यूपी में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 11 जिलों की 67 सीटों पर 60 से 65 प्रतिशत मतदान होने का दावा चुनाव आयोग ने किया है। लेकिन सबसे चैकाने वाली बात यह है कि इस बार मतदाताओं ने धर्म-जाति से हटकर प्रत्याशियों के चाल-चरित्र व मुद्दो पर वोटिंग किया है। जबकि कयास लगाएं जा रहे थे कि दुसरे चरण में मतों ध्रुवीकरण होगा। माना जाता है इन इलाकों मुस्लिम मत एकतरफा पड़ता है। फिरहाल, मतदान के बाद वोटरों के मिजाज को देखते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने सपा गठबंधन व बसपा दोनों में अपनी रुचि दिखाई है। यह अलग बात है कि वोटिंग के दौरान यह ध्यान जरुर दिया गया कि भाजपा को हरा कौन रहा है। मतलब साफ है मुस्लिम मत एकतरफा जाने के बजाए बटकर वोटिंग की है, जो भाजपा की मुस्किलों को आसान करने वाली हो सकती है। लेकिन भाजपा के पक्ष में भी सिवाय परंपरागत वोटों के अन्य मतदाताओं ने एकबगा वोटिंग नहीं की है
बेशक, यूपी विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान में मतदाताओं ने सपा गठबंधन, बसपा व भाजपा के पक्ष में एकतरफा वोटिंग नहीं की है। सहारनपुर के बेहट, नकुड़, सहारनपुर नगर, सहारनपुर, देवबंद, रामपुर मनिहारन, गंगोह के शहरी बूथों पर भले मुस्लिम मतों का रुझान सपा गठबंधन के पक्ष में देखा गया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अधिकांश मुस्लिम मतों ने बसपा में ही अपनी रुचि दिखाई। उनका मानना था कि वह फतवों व धर्म जाति के बजाय प्रत्याशियों के चाल-चलन व चरित्र पर वोटिंग किया है। अनवारुल का कहना है कि जहां सपा-बसपा दोनों ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे वहां वहां उनके कार्यशैली के आधार पर ही वोटिंग किया गया है। बिजनौर के नजीबाबाद, नगीना, बढ़ापुर, धामपुर, नहटौर, बिजनौर, चांदपुर, नूरपुर, मुरादाबाद के कांठ, ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद देहात, मुरादाबाद शहर, कुंदरकी, बिलारी, संभल के चंदौसी, असमौली, संभल, गुन्नौर, रामपुर के स्वार, चमरौआ, बिलासपुर, रामपुर मिलक, बरेली के बहेड़ी, मीरगंज, भोजीपुरा, नवाबगंज, फरीदपुर, बिठारी चैनपुर, बरेली, बरेली छावनी, आंवला, अमरोहा के धनौरा, नवगवान सादत, अमरोहा, हसनपुर, पीलीभीत के पीलीभीत, बरखेड़ा, पुरनपुर, बीसलपुर, लखीमपुर खीरी के पलिया, निघासन, गोला गोकरनाथ, श्रीनगर, धौरहरा, लखीमपुर, कास्ता, मोहम्मदी, शाहजहांपुरः कटरा, जलालाबाद, तिलहर, पुआयां, शाहजहांपुर, ददरौला, बदायू के बिसौली, सहसवान, बिल्सी, बदायूं, शेखूपुर, दातागंज में भी कुछ इसी तरह के रुझान मतदाताओं में देखने को मिला।
बता दें, यूपी चुनाव में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन में चुनाव लड़ रहीं हैं। गठबंधन के अलावा बीएसपी, बीजेपी, और राष्ट्रीय लोक दल के बीच कड़ा मुकाबला है। इन जिलों में सपा 51, बसपा, 67, भाजपा 67, कांग्रेस 18, लोकदल 52 व 466 निर्दलीय और अन्य उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। यानी रुहेलखंड और पश्चिमी उप्र के इस इलाके में 720 उम्मीदवार मैदान में हैं। जिनमें से 69 महिलाएं हैं। इस चरण में सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाता है। प्रमुख पार्टियों ने 75 मुस्लिमों को उतारा है। यदि निर्दलीय को मिला दें तो संख्या 150 पार होगी। जबकि भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है। यहां के छह जिलों में मुस्लिम आबादी 35 प्रतिशत से ज्यादा है और मुस्लिम वोटर 34 प्रतिशत हैं। 12 सीटें आरक्षित हैं। करीब 40 सीटों पर हार-जीत का फैसला मुस्लिम वोटर ही करते हैं। ये सीटें सपा-कांग्रेस का गढ़ मानी जाती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव इस इलाके से सपा को 34 सीटें मिली थी। जबकि दूसरे नम्बर पर रही बसपा को 18, बीजेपी को 10, कांग्रेस को 3 और अन्य को 2 सीटें हासिल हुई थीं। मुरादाबाद शहर सीट में सबसे ज्यादा मतदाता हैं। महिला मतदाताओं के लिहाज से भी ये विधानसभा सीट अव्वल है। बिजनौर जिले की धामपुर विधानसभा सीट पर वोटर की संख्या सबसे कम है और यहीं पर सबसे कम महिला वोटर हैं। कुल मिलाकर दूसरे चरण में मुस्लिम फैक्टर अहम है। रामपुर की स्वार सीट से इस बार आजम खान ने अपने बेटे अब्दुल्ला को चुनाव में उतारा है। यहां बसपा के कासिम अली खान से उनकी टक्कर है। बाबा रामदेव की मानें तो इस बार के नतीजे उथल-पुथल करने वाले होंगे। मतदाताओं ने जो कम बेईमान हैं, उन्हें वोट दी है।
देखा जाएं तो यूपी में पहले चरण के चुनाव में मुस्लिम वोटों का मिजाज भांप रहे राजनीतिक दलों और ट्रेंड विशेषज्ञों का असली इम्तेहान दूसरे चरण में होता है। जिसे मुस्लिम सियासत का बैरोमीटर कहा जाता है। ऐसे में सपा व बसपा का अपने परंपरागत वोट बचााएं रखने व मुस्लिम मतों के वोटिंग के रुझान को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि बाकी चरणों में क्या गुल खिलने वाला है। इस बार बीएसपी का पूरा दांव दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर है। सपा की ताकत ही यादव-मुस्लिम वोट बैंक है। कांग्रेस को जोड़ वह अपना स्पेस बढ़ाने के साथ ही मौजूदा बेस को और मजबूत करने की उम्मीद जगाए है। यहां तक कि जाट ‘स्वाभिमान‘ जगा आरएलडी भी बीजेपी हराओ का नारा देकर मुसलमानों की ओर उम्मीद से देख रही है। वहीं, बीजेपी की उम्मीद ही है इस पर है कि मुस्लिम वोटर इन तीनों की ही झोली में जाता दिखे। 11 फरवरी को पहले चरण में जो वोट पड़े हैं उसमें मुस्लिम वोटरों की रणनीतिक भागीदारी अहम थी, इसलिए संगठनों से लेकर फतवों तक के सारे दरवाजे सियासतदानों ने खटखटाने और खोलने की कोशिश की। यहां मुसलमान जाट, जाटव या गुर्जर सहित किसी भी अन्य वोट बैंक के साथ जुड़कर ही अधिकतर सीटों पर असरदार था। दूसरे चरण की तस्वीर इससे सीधे अलग है। इसमें 40 से अधिक सीटों पर मुस्लिम सीधे जीत-हार तय करने की स्थिति में है। इसलिए अगर ट्रेंड पहले चरण का रहा तो सपा और बीएसपी दोनों के लिए ही चुनौती कठिन होगी। ऐसा कहा जा रहा है कि पहले चरण में मुस्लिम सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ भी गया और जहां बीएसपी या आरएलडी मजबूत थी उनको भी वोट मिला। दूसरे चरण में 2012 में सपा ने 34 सीटें तब जीती थी जब बीजेपी लड़ाई में बहुत कमजोर थी। इस बार वह रेस में है। अगर मुस्लिम बीजेपी हराओ के साथ वोट करता है तो वह सपा-कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक न रहकर सीटों के हिसाब से बीएसपी और आरएलडी के भी पाले में गया होगा, ऐसा कहा जा रहा है। इस लिहाज से सपा को अपनी सीटें संभाली मुश्किल हो जाएंगी।
रामपुर में सपा के दिग्गज नेता आजम खां के सामने बीएसपी से तनवीर अहमद खान और आरएलडी से आसिम खां उम्मीदवार हैं। आजम खां के बेटे अब्दुल्ला आजम को स्वार सीट से बीएसपी ने मौजूदा एमएलए नवाब काजिम अली को टिकट दिया है। देवबंद से बीएसपी के माजिद अली व सपा से माविया अली चुनाव लड़ रहे हैं। लाउडस्पीकर कांड से चर्चे में आई मुरादाबाद की कांठ सहित चार सीटों पर तीन-तीन मुस्लिम उम्मीदवार हैं। अमरोहा से सपा, बीएसपी और आरएलडी तीनों ने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतार रखे हैं। जाहिर यहां मुस्लिमों के समझ वोटिंग को लेकर बड़ी कसमकश थी। इसलिए यहां मतदाताओं में प्रत्याशी के चाल-चलन व चरित्र के आधार पर वोटिंग किया। बीजेपी ने गैर-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण व मुस्लिम वोटों के बंटवारे की उम्मीद कर रही है। खास यह है कि बीजेपी ने इसी रणनीति के तहत सपा को मुख्य मुकाबले में बताने के बजाय दूसरे चरण में बसपा से अपनी लड़ाई होने की बात कहीं। वैसे भी दूसरे चरण में कई सीटे ऐसी हैं जहां मुस्लिम अकेले जीत दिलाने में सक्षम है। ऐसे में अगर वह एकतरफा सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ गया तो बीजेपी रेस में काफी पिछड़ जाएगी। यह अलग बात है कि इस बार भी मायावती ने जिताउ मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारा है। फिरहाल, बीजेपी की पूरी रणनीति मुस्लिम वोटों के बंटवारे पर टिकी है।
(सुरेश गांधी)

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