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बुधवार, 25 अप्रैल 2018

आलेख : निर्दोष संगीता बनी नीतियों का शिकार

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सांगली जिला दक्षिण पश्चिमी भारत के दक्षिणी महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। जिले के मिरज तालुका में एक गांव है मलगांव। इसी गांव की रहने वाली हैं संगीता बालासाहेब गुजले। 2011 की जनगणना के अनुसार मलगांव की कुल जनसंख्या 26,917 है जिसमें महिलाओं की कुल आबादी 13,224 है। 2011 में गांव में अनुसूचित जाति की कुल आबादी 17.58 प्रतिशत थी जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.47 प्रतिशत थी। गांव का साक्षरता दर 82.12 प्रतिशत था जबकि महिला साक्षरता दर 75.56 था। मलगांव की संगीता ने आयु के चालीस बसंत देखे हंै। मायका कोलहापुर जिले के पन्हाला तालुका के पेठ गांव में है। संगीता के परिवार में दो बेटियों, एक बेटा व पति को मिलाकर कुल पांच सदस्य हैं। परिवार की आय का मुख्य साधन खेती है व मासिक आय 15-16 हज़ार रूपये है। मायके का परिवार बड़ा और गरीब होने की वजह से संगीता सिर्फ कक्षा छह तक ही शिक्षा हासिल कर सकीं। अन्य भाई बहनों की शिक्षा भी आर्थिक परिस्थितियों की वजह से बाधित हुई। ‘‘उस जमाने में यह बहुत सामान्य बात थी। पढ़ाई लिखाई को इतना जरूरी नहीं समझा जाता था और लड़कियों की शिक्षा की ओर तो बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता था। इस बारे में संगीता कहती हैं कि-‘‘मेरे परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। इसलिए पढ़ाई छोड़ने का फैसला मैंने खुद लिया था। आज जब पंचायत चुनावों में भाग लेना चाहा तो शिक्षा की अहमियत मुझे समझ में आई।’’
            
संगीता की शादी कम उम्र में हुई थी और ससुराल की परिस्थितियां भी संगीता गुजले को आगे की पढ़ाई करने के लिए अनुकूल नहीं थीं। परिवार में शिक्षा के प्रति अधिक रूचि नहीं थी। अपनी शिक्षा अधूरी रहने से संगीता आज खिन्न हैं। वह मानती हैं कि उनके पर्याप्त शिक्षित न होने की वजह घर व ससुराल का माहौल रहा। इस बारे में वह कहती हैं कि-‘‘मेरे पढ़ाई-लिखाई करने का समय निकल चुका है। मायके में परिवार बड़ा और आमदनी कम होने की वजह से मैं पढ़ नहीं सकी। इसके अलावा ससुराल में पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से कभी इस दिशा में सोचने का समय ही नहीं मिला।’’ संगीता घर के काम-काज के अलावा खेतों में भी काम करती हैं। अपने कम शिक्षित होने का नुकसान संगीता कई बार उठा चुकी हैं।  बैंक के काम करने हों, या इंटरनेट का इस्तेमाल, या सरकारी योजनाओं की पर्याप्त जानकारी लेना, कम शिक्षा इस सब में आड़े आती है। पर संगीता सामाजिक कामों से जुड़कर समाज के भले के लिए काम करने की इच्छुक हैं। इसके लिए विभिन्न सामाजिक समूहों से जुड़कर उन्होंने काम करने की कोशिशें की है। वह स्थानीय कृषि मंडल की सक्रिय सदस्य हैं और महाराष्ट्र सरकार की बचतगत योजना के तहत महिलाओं को लोन दिलाने के अलावा उनको घर पर रहकर ही व्यवसाय करने के लिए प्रेरित करने व मशविरा देने के काम में लगी हुई हैं। वह मराठी स्कूल की शिक्षा कमेटी की भी सदस्य हैं। शिक्षा समिति की सदस्य के तौर पर वह स्कूल का प्रबंधन देखती हैं। सरकारी स्कूल में मिड डे मील के तहत स्कूल में बच्चों को मिलने वाले आहार की नियमित रूप से जांच करना उनकी जिम्मेदारी है। 
          
गांव में शराब बंदी के एक स्थानीय आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है। गांव की अन्य महिलाओं के साथ काम करते हुए गांव में शराब की दुकान को बंद कराने का श्रेय उनको प्राप्त है। एक आंदोलन के बाद आज भी गांव में शराब से ग्रस्त लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। संगीता का मानना है कि सरपंच के तौर पर वह इस दिशा में बेहतर और दीर्घकालीन प्रभाव के प्रयास कर सकती हैं। मलगांव की सीट 2017 में महिला सीट हुई तो संगीता ने अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सरपंच के चुनाव में प्रतिभाग करने का विचार किया। किन्तु उनकी कक्षा 6 तक की शिक्षा ने उनको इस अवसर का इस्तेमाल नहीं करने दिया। हालांकि संगीता निराश नहीं हैं और इस दिशा में सार्थक और सशक्त कदम उठाने के लिए कटिबद्ध हैं कि उनका गांव शराब के इस अभिशाप से मुक्त हो सके। संगीता और उनके दौर की बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जो परिवार की माली हालत या लड़कियों की शिक्षा के प्रति समाज की उदासीनता का शिकार हैं। 30 बरसों में दुनिया इतनी बदल जाएगी और बेटियां बहुत से मौके खोएंगी इसकी कल्पना न उस दौर की बेटियों ने की थी न अभिभावकों ने। आज जब राज्य सरकार ने पंचायत चुनावों में प्रतिभागिता करने के मानक तय कर दिये हैं, संगीता और उनकी जैसी बहुत सी महिलाएं अब लोकतंत्र के इस यज्ञ में भाग लेने से वंचित हो गयी हैं, और वह भी बिना किसी दोष के। केवल मानक से कम शिक्षा ही नहीं बल्कि दो बच्चांे के नियम की बाध्यता के कारण भी सरपंच के चुनावों में प्रतिभाग करने से वंचित रह गयी हैं। 
          
संगीता कहती हैं कि-‘‘मैं मलगांव से सरपंच का चुनाव लड़ना चाहती थी। सरपंच के लिए सातवीं पास होना जरूरी है मगर मैं छठी पास हंू। इसके अलावा आवेदन फार्म में भी लिखा था कि दो से ज़्यादा बच्चे नहीं होने चाहिए मगर मेरे तीन बच्चे हैं। महाराष्ट्र पंचायती राज एक्ट के मुताबिक यदि किसी भी उत्मीदवार को 2001 के बाद तीसरी संतान है तो वह चुनाव में प्रतिभाग नहीं कर सकता। संगीता के तीन बच्चें हैं उनको पहली संतान 1995 में हुआ था और उनका तीसरी संतान 2003 में हुई। अतः वह चुनाव में हिस्सा नहीं ले पायीं। इस बारे में संगीता कहती हैं कि-‘‘शैक्षिक व दो बच्चों के नियम की योग्यता पूरा न कर पाने के कारण मैं सरपंच का चुनाव लड़ने से वंचित रह गयी। इसी वजह से मेरा सरपंच बनने का सपना अधूरा रह गया।’’ हालांकि न कम शिक्षा के लिए वह जिम्मेदार हैं न तीन बच्चों की मां होने के लिए। इस बारे में संगीता कहती हैं कि-‘‘हमारे परिवारों में कौन औरत से पूछता है कि उसे कितने बच्चे चाहिए, बेटा चाहिए या बेटी से संतुष्ट है। उसे तो परिवार और पति के आदेश का पालन करना होता है। यदि परिवार को बेटा चाहिए है तो औरत को दो, तीन, चार कितनी भी बेटियां हों, उनके बाद भी बेटे को जन्म देना ही पड़ेगा और इसकी भी जिम्मेदारी उस पर ही आएगी कि उसे बेटा नहीं हुआ। सच में महिलाओं को निर्णय लेने में शामिल ही नहीं किया जाता। लेकिन इसके सारे नुकसान तो हमें ही उठाने पड़ते हैं। इन सब कारणों के चलते पंचायत चुनावों में प्रतिभाग करने का सपना देखना भी मेरे लिए संभव नहीं। ’’ 

         
संगीता को बहुत अफसोस है कि वह सरपंच चुनावों में प्रतिभाग नहीं कर सकीं। लेकिन उन्हें शिक्षा का महत्व पता है। वह मानती हैं कि शिक्षा ही सबका भविष्य उज्जवल कर सकती हैं। इसलिए वह अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर सतर्क हैं और उन्हें बेहतर शिक्षा दे रही हैं। संगीता शिक्षा के सरकारी नियम के खिलाफ भी नहीं हैं। वह स्वीकार करती हैं कि सरपंच के लिए शिक्षित होना अच्छा ही है कम-कम शिक्षित व्यक्ति पंचायत का काम-काज तो अच्छे से कर सकता है।





(वैशाली खिलूदकर)
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