्रभु बंगाल में होली उत्सव का रुपान्तरण कर श्रीकृष्ण के दोलयात्रा का प्रचलन किया। उन्होंने लोगों को पहले श्रीकृष्ण के मंदिर में जाने को कहा और वहां जाकर पहले श्रीकृष्ण को अबीर लगाने को कहा, उसके बाद अपने लोगों के बीच अबीर खेलने को कहा और बाद में मिठाई-मालपुआ खाकर लोगों को आनन्दोत्सव मनाने को कहा। जबकि आज के दिन लोग रंग गुलाल से एक दूसरे को सराबोर करते हैं। एक ही वसन्तोत्सव है, किन्तु उत्तर भारत में वही हुआ होली- बिहार में हुआ फगुआ- बंगाल में हुआ श्रीकृष्ण की दोलयात्रा। उत्तर भारत में यह हुआ मूलतरू सामाजिक उत्सव, किन्तु बंगाल में यह हुआ धार्मिक अनुष्ठान। वसन्तोत्सव का मूल आध्यात्मिक तात्पर्य यहीं पर है। जहां प्रेम है, वहां प्रार्थना है। और जहां प्रार्थना है, वहां परमात्मा है। किसी की आंख में प्रीति से झांको, उसी का नाम उभर आएगा। किसी का हाथ प्रेम से हाथ में ले लो, उसी का नाम उभर आएगा। ऐसे तो उसका कोई भी नाम नहीं और ऐसे सभी नाम उसके हैं, क्योंकि वही है, अकेला वही है, उसके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। हम सब हैं उसी के अंग! न हम उसके बिना हैं, न वह हमारे बिना है। हम हो भी नहीं सकते थे उसके बिना। अंशी के बिना अंश कैसे हो सकेगा? और ध्यान रखना, दूसरी बात भी भूल मत जाना- अंश के बिना भी अंशी नहीं हो सकता।
शीत जड़ता या नैष्कर्म का प्रतीक है और वसंत तीव्र कर्मण्यता का अभिप्रकाश। अर्जुन ने पूछा है कि किन भावों में मैं आपको देखूं? कहां आपको खोजूं? कहां आपके दर्शन होंगे? तब कृष्ण कहते हैं कि अगर तुझे मुझे स्त्रियों में खोजना हो तो तू कीर्ति में, श्री में, वाक् में, स्मृति में, मेधा में, धृति में और क्षमा में मुझे देख लेना। मैं गायन करने योग्य श्रुतियों में बृहत्साम, छंदों में गायत्री छंद, महीनों में मार्गशीर्ष का महीना, ऋतुओं में वसंत ऋतु हूं। अर्थात परमात्मा को रूखे-सूखे, मृत, मुर्दा घरों में मत खोजना। जहां जीवन उत्सव मनाता हो, जहां जीवन खिलता हो वसंत जैसा, जहां सब बीज अंकुरित होकर फूल बन जाते हों, उत्सव में, वसंत में मैं हूं। ईश्वर सिर्फ उन्हीं को उपलब्ध होता है, जो जीवन के उत्सव में, जीवन के रस में, जीवन के छंद में, उसके संगीत में, उसे देखने की क्षमता जुटा पाते हैं। उदास, रोते हुए, भागे हुए लोग, मुर्दा हो गए लोग, उसे नहीं देख पाते। पतझड़ में उसे देखना बहुत मुश्किल है। मौजूद तो वह वहां भी है.. लेकिन जो वसंत में उसे नहीं देख पाते, वे पतझड़ में उसे कैसे देख पाएंगे? वसंत में जो देख पाते हैं, वे तो उसे पतझड़ में भी देख लेंगे। फिर पतझड़, पतझड़ नहीं मालूम पड़ेगा। वसंत का ही विश्रम होगा। फिर तो पतझड़ वसंत के विपरीत भी नहीं मालूम पड़ेगा। वसंत का आगमन या वसंत का जाना होगा। लेकिन देखना हो पहले, तो वसंत में ही देखना उचित है। शायद पृथ्वी पर हिन्दुओं के धर्म ने, यह अकेला ही ऐसा एक धर्म है, जिसने उत्सव में प्रभु को देखने की चेष्टा की है। एक उत्सवपूर्ण, एक फेस्टिव, नाचता हुआय छंद में, और गीत में, और संगीत में, और फूल में।
कर्म की भावना से जोड़ता है वसंत
वसंत का आगमन का अर्थ ही है शीत की जड़ता की विदाई। किन्तु अधिक शीत रहने पर जिस तरह बूढ़े घर में सुस्त पड़े रहते हैं, उसी तरह बच्चों भी उस समय कम खेल-कूद करते हैं। इसलिए शीत की विदाई और वसंत के आगमन पर बच्चों और युवक सभी आनन्दोत्सव मनाते हैं। एक लोकप्रिय उक्ति है, जिसका अर्थ है- शीत कहता है, बच्चों को हम क्षति नहीं पहुंचाते और युवक का मैं भाई हूं, किन्तु बूढ़े को मैं नहीं छोड़ता। इसीलिए वे अपने शरीर को रजाई से ढकते हैं। शीत जड़ता या नैष्कर्म का प्रतीक है और वसंत तीव्र कर्मण्यता का अभिप्रकाश। उत्तर भारत में वसंत पंचमी से ही वसंत की धूम शुरू हो जाती है। लोगों के मन का उल्लास का असर उनके तन पर दिखाई देता है। शीत की विदाई के बाद लोग काम में तत्पर हो जाते हैं। उनका मन भगवान श्रीकृष्ण के बारे में सोचता है, तब वे आनंद अनुभव करते हैं। सभी जागतिक चिंतन-भावना का परित्याग कर मानसिक चिंतन से केवल परमपुरुष की ओर ही आगे बढ़ते जाते हैं, वे गोपी हैं। जो अपने सभी कर्मो का फल सफलता के ताज के रूप में देखना चाहते हैं, तो वे परमपुरुष को आंतरिक हृदय से प्यार करें और उसे यह भी देखना चाहिए वे क्या पसंद करते हैं और क्या पसंद नहीं करते, क्या चाहते और क्या नहीं चाहते। जिसे परमपुरुष नहीं चाहते उसे वैसी चीजों के नजदीक भी नहीं जाना चाहिए। जब उनकी इच्छा और आकांक्षा परमपुरुष के इच्छा के अनुसार संचालित होते हैं, वहां सफलता अवश्यम्भावी है।
वसंत पंचमी ऋतुराज वसंत के स्वागत में मनाई जाती है। महाकवि कालिदास ने इस समय के वसंतोत्सव और मनोत्सव का बड़ा मनोहारी वर्णन किया है। यह उत्सव वसंत पंचमी से प्रारंभ होकर महीनों तक मनाया जाता था। उदयन और वत्सराज राजाओं के समय में इस उत्सव को मनाने की प्रथा थी। इस समय जीवों में तो नवीन संचार होता ही है, पेड़-पौधों में भी उल्लास छा जाता है। शिशिर के कष्टदायी शीत से लोग ऊब जाते हैं। उससे छुटकारा पाते ही सभी चैन की सांस लेते हैं। सुखद-शीतल, मंद-सुगंध समीर लोगों को आह्लादित कर देती है। इस समय चराचर की उन्मुक्त प्रसन्नता स्वाभाविक ही है। वसंत को ऋतुराज भी कहते हैं। देवराज इन्द्र को जब कभी किसी ऋषि-मुनि को विचलित करना होता था तो वे अपने मित्र और सहायक काम द्वारा वसंत का सृजन करा लेते थे ताकि सूखी नसों में भी रक्त संचार हो जाए। आदि कवि वाल्मीकि ने श्री रामचन्द्र के ऊपर वसंत के प्रभाव का वर्णन किया है- सुखानिलोयं सौमित्रे, कालरू प्रचुर मन्मथः। गन्धवान् सुरभिमासो जात पुष्प फलद्रुमः।। अर्थात हे लक्ष्मण! इस समय धीरे-धीरे सुखदायिनी हवा चल रही है, यह सुगंधिमय मास है। वृक्षों में चारों ओर फूल-फल आ गए हैं। यह बड़ा ही सुन्दर समय है।
(सुरेश गांधी)


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