केन्द्र तीन तलाक बिल वापस ले और भय का माहौल समाप्त करे : रहमानी - Live Aaryaavart

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सोमवार, 16 अप्रैल 2018

केन्द्र तीन तलाक बिल वापस ले और भय का माहौल समाप्त करे : रहमानी

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पटना 15 अप्रैल, इमारत-ए-शरिया की ओर से आयोजित “दीन बचाओ, देश बचाओ” सम्मेलन में मुस्लिम नेताओं ने केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार से तीन तलाक बिल को वापस लेने और अल्पसंख्यकों तथा दलितों को डराने की हो रही कोशिशों को बंद करने के लिए कदम उठाने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों से देश में राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए शरीयत में हस्तक्षेप कर इस्लामिक संस्कृति को निशाना बनाया जा रहा है। इमारत-ए-शरिया बिहार,ओडिशा और झारखंड के अमीर-ए-शरीयत हजरत मौलाना सैयद मोहम्मद वली रहमानी ने स्थानीय गांधी मैदान में लाखों की संख्या में जुटे मुस्लिम समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण धर्म और शरीयत से खिलवाड़ किया जा रहा है और इस्लामिक संस्कृति तथा कुरानी शिक्षा को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महिला सुरक्षा के नाम पर सरकार ने तीन तलाक से संबंधित विधेयक लाकर शरीयत में हस्तक्षेप का नया दरवाजा खोल दिया है। मो. रहमानी ने केन्द्र सरकार से शरीयत में हस्तक्षेप बंद करने और महिला सुरक्षा के नाम पर लाये गये तीन तलाक बिल को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि सरकार को अपने रवैये में बदलाव करना चाहिए और कुरान तथा हदीस की पवित्रता को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भीड़ की हिंसा और कुछ बेलगाम नेताओं के बयान के जरिये देश के मुसलमान ,दलितों और कमजोर वर्ग में भय पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इसलिए सरकार नफरत और भय के माहौल को समाप्त कर समाज में समानता कायम करने की कोशिश करे तथा देश की एकता और अखंडता को खतरे में न डाले।

अमीर-ए-शरीयत ने कहा कि देश के संविधान में सभी धर्मों को मानने की आजादी दी गयी है, लेकिन पिछले कुछ समय से पूरे देश पर एक विचार थोपने का प्रयास किया जा रहा है। इस सम्मेलन के जरिये सरकार और सभी संवैधानिक संस्थाओं से मांग की जाती है कि वे पूर्ण रुप से संविधान के मर्यादा का पालन करें। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि संविधान के साथ छेड़छाड़ करने वाले देश के हितैषी नहीं हो सकते और उन्हें देश की जनता लोकतांत्रिक तरीके से सजा देगी। मो. रहमानी ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू-कश्मीर के कठुआ में बलात्कार की घटना की निंदा करते हुए कहा कि सरकार सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा की बात न करे बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त से सख्त कदम उठाये और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाये ताकि ऐसी घटनाएं फिर से न हो। उन्होंने सरकार से मस्जिदों, मकबरों, मदरसों और कब्रिस्तानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग की । इस मौके पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और पूर्व सांसद मौलाना ओबेदुल्लाह खान आजमी ने भी शरीयत में दखल की निंदा करते हुए कहा कि यह सत्य है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए लेकिन इसके बहाने शरीयत में दखल नहीं दिया जाना चाहिए। मुस्लिम समुदाय शरीयत में किसी भी तरह की दखलंदाजी को बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि आजाद न्याय प्रणाली गणतंत्र की नींव है लेकिन आज सरकारी स्तर पर न्यायालयों को लगातार प्रभावित करने का प्रयास हो रहा है। 

मौलाना आजमी ने कहा कि केन्द्र में जब से नयी सरकार आयी है तब से दंगाइयों के हौसले बढ़ गये हैं। मुसलमानों, दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। कुछ राज्य की सरकारें समाज के ऐसे दुश्मनों को बचा रही है। उन्हें लगता है कि इससे उनका वोट बैंक बढ़ रहा है। उन्होंने सभी राज्य सरकारों से साम्रदायिक दंगा विरोधी बिल पारित करने की मांग की ताकि दंगा पीड़ितों को हर्जाना और दंगाईयों को सजा मिल सके। सम्मेलन में दस सूत्री प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया है कि न्यायालय के कुछ फैसलों की वजह से यह धारणा बन रही है कि न्यायालय इस्लामिक सिद्धांतों की व्याख्या मनमाने तरीके से कर रहा है और इसके कारण जो फैसले हो रहे हैं उससे शरीयत में हस्तक्षेप होता है। यह सम्मेलन न्यायालय का सम्मान करते हुए उसे अपने रवैये में बदलाव करने की मांग करता है। प्रस्ताव में कहा गया है कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति मनमाने ढ़ंग से कर रही है। सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला न्यायालय पर छोड़ देना चाहिए। प्रस्ताव में महिला जागरूकता अभियान को बढ़ाने पर भी बल दिया गया। प्रस्ताव में कहा गया है कि सम्मेलन को एहसास है कि विभिन्न कारणों से पारिवारिक प्रणाली टूट-फूट रही है। दीनी मामलों में भी मुसलमान कमजोर हो रहे हैं और महिलाओं के मामले में धार्मिक शिक्षा और समझ की कमी पायी जाती है इसलिए आवश्यक है कि मुसलमान दीन बचाने के लिए अपने निजी एवं घरेलू जीवन में भी संवेदनशील एवं जिम्मेदार हों। इसके साथ ही प्रस्ताव में मुसलमानों के लिए इस्लाम की बुनियादी शिक्षा को अनिवार्य किये जाने पर भी बल दिया गया और कहा गया कि लड़के एवं लड़कियों को ऐसी जगह शिक्षा दिलायी जाये जहां बुनियादी दीनी तालीम प्राप्त करना संभव हो जहां आधुनिक शिक्षा देने वाले शैक्षणिक संस्थाओं में दीनी तालीम की व्यवस्था न हो वहां छुट्टियों में इसके लिए कोर्स चलाये जाये। सम्मेलन को मुस्लिम प्रसनल लॉ बोर्ड के सचिव मौलाना उमरैन महफूज रहमानी , जमियत अहले हदीस के अमिर मौलाना असगर इमाम मेहदी सलफी और बोर्ड से ही जुड़े मौलाना अबू तालीब रहमानी ने भी संबोधित किया। 
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