विशेष : ​ संस्कार और जीवन शैली योग के अगले सोपान - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 7 जुलाई 2018

विशेष : ​ संस्कार और जीवन शैली योग के अगले सोपान

Swami Niranjananand
अंतराष्ट्रीय योग दिवस के मनाते हुए चार साल हो गए। अब योग की शिक्षा की दिशा क्या होनी चाहिए। इस संदर्भ में योग के परमाचार्य परमहंस स्वामी से बातचीत ।वे मात्र चार वर्ष की उम्र में अपने गुरू स्वामी सत्यानंद सरस्वती के सानिघ्य में रहने बिहार योग विद्यालय मुंगेर आए,जहां उनके गुरू ने योग एवं आध्यात्म का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया। 11 वर्ष की उम्र में 1971 में दशनामी सन्यास परंपरा और 1990 में परमहंस सन्यास में दीक्षित हुए। इस उम्र में ही दुनिया के देशों में सत्यानंद योग केन्द्र की स्थापना की।1993 में स्वामी सत्यानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी के रूप में अभिषिक्त हुए। 1994 में विश्व के प्रथम योग विश्वविद्यालय की स्थापना की। वे योग दर्शन, अभ्यास,एवं जीवनशैली गहन जानकारी रखते हैं।पिछले वर्ष योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान को लेकर पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित भी किया जा चुका है।2014 से सत्यम योग प्रसाद को जन जन पहुंचाने के लिए भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा कर रहे हैं।निरंजनानंद सरस्वती की क्या योजना है,लोग योग को किस रूप में देखते हैं और योग की शिक्षा किस रूप में दी जानी चाहिए और वे स्वयं इस दिशा में कार्य कर रहे हैं, पेश है,उनके विचार उन्हीं की जुवानी।इसे पेश कर रहे हैं कुमार कृष्णन

विश्व में और भारत के अन्य स्थानों जो योग की शिक्षा होती है,वह आसन आ​धारित शिक्षाएं होती है। कुछ लोग तो कहते हैं कि आसन ही योग है।आसन आधारित शारीरिक शिक्षा को ही लोग योग मानते हैं।पूरी दुनिया में नब्बे फीसदी लोग योग को शरीर आ​धारित प्रक्रिया मानते हैं,आसन तक ही सीमित रखते हैं और कहीं—कहीं पर आसन के साथ प्राणायाम जोड़ देते हैं। कहीं पर आसन, प्राणायाम के साथ उपनिषद या वेदां​तिक ज्ञान जोड़ दिया जाता है, वही योग होता है। मुंगेर की जो योग परंपरा​ है,जिसे बिहार योग पद्धति कहते है,इस पद्धति में केवल आसन आ​धारित योग शिक्षा नहीं है,बल्कि जीवन को सुसंस्कृत बनाने की शिक्षा है और जीवन को व्यवस्थित करने की शिक्षा है। यह दोनो शामिल है। यही योग के द्वितीय सोपान का लक्ष्य है— संस्कार और जीवनशैली। वास्तव में अभी तक जो योग का प्रचार प्रसार विश्व में हुआ है, उससे समाज या मनुष्य को क्या प्राप्ति हुई है? भौतिक,शारीरिक रूप से निश्चित रूप से प्राप्ति हुई है,लोग तनाव मुक्त हुए हैं,रोग मुक्त हुए हैं। शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य में शांति की अनुभूति तो हुई है। सब हुआ योग प्रचार के दौरान । अब इसके आगे क्या? अब योग की यात्रा में दूसरा कदम लेना है।पहला कदम लिया गया है, योग प्रचार का,जो दूसरा कदम लेना है वह है अपने जीवन को संस्कार से युक्त करना और अपने जीवन शैली को व्यवस्थित करना। तो संस्कार और जीवन शैली ये योग के अगले सोपान हैं,जिस पर पिछले चार वर्षो से गंगा दर्शन में काम किया जा रहा है। इस वर्ष से योग के द्वितीय सोपान का व्यवहारिक प्रचार और प्रशिक्षण दोनों संपन्न हो रहा है।सन् 2018 योग के लिए बहुत महत्वपूर्ण वर्ष है और योग के द्वितीय सोपान का प्रचार और प्रशिक्षण भारत के विभिन्न राज्यों मे शिबिरों के माध्यम से देना आरंभ किया गया है। 

जनवरी से जून तक इच्छा थी कि पूरे भारत में 400 शिबिर हों,क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का चौथा वर्ष हैं। सच कहें तो हमारे लिए  अंतर्राष्टीय योग दिवस प्रतिदिन है। यह तो केवल एक अवसर है समाज के लिए ,अपने देश के लिए, कि इस अवसर पर योग के संदर्भ में कुछ चिंतन कर सकते है,सोच सकते हैं,एक दिन समय दे सकते है, हम अपने को योगाभिमुख कर सकते हैंं। यदि इस प्रेरणा को हम साल भर तक कायम रख सके तो निश्चित रूप से उपलब्धि हमारी है,फायदा हमें है।अंतराष्ट्रीय योग दिवस एक अवसर तो है हमारे लिए कि योग परंपरा के विचारों,विधियों और शिक्षा से अवगत कराया जाय। इस वर्ष चूंकि चौथा साल था। चार की संख्या में निर्णय लिए गए। चार सौ शिबिर पूरे भारत में करेंगे। जितने भी शिक्षक है उनके माध्यम से,उनके सहयोग से विभिन्न राज्यों में, गांवों में,शहरों में योग शिबिर का संचालन किया गया। गांवों में कहीं पचास से सौ की संख्या रही, तो शहरों में चार सौ से पांच सौ  से लेकर हजार तक की संख्या रही। इस प्रकार पूरे देश में ​शिबिरों की संख्या बढ़कर 450 हो गयी। बिहार के 45 क्षेत्रों में भी शिबिर आयोजित किए गए। कुल मिलाकर लगभग पांच सौ शिबिर आयोजित किए गए। महानगरों में जगह — जगह सम्मेलन भी आयोजित किए गए। पूरे देश में छह योग सम्मेलन हुआ। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर यहां शिक्षकों को याद किया गया। बोधि मंदिर में पर्यटन विभाग के अनुरोध पर दुनिया के बीस देश देशों के पर्यटकों के लिए योग प्रशिक्षण और परिचर्चा का आयोजन किया गया। 

अब जुलाई से होनेवाला कार्यक्रम मुंगेर और योग के लिए महत्वपूर्ण होगा। अक्टूबर में मुंगेर में एक योग गोष्ठी होगी जिसमें दुनिया भर के ​योग शिक्षक हिस्सा लेंगे। इसका मकसद उनके ज्ञान को अद्यतन करना है।शिक्षकों को तैयार करना है।यह महत्वूपर्ण कार्यक्रम होगा।नवीन शिक्षा दे सकें। शिक्षा को समाज में लाने के लिए प्रेरित कर सकें।जब तक हम शिक्षक नहीं तैयार करेंगे, लोगों को क्या देंगे। यदि हम सम्मेलन करते हैं और दस हजार बीस हजार की भीड़ आती है। ​जैसा पिछले सम्मेलन में हुआ चालीस हजार की भीड़ आयी। लोगों को बुला तो लेंगे, ​लेकिन देंगे क्या? हमारे शिक्षक ही तैयार नहीं हैं। इसलिए हमने यह फैसला लिया कि पहले शिक्षक को तैयार करें।शिक्षको को दूसरे सोपान के लिए तैयार करें। अगले वर्ष से व्यापक रूप से फैलाएंगें? शिक्षक तैयार तो समाज तैयार और दोनो तैयार तो समाज के लिए प्रगति संभव है।अक्टुबर की यह गोष्ठी बहुत महत्वपूर्ण है, विश्व में नए योग आंदोलन को लाने के लिए, संस्कार और जीवन शैली को आधार बनाने ​लिए। गुरू पुर्णिमा के बाद इस दिशा में कार्य आरंभ कर दिया जाएगा अगले वर्ष से योग के इतने सारे विधि और शिक्षाओं को सामने लाया जाएगा।मुझे स्वयं आश्चर्य होता है कि हमलोग कितना कम जानते हैं इस विद्या के बारे में, जो हमारे पूवर्जों ने एक घरोहर के रूप में प्रदान किया है ,अपने जीवन को उन्नत करने के लिए जिसे हम जानते भी नहीं हैं। निश्चित रूप से अगले साल से योग के क्षेत्र में परिवर्तन और एक नवीन क्रांति का उद्भव होनेवाला है। मुंगेर ही एक ऐसा नगर है अपने देश में और विश्व में जहां पर योग को हर व्यक्ति एक साधना और जीवनशैली के रूप में देखता है। कोई दूसरा शहर नहीं जहां पर यह कह सके 'योगाश्रम के प्रांगण से घर आंगन तक योग' का कार्यक्रम हुआ। यह स्लोगन तो मुंगेर का ही स्लोगन है। जब यहां कार्यक्रम होता है तो हमलोग देखते ही हैं, दो हजार घरों के छत, आंगन में, मैदान में यहां पर या वहां पर दस लोग, बीस लोग, पचास लोग मिलकर करते हैं। यह कोई छोटी बात तो नहीं है। यह उत्साह है,एक लगाव है। एक संबध को दर्शाते हैं। मुंगेर की भूमि ही आघ्यात्मिक है। नाम मुद्गलपुर पड़ा, मुदगल ऋषि के कारण। 

श्रृंगी ऋषि के का क्षेत्र रहा,जो तपस्वी थे और भी अनेक मनीषियों का आगमन हुआ जो यहां जलवायु सेवन और साधना से लाभ उठाये। दादा गुरू स्वामी शिवानंद जी भी यहां आएं थे। 1938 मे आए और पूरे दिन यहां उन्होंने नगर कीर्तन किया। उनकी वाणी है। रविन्द्र नाथ टैगोर यहां आए,उनकी रचना है यहां। उन्होंने कई रचना की। स्वामी विवेकानंद ने भी यहां आकर  स्वास्थ्य लाभ उठाएं। महात्मा बुद्ध ने यहां आकर अपने बौद्ध भिक्षुओं पहला अनुशासन का पाठ मुंगेर में पढ़ाया कि दुध और दही ज्यादा मत खाओ। जब वे मुंगेर आए थे तो यहां के लोगों ने दूध और दही से सत्कार किया। चार्तुमास के दौरान। उन्होंने भिक्षुओं को बताया कि अतिभोजन से परहेज करना चाहिए। इस मायने में मुंगेर की धरती पवित्र,पावन और आध्यात्मिक उर्जा से युक्त सांस्कृतिक भूमि रही है।दूसरी बात यहां पर एक परंपरा की शुरूआत हुई जो व्यक्तिमूलक नहीं है, बल्कि योग संस्कृतिमूलक है। हमलोग योग से जुड़े हैं। स्वामी सत्यानंद जी आए,स्थापना किए और आगे बढ़ गए। हम आए कुछ दिन काम किए और सेवानिवृत हो गए। हमलोग योग से जुड़े हैं। दूसरी पीढ़ी आयी, सेवा किया और इस कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं। इस साल तो मैंने कहीं यात्रा किया ही नहीं। अनेक जगह के कार्यक्रमों में आश्रम के सन्यासी ही गए। यह एक अच्छी बात है। हम एक व्यक्ति से नहीं संस्कृति से अपने आप को जोड़ रहे हैं और व्यक्ति हमें संस्कृति से जुड़ने की शिक्षा दे रहे हैं,ताकि हम अपने को, अपने परिवार को,अपने समाज को,अपने राज्य को,उत्तम और उन्नत बना सके। यह एक सौभाग्य है कि हम अपने घर परिवार के अतिरिक्त समाज के सांस्कृतिक उत्थान और जीवन में चारित्रक परिवर्तन में सेतु निर्माण के लिए जैसे गिलहरी भांति योगदान कर रहे हैं। हमारे मनीषियों ने चट्टान तो रख दिया,हमलोग चट्टान नहीं रख रहे हैं, जो हमारे ऋषियों ने, मनीषियों ने और संतो जो चट्टान रखें हैं संस्कृति और संस्कार के,उसी चट्टान पर तो हमलोग चल रहे हैं। अंतर इतना है कि जब हमलोग इस संस्कृति को अपनाते हैं,आत्मसात करते हैं और जब इस संस्कृति की अभिव्यक्ति् हमारे आचरण और व्यवहार से होती है। आश्रम में योग की शिक्षा केवल आसन प्राणायाम तक नहीं, अनुशासन से होती है। कोई करे या न करे उसकी ग्रहणशीलता पर निर्भर करती है। हर व्यक्ति का मन एक समान नहीं होता है। पानी को प्लास्टिक पर डालोगे तो क्या होगा प्लास्टिक गीला होता क्या? 

प्लास्टिक को पानी में डूबाकर रख दोगे तो भी प्लास्टिक गीला नहीं होगा, जब भी निकालोगे ,पोंछोगे तो सूख जाएगा। बहुत लोगो प्लास्टिक दिमाक होता है। रहेंगे लोग आश्रम में लेकिन आश्रम के संस्कारों को ग्रहण नहीं करेंगे। वहुतों का ऐसा होता है कि आश्रम में आकर सरावोर हो जाते हैं लकड़ी की तरह,एकदम ओतप्रोत हो जाता है पानी और लकड़ी।तो मानसिकता तो हर प्रकार की होती है उस पर अंगुली नहीं उठाना है ।हर प्रकार की मानसकिता के रहते हुए भी व्यक्ति का जो आशा है,अपने जीवन के प्रति कि मैं कुछ पाना चाहता हूं, वही आशा तो उसको आगे बढ़ाती है और उस आशा के द्वारा जो प्रत्यत्न होता है, जो पुरूषार्थ होता है,वह निश्चित रूप से सराहनीय है।हमलोग इन चट्टानों में उसी प्रकार का काम कर रहे हैं जैसे गिलहरी अपने शरीर को भिंगो करके,रेत लपेट कर चट्टानों के बीच जोड़ों में जाकर रेत के झाड़ देती है, जैसे प्लाटर कर रही हैं।जितना ही हमलोग अपने संस्कृति को आत्मसात करेंगे,उतना ही हमारे संस्कृति के चट्टान मजबूत होते जाएगें और एक दिन अटूट भी हो जाएगा। जिस दिन हमारी संस्कृति हमलोगों के कारण अटूट हो जाएगी,उस दिन भारत फिर से अपने आप को जगतगुरू कहलाने के योग्य हो जाएगा अभी भारत जगतगुरू नहीं है। राजनीति में जो भी कहा जाए,बास्तव में,सत्य में,जगतगुरू नहीं है। अपने जीवन में संस्कारों का अभाव है,सृजनशीलता का अभाव है,अपने जीवन में तमस अधिक है और उस तमस में नकारात्मता ज्यादा है। तमस रहे, लेकिन उस तमस में साकारात्मकता बढ़ जाए और आनंद आएगा। लेकिन उस तमस नकारात्कता बढ़ जाए तो और गहराई के पतन के गढ्डे के गर्त में गिर जाएंगे। इसलिए यहां हमलोग जो शिक्षा देते हैं, संस्कार का, स्वावलंवन का,यह एक केवल दर्शन नहीं है बल्कि एक व्यवहारिक शिक्षा है।




कुमार कृष्णन, स्वतंत्र पत्रकार
दशभूजी स्थान रोड,मोगलबाजार मुंगेर।
मोबाईल— 9304706646

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