विचार : सत्य की विजय हुयी पाप के घड़े का भंडाफोड़ - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

विचार : सत्य की विजय हुयी पाप के घड़े का भंडाफोड़

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आसाराम-प्रकरण की टीवी चैनलों पर,अखबारों में,गली-मुहल्लों में,घर-घर में, इधर-उधर सब जगह चर्चा है।साधू-संतों का चूंकि हमारे समाज और हमारी संस्कृति में हमेशा से ही सम्मानीय स्थान रहा है,अतः ‘सन्त’ के आचरण से जुडी कोई भी अनहोनी बात जनता के लिए तुरंत चर्चा का विषय बन जाती है।पांच वर्ष पूर्व आसाराम ने जो दुष्कर्म किया था, उसकी उसको सज़ा मिल गई।सत्य की विजय हुयी और पाप के घड़े का भंडाफोड़ हुआ।दरअसल, आसाराम के अनुयायी अथवा भक्त दो तरह के लोग रहे हैं।एक वे जो सचमुच दीन-दुखी अथवा अभावग्रस्त थे। जिन्हें लगता था की ‘बाबा’ के आशीर्वाद से उनके दुःख दूर होंगे और उनके रुके हुए कारज सिद्ध होंगे।दूसरे वे लोग थे जो साधन-सम्पन्न और अच्छी हौसियत वाले थे, मगर महत्वाकांक्षाएं जिनकी अपार थीं।ऐसे समर्थ और ख्यातिवान भद्र जन भी ‘बाबा’ के पास और समर्थ, और ख्यातिवान बनने के लिए आशीर्वाद पाने के लिए जाते थे।

रिटायरमेंट के बाद मैंने जिस प्राइवेट कॉलेज में प्राचार्य के पद पर सालभर कार्य किया,वहां का एक संस्मरण याद आ रहा है।सटाफ में राजनीतिशास्त्र के एक व्यख्याता आसाराम के परम भक्त थे और आसाराम की तारीफ करते उनकी ज़ुबाँ नहीं थकती थी।आये दिन उनके कार्यक्रमों,सम्मेलनों और आयोजनों में भाग लेने के लिए अपने दस काम छोड़कर चले जाते।आसाराम के श्रद्धालुओं ने स्थानीय स्तर पर जो एक संस्था बनाई थी,उसके वे कुछ ओहदेदार भी थे।मैं उन्हें अक्सर समझाता,इन समागमों में भाग लेने से कुछ नहीं होगा।अपना समय बर्बाद मत करो।मेहनत करो और राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा के लिए तैयारी करो।सरकारी नौकरी का अपना अलग महत्व है।मेरी बात को वे सुन तो लेते मगर यह कहकर वे मुझे संतुष्ट करते कि 'बाबा' चाहेंगे तो सब कुछ हो जाएगा।मेरा उद्धार तो वही करेंगे।उनका आशीर्वाद गलत नहीं हो सकता।यह बात 2004-6 के आसपास की होनी चाहिए।

2014 में वे मुझे कहीं मिले।हताश-मायूस से।तब तक आसाराम भी लांछित हो चुके थे और उनपर मुकदमे चल रहे थे।हमारे इन राजनीतिशास्त्र के व्यख्याता साहब का भी मोह भंग हो चुका था और वे अब मुझ से नज़रे चुरा रहे थे।आखिर वे बोल ही पड़े: 'आप ने मुझे सही राय दी थी।मगर गलती मेरी थी।अंधभक्ति के मारे मेरा विवेक दब गया था।अब कहीं पक्की नौकरी भी नहीं मिल रही।' कहने का आशय यह है कि आसाराम या फिर किसी भी तथाकथित बाबा के यहां जो मजमा देखने को मिलता है,उसके पीछे की प्रमुख वजह अंधभक्तों की मनोकामना-पूर्ति का भाव रहता है।साधू-सन्तों के चक्कर व्यक्ति इसी लिए लगाता है कि शायद उसकी मुराद पूरी हो जाय।बाबा लोग भी व्यक्ति की इस कमज़ोरी का जमकर दोहन करते हैं।



शिबन कृष्ण रैणा
अलवर 
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