नयी दिल्ली, पांच फरवरी, उच्चतम न्यायालय में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने वाले और 13 दिन तक जेल में रहे एक दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी ‘स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना, 1980’ के तहत पेंशन का दावा करने की कानूनी लड़ाई हार गयी हैं। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि वह यह लाभ पाने के लिए ‘‘अयोग्य’’ हैं। उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र के उस आदेश का उल्लेख किया जिसमें यह कहा गया है कि यह व्यक्ति योग्यता के मापदंड को पूरा नहीं करता। पेंशन योजना का लाभ पाने के लिए यह जररी है कि स्वतंत्रता सेनानी छह महीने से ज्यादा समय तक भूमिगत रहा हो या उसने छह महीने से ज्यादा समय तक जेल की सजा काटी हो। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी पत्नी की याचिका खारिज कर दी। महिला ने पटना उच्च न्यायालय के अप्रैल 2015 में दिये गये उस आदेश को शीर्ष न्यायालय में चुनौती दी थी जिसमें 1980 की योजना के तहत आश्रित परिवार पेंशन के दावे को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता के अनुसार उनके पति को नौ अगस्त, 1942 के स्वतंत्रता संघर्ष आंदोलन से जुड़े एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था और वह 16 अगस्त 1942 से 14 अक्टूबर 1944 तक कथित रूप से फरार रहे। उन्होंने दलील दी कि उनके पति को 14 अक्टूबर 1944 को गिरफ्तार किया गया और वह जमानत पर रिहा होने तक 27 अक्टूबर 1944 तक जेल में रहे और फिर जनवरी 1945 में उन्हें मामले से बरी कर दिया गया। बिहार सरकार ने अप्रैल 1993 में महिला को स्वंतत्रता सेनानी पेंशन देने की अनुशंसा की थी लेकिन केन्द्र सरकार ने जुलाई, 2000 में इस अनुशंसा को खारिज करते हुये कहा था कि इस मामले में कम से कम छह महीने तक जेल में रहने की पात्रता को पूरा नहीं किया गया।
रविवार, 5 फ़रवरी 2017
दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी उच्चतम न्यायालय में पेंशन की कानूनी लड़ाई हारी
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