विशेष : दोष स्कर्ट का नहीं मंत्री जी, उघारी टांगों में से इज्जत के नमूने तलाशने वालों का है - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

विशेष : दोष स्कर्ट का नहीं मंत्री जी, उघारी टांगों में से इज्जत के नमूने तलाशने वालों का है

skirt-and-socity
आज शाम को जरूरी काम से बाजार गई थी। वापस लौटी तो एक तकरीबन 30- 35 वर्षीय व्यक्ति जो कि साइकिल पर था उसने एक हाथ लहराते हुए आगे कोचिंग से लौट रहीं दो तीन लड़कियों में से एक लड़की के सीने पर हाथ मारा....और आगे बढ़ गया। सब मूक दर्शक बनकर देखते रहे। कुछ देर बाद उसने एक दूसरी लड़की के सीने पर फिर से हाथ मारा।

इस बार मेरे साथ-साथ पास में ही खड़ी स्कूटी सवार एक लड़की ने भी उसकी इस हरकत को देखा। मैं ये देखकर तेजी से उसकी ओर आगे बढ़ी। लेकिन वो साइकिल तेज दौड़ाते हुए आगे निकल गया। पर और किसी ने जहमत नहीं उठाई कि उसको पकड़े। शायद स्कूटी सवार लड़की गर कोशिश करती तो उसे पकड़ सकती थी। लेकिन सिर्फ मैंने ही उस व्यक्ति को ऐसा करते हुए देखा था क्या ? शायद नहीं। फिर क्यों किसी की ओर से प्रतिक्रिया नहीं आई। बहरहाल एक बात और कि जिन दोनों लड़कियों के साथ यह घटना हुई उन दोनों में से किसी ने भी स्कर्ट नहीं पहन रखी थी बल्कि फुल स्लीव्स का कुर्ता पहने हुए थीं। फिर इस तरह की घटना क्यों ?


एनसीआरबी के आंकड़ों की मानें तो 2014 में भारत में कुल 37,413 रेप के मामले दर्ज किए गए थे। यह डाटा थाने में दर्ज एफआईआर पर आधारित है। यह भी बता दें कि 2013 में एनसीआरबी ने जो आंकडे जारी किए थे उसके मुताबिक उस साल भारत में कुल 33,707 रेप के मामले दर्ज किए गए थे। यानि की 2013-14 में कुल 71120 लड़कियों के साथ रेप हुआ। उन्हें समाज में एक नमूना बनाकर खड़ा कर दिया गया। बलात्कारियों ने तार-तार कर दिया और फिर समाज ने उंगलियां उठाकर, निशानदेही करके उनके जख्मों पर बार-बार और हर बार नमक छिड़का। सवाल यह भी है कि क्या जिन आंकड़ों की बात की जा रही है इसमें से कितने ने स्कर्ट पहनी हुई थी और कितनों की ब्रा की स्ट्रैप दिखाई दी। जो बलात्कारी ने इनको चील-कौए की तरह नोंच-नोंच कर खत्म करने की कोशिश की। 

बार-बार सशक्त बनाने की बात की जाती है। पर सशक्त बनने की पहल के पहले  चरण में ही सुविधाएं दम तोडृ देती हैं। 1090 यानि की उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही वूमेन पावर हेल्प लाइन की ही बात कर लीजिए। पॉलिटेक्निक से कालिदास मार्ग जाते वक्त 1090 चौराहा मिसाल लगता है। अनुभूति कराता है कि वास्तव में प्रशासन अपने कर्तव्य को सलीके से निभा रहा है। लेकिन इस तरह की खबरों ने ''पूर्वांचल की रहने वाली एलएलबी की छात्रा को जब कहीं मदद नहीं मिली तो मदद की उम्मीद लेकर वह वीमन पावर लाइन पहुंची थी। छात्रा का आरोप है कि यहां उसे कोई मदद तो नहीं मिली, उल्टे 1090 के प्रभारी इंस्पेक्टर राघवेंद्र प्रताप सिंह ही उसके पीछे पड़ गए। शुरूआती जांच के दौरान राघवेंद्र सिंह पर लगे आरोप सही सिद्ध हुए।'' सारी हकीकत सामने रख दी। 

सच कहूं मानसिकता के दोयम दर्जे से काफी ठेस पहुंचती है हमें। साक्षी, दीपा, पीवी सिंधु.....भले ही रियो में खुद को साबित कर चुकी हैं। पर, इस दोगले समाज  का नजरिया अभी भी नहीं बदला है। मौका पाते ही ये फिर से बेटी और बेटे में फर्क की खाई को चौड़ा करके बेटियों को उसमें धकेल देगा। सिल्वर मैडल की चमक को आज भी तमाम रूढ़िवादी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं...और अपनी बेटी को पेट में ही मार डालने की योजना तैयार कर रहे होंगे। और फिर आपके द्वारा इस तरह का बयान......पूछिएगा अपनी बेटियों से कि आपने अपने कद के साथ, पद के साथ कितना न्याय किया है ये बात कहकर। आप प्रधानमंत्री मोदी जी की सरकार के ही मंत्री है न....जो सेल्फी विद डॉटर के जरिए बेटियों को समाज में अव्वल दर्जा दिलाने के लिए प्रयास करते हैं। सोचिएगा.....इस संदर्भ में कि एक तरफ तो हमें मजबूत बनाने की बात की जा रही है और दूसरी ओर पराए मुल्क की आड़ में सशक्त के तमगे पर ही कुठाराघात किया जा रहा है। गलत है....यकीन मानिए। 

बात सिर्फ आपकी नहीं है....बल्कि समूची दुनिया की है। जो मॉडर्न के लबादे से ढकने का ढोंग तो करता है लेकिन स्वीकार करने में तमाम अड़ंगे आ जाते हैं। कुछ देशों में तालिबानी फरमान जारी किया जाता है कि महिलाओं का खतना होगा, लेकिन दर्द की कल्पना नहीं की जाती.....रीति, रिवाज के ढकोसलों में लपेटकर नाक, कान छिदवा दिए जाते हैं और सब आंख मूंदकर, दांतों की किटकिटाहट के साथ दिखावा करते हैं कि उन्हें इस दर्द आभास हो रहा है। यह मजहब की चादरों के तले होता है। और धर्म भी पीछे नहीं। वो इतने पैदा करते हैं और आप पीछे क्यों हैं ? क्या पुरूषों को प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ता है। क्या प्रसव के बाद पुरूषों का शरीर कमजोर होता है। नहीं न। बंद कीजिए इन पुरानी तख्तियों पर बार-बार मरती नारी का इतिहास लिखना, जूतों के तले रखने की इबारतें गढ़ना। हमें बहानों में मारा जा रहा है। लुटती आबरूओं का ये कहकर मखौल उड़ाया जा रहा है कि बलात्कारी बच्चे हैं...लड़कपन में इस तरह की गल्तियां हो जाती हैं। कहीं राजनीतिक साजिश तो नहीं.......।

लाडली बिटिया, प्यारी बिटिया का अस्तित्व आज भी अपूर्ण है। और पूरा तभी होगा जब प्रसून जोशी की वो पंक्तियां सच हो जाएंगी कि शर्म आ रही है न.....शर्म आनी भी चाहिए।। 



श्वेता तिवारी
लखनऊ

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