किसी ने स्वप्न मे भी यह कल्पना नही की होगी कि एक अति-पिछड़े परिवार का रेल्वे स्टेशन पर ’’चाय-गर्म’’ की आवाज लगाकर चाय बेचने वाले बच्चे के भाग्य मे भारत का प्रधानमन्त्री होना लिखा था, वह हैं हमारे भारत के 15वें प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी, जिन्होने दिनांक 26 मई 2014 को प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली थी। यद्यपि मोदी जी की जीवन-यात्रा और कार्यशैली मे भाग्य-भरोसा नाम का कोई शब्द प्रकट नही होता है। वह अपने कर्म पर विश्वास करते हैं और इस युग के महान कर्मवीर ’’सेल्फ मेड पर्सन’’ के नाम से हमेशा विख्यात रहेंगे। दिनांक 17 सितम्बर 1950 के दिन वडनगर जिला मेहसाना (बम्बई), जो अब गुजरात मे है, के निवासी पिता दामोदर दास मूलचन्द मोदी और मां श्रीमती हीरा बेन को इस महान व्यक्तित्व और अभूतपूर्व प्रतिभा का धनी बालक के रूप मे नरेन्द्र भाई मोदी का जन्म हुआ था। मोदी का बचपन अत्यन्त आर्थिक तंगी मे व्यतीत हुआ, उनकी मां गरीबी के कारण अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिये दूसरे के घरों मे बर्तन साफ करना और घर की साफ-सफाई का काम करती थीं, उससे जो आय होती थी, तो परिवार का खर्च चलता था। पिता की एक छोटी सी चाय की दुकान थी, नरेन्द्र मोदी वडनगर रेल्वे स्टेशन व बस अड्डे पर दौड़-दौड़ कर चाय बेच कर परिवार की आय मे सहयोग करते थे। वह 8 वर्ष की आयु मे राष्ट्रीय-स्वयंसेवक-संघ के सम्पर्क मे आये और संघ की शाखा मे जाने लगे थे, वहां पर लक्ष्मण राव इनामदार, जिन्हे वकील साहब के नाम से जाना जाता था, उन्होने मोदी को संघ मे बाल-स्वयंसेवक के रूप मे शामिल किया था।
युवावस्था मे प्रवेश करते ही मोदी का विवाह जशोदा बेन से कर दिया गया, परन्तु विधि की नियति तो कुछ और ही थी एवं ईश्वर को मोदी से राष्ट्र का कार्य कराना था। विवाह के कुछ समय बाद मोदी ने राष्ट्र-कार्य हेतु अपनी पत्नी श्रीमती जशोदा बेन से अनुमति लेकर उनको स्वतन्त्र किया और 1967 मे घर से बाहर निकल गये। उन्होने उत्तर एवं उत्तर-पूर्वी भारत का 2 वर्षों तक भ्रमण किया, कोलकता मे स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित बेलूर मठ, अलमोड़ा स्थित अद्वैत आश्रम व राजकोट स्थित रामकृष्ण मिशन मे उन्होने अध्यात्म साधना की थी। इस मध्य वह सिलीगुड़ी, गौहाटी मे भ्रमण करते रहे। वर्ष 1970 के लगभग वह अल्प समय के लिये अपने घर वडनगर बापिस आये और पुनः परिवार छोड़ कर अहमदाबाद चले गये थे, जहां वह अपने चाचा, जो एक केन्टीन चलाते थे, के साथ रहने लगे। मोदी के मन मे ऐसा भान भी नही था कि राजनीति मे जाना है। अहमदाबाद मे मोदी की मुलाकात संघ कार्यालय मे पुनः इनामदार जी से हुई। इसी बीच सन् 1971 मे भारत पाकिस्तान युद्ध हुआ और तभी मोदी जी ने अपने चाचा की केन्टीन से कार्य छोड़ कर संघ के पूर्ण-कालिक प्रचारक हो गये। वर्ष 1978 मे वह विभाग प्रचारक बना दिये गये और इसके साथ-साथ उन्होने विद्या अध्ययन भी जारी रक्खा था तथा डिस्टेन्स कोर्स के माध्यम से राजीनीति-शास्त्र मे दिल्ली यूनीवर्सिटी से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी, उसके बाद गुजरात यूनीवर्सिटी से स्नाकोत्तर की डिग्री हांसिल की।
दिनांक 26 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपनी सत्ता की सुरक्षार्थ भारत मे आपतकाल लगा दिया था, क्यों कि समाजवादी नेता स्व. श्री राजनारायण के द्वारा दायर चुनाव याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंजूर करते हुये इन्दिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया था, उसके परिणामस्वरूप इन्दिरा गांधी को अपना पद छोड़ना चाहिये था। परन्तु संविधान को ताक मे रखते हुये देश मे आपात्काल थोप दिया गया था, लोकसभा के चुनाव एक वर्ष के लिये टाल दिये गये थे, राजनीतिक दलों के हजारों नेताओं को जेल मे बंद कर दिया गया था। खेद तो यह है कि जो मोदी राज्य मे सम्मान वापिसी के माध्यम से सुर्खियों की चाहत मे लगे रहै, देश के तथाकथित प्रगतिशील, आधुनिकतावादी साहित्यकारों मे संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की सुरक्षा के लिये संवेदनशीलता उस समय कहां चली गई थी ? तत्समय किसी ने भी अपना सम्मान वापिस नही किया था। आपत्काल के उस दौर मे संघ पर प्रतिवंध लगा दिया गया था और उससे नरेन्द्र मोदी भी अछूते नही रहे, वह भूमिगत हो गये थे। उस समय मोदी जी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कार्य देख रहे थे।
वर्ष 1985 मे नरेन्द्र भाई मोदी राष्ट्रीय-स्वयंसेवक-संघ से भारतीय जनता पार्टी मे शामिल हुये और 1988 मे भाजपा गुजरात राज्य के संगठन मन्त्री नियुक्त हो गये थे। वर्ष 1990 मे माननीय लाल कृष्ण आडवांणी की अयोध्या रथ-यात्रा और वर्ष 1991-92 मे माननीय डाॅ. मुरली मनोहर जोशी की एकता-यात्रा के समय श्री मोदी जी का महात्वपूर्ण योगदान रहा था। माह नवम्बर 1995 मे मोदी जी भाजपा के राष्ट्रीय मन्त्री नियुक्त हुये, तब वह गुजरात से दिल्ली आ गये थे। उन्हे हरियाणां और हिमाचल प्रदेश का प्रभार दिया गया था। वर्ष 1998 मे उन्हे भाजपा के राष्ट्रीय महामन्त्री नियुक्त किया गया। वर्ष 2001 मे जब गुजरात मे श्री केशुभाई पटेल का स्वास्थ्य खराब होने लगा और उप-चुनावों मे भाजपा को पराजय मिली थी, तभी दिनांक 7 अक्टूबर 2001 को नरेन्द्र मोदी ने प्रथम बार गुजरात के मुख्यमन्त्री पद की शपथ ली थी और दिनांक 24 फरवरी 2002 को राजकोट से प्रथम बार विधायक निर्वाचित हुये थे।
माननीय नरेन्द्र मोदी का जीवन-काल प्रारंभ से ही चुनौतीपूर्ण रहा है, और प्रत्येक चुनौती को उन्होने एक अवसर माना, उसे स्वीकार किया और उस पर विजय भी प्राप्त की। व्यक्ति के जीवन मे दुर्भाग्य और सौभाग्य, एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। दिनांक 27 फरबरी 2002 को जब सैकड़ो हिन्दू तीर्थ-यात्री अयोध्या से दर्शन करके ट्रेन से वापिस हो रहे थे, तो गोधरा रेल्वे स्टेशन पर इस ट्रेन मे आग लगा दी गई थी, जिसमे 60 तीर्थ-यात्री जल कर मर गये थे। गुजरात मे इस घटना का कारण मज़हबी सम्प्रदायिकता के रूप मे चर्चित हुआ था। जिसका परिणाम यह निकला कि गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप गुजरात मे सम्प्रदायिक दंगे हुये और सैकड़ो मारे गये। मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इन दंगो को रोकने के लिये ने कड़े से कड़े निर्देश जारी किये थे। मोदी पर विपक्षियों द्वारा साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाया, दंगा कराने का दोष मोदी के मत्थे मढ़ने लगे। यह समय-काल मोदी के लिये अत्यन्त संघर्ष व संकटमय था। एक ओर तो बामपन्थी, कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दल मोदी पर राजनीतिक हमला कर रहे थे और दूसरी ओर गुजरात के दंगो को शांत कराने की चुनौती भी उनके सामने थी। इसी संदर्भ मे मुझे माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कार्यशैली और उनके सोच का संदर्भ याद आ गया, जब सन् 1996 मे ग्यारहवीं लोकसभा के चुनाव मे भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभरी थी तो अटल जी को प्रधानमन्त्री पद पर नियुक्त किया गया था और वह लोकसभा मे अपना बहुमत सिद्ध नही सके थे, संख्या-बल के सामने गुंणवत्ता-बल पराजित हुआ था। उसी समय दिनांक 13 जून 1996 को अटल जी ने एक पत्र के जबाव मे मुझे लिख कर भेजा था, ‘‘बर्तमान परिस्थिति हमारे लिये एक अवसर भी हैं और एक चुनौती भी, अपने प्रयत्नों मे तीब्रता ला कर और परिश्रम की पराकाष्ठा करके हमे अपने लक्ष्य को पाना है।’’ इसी तरह नरेन्द्र मोदी जी के समक्ष गुजरात के दंगों का संकटकाल, एक चुनौती के रूप मे उभर कर आया था और उससे उन्हे उबरना था।
गुजरात दंगो के कारणों पर विभिन्न प्रकार की जांचे हुई, मानव अधिकार आयोग व मीडिया जगत ने भी मोदी पर हमला करने मे कोई कसर नही छोड़ी। उनके बिरूद्ध सुनियोजत हमला करने का यह कार्य कई वर्षों तक चलता रहा। जाकिया जाफरी की सुप्रीम कोर्ट मे दायर याचिका की सुनवाई मे सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2008 मे गुजरात सरकार को दंगो की पुनः जांच करने का निर्देश दिया था और स्पेशल इन्वेस्टीगेटिंग टीम (एस.आई.टी.) का गठन किया गया था। एस.आई.टी. के द्वारा विस्तृत जांच होने के बाद मई 2010 मे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जांच रिपोर्ट प्रस्तुत हुई थी, जिसमे यह पाया गया था कि नरेन्द्र मोदी के बिरूद्ध गुजरात दंगो के संदर्भ मे लगाये गये समस्त आरोप गलत व झंूठ हैं और उनके बिरूद्ध कोई साक्ष्य उपलब्ध नही हुई है। परन्तु माह जुलाई 2011 मे एमीकसक्यूरी राजू रामचन्द्रन ने अपनी स्वयं की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट मे एस.आई.टी. की जांच रिपोर्ट के विपरीत प्रस्तुत की थी और मोदी के विरूद्ध मुकद्मा चलाने की मांग की थी। राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एस.आई.टी. ने बिरोध व्यक्त करते हुये संजीव भट्ट की झंूठी साक्ष्य पर आधारित होना बताया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण मजिस्ट्रेट न्यायालय को जांच हेतु इस निर्देश के साथ प्रेषित किया था कि एस.आई.टी. की जांच रिपोर्ट के साथ राजू रामचन्द्रन की रिपोर्ट का भी परीक्षण किया जावे। माह मार्च 2012 मे एस.आई.टी. ने क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की थी, जिसका बिरोध याचिका दायर करते हुये जाकिया जाफरी ने किया था। माह दिसम्बर 2013 मे मजिस्ट्रेट न्यायालय ने जाकिया जाफरी की प्रोटेस्ट पिटीशन को खारिज किया और एस.आई.टी. की क्लोजर रिपोर्ट को इस आधार पर स्वीकार किया था कि मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध गुजरात दंगो के संदर्भ मे कोई भी साक्ष्य नही पाई गई है। एस.आई.टी. की जांच रिपोर्ट, उसकी क्लोजर रिपोर्ट, मजिस्ट्रेट न्यायालय का आंकलन और भारत की सर्वोच्च न्यायालय से प्रधानमन्त्री मोदी को निर्दोष और पाक-साफ माना गया। परन्तु देश का दुर्भाग्य यह है कि नरेन्द्र मोदी की ट्रायल भारत के मीडिया-जगत मे, राजनीतिक हल्कों मे आज भी होती ही रहती है। नरेन्द्र भाई मोदी ने वर्ष 2001 से 2014 तक मुख्यमन्त्री के रूप मे गुजरात के विकास को महात्वपूर्ण माना और वहां की जनता को स्वच्छ, पारदर्शी व निर्भीक प्रशासन दिया। विश्व मे गुजरात माॅडल विख्यात हुआ। भूकम्प और दंगों से हुई तबाही का सामना और गुजरात का पुनर्निर्माण नरेन्द्र भाई मोदी की विकास के प्रति दृंढ़ इच्छा-शक्ति ने ही किया।
प्रधानमन्त्री मोदी के दो़ वषों के कार्यकाल मे महात्वपूर्ण उपलब्धियां देश को प्राप्त हुई हैं। उससे भारत को विकास की नई दिशा मिली है। मोदी जी की विदेश-यात्राओं की सारगर्भिता व सुसंगतता को समझने की जरूरत है। आज पाकिस्तान विश्व-समुदाय के समक्ष आतंकी देश के रूप मे अलग-थलग हो गया है। पूरी दुनिया भारत की ओर आशान्वित नजरों से देख रही है। मोदी जी के दामन मे उपलब्धियाों का भण्डार है। देश और विदेश की जनता मे प्रशासनिक, ईमानदारी, भृष्टाचार-रहित, पारदर्शी कार्यशैली के कारण शासकीय-तंत्र मे विश्वास स्थापित हुआ है, जो यू.पी.ए. सरकार के समय मे क्षति-ग्रस्त हो चुका था। मोदी जी स्वभावतः समाज के उत्थान और सुधारवादी बिचार के हैं तथा इसी कारण उन्होने देश की आम-जनता को जीवनशैली मे जागृति उत्पन्न करने का प्रयास किया है। स्वच्छ भारत अभियान, घरों मे, समस्त स्कूलों मे और सार्वजनिक स्थलों पर शौचालय निर्माण का अभियान के वह प्रेरक हैं। जन-धन योजना, जिसके कारण देश मे जीरों बैलेन्स पर खाते खोले गये और उसके परिणाम स्वरूप 14 करोड से भी ज्यादा बैंकों मे बैंक खाते खुल गये, लोगों ने डेढ़ हजार करोड़ रूपये लोगों ने अपने खातो मे जमा किये। इसके पीछे का उद्देश्य यही है कि शासन से मिलने वाली सहायता राशियों का भुगतान सीधे बैंक मे जमा हो। न्यूनतम एक मुश्त संाकेतिक राशि बैंक मे जमा करने पर बीमा योजना, एल.पी.जी. कनेक्शन की सब्सीडी राशि का त्याग करने हेतु प्रोत्साहन, मुद्रा बैंक के माध्यम से अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग व अल्पसंख्यकों को सहायता, प्रधानमन्त्री कृषि सिंचाई योजना की स्थापना, जिसके बारे मे गत 60 वर्षों मे कांग्रेस ने सोचने का भी प्रयास नही किया। मोदी का यह संकल्प, कि वर्ष 2022 तक भारत मे ऐसा कोई परिवार नही होगा, जिसके पास उसका अपना घर न हो। स्वाॅय्ल हेल्थ कार्ड स्कीम के माध्यम से भूमि की उपज का परीक्षण योजना। केन्द्रीय सरकार मे पहली बार स्किल डिव्लपमेन्ट मन्त्रालय बना कर देश के युवाओं मे रोजगार की संभावनाये निर्मित करना और ‘‘मेक इन इण्डिया’’ की भावना जागृत करना। केन्द्र शासित राज्यों मे महिलाओं को पुलिस मे आरक्षंण। कोयला खदानों की नीलामी से तीन लाख करोड़ का मुनाफा, जिसका उपयोग उन राज्यो के विकास मे होगा, जहां विकास-दर कम हैं। विदेशो मे नरेन्द्र मोदी के दौरे के परिणाम स्वरूप भारत मे निवेश की संभावनायें उजागर हुई हैं। क्या ये ’’अच्छे दिन’’ नही हैं ? केन्द्रीय मन्त्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी जी को ’’अच्छे दिन’’ के नाम पर गले मे फांस अटकने का अनुभव नही करना चाहिये।
लेखक- राजेन्द्र तिवारी,
फोन- 07522-238333, 9425116738
ई मेल : rajendra.rt.tiwari@gmail.com
नोट:- लेखक एक पूर्व शासकीय एवं वरिष्ठ अभिभाषक व राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक आध्यात्मिक विषयों के समालोचक हैं।


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