पूर्णिया : नगरीकरण व आधुनिक मनोरंजन के साधन विकसित होने से मेले की परंपरा का हुआ क्षरण - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 20 सितंबर 2018

पूर्णिया : नगरीकरण व आधुनिक मनोरंजन के साधन विकसित होने से मेले की परंपरा का हुआ क्षरण

- पूर्णिया और आसपास का क्षेत्र मूलत: ग्रामीण या फिर ग्राम्य पोषित क्षेत्र रहे हैं, यही प्रमुख कारण था कि यहां लोगों को अपनी जरूरत के सामान के लिए मेले का इंतजार करना पड़ता था
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पूर्णिया  (कुमार गौरव)  पूर्णिया जिले की पहचान यहां पर लगने वाले मेले को लेकर भी है। इसलिए इसे मेलों का शहर भी कहा जाता है। पूर्णिया और आसपास का क्षेत्र मूलत: ग्रामीण या फिर ग्राम्य पोषित क्षेत्र रहे हैं। यही प्रमुख कारण था कि यहां लोगों को अपनी जरूरत के सामान के लिए मेले का इंतजार करना पड़ता था। मेले के थियेटर का लोग सालों भर इंतजार करते थे। मेले की अपनी अलग पहचान थी। लोग कई महीने पूर्व से ही मेले का इंतजार करते थे और फिर मेले से अपनी यादों को संजोकर ले जाते थे। जिसकी चर्चा अगले मेले तक होती रहती थी। यहां लगने वाले मेले पर रचनाकार और फिल्मकारों की नजर पड़ी तो उन्होंने अपने साहित्य में इसका जिक्र किया। राजकपूर और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म तीसरी कसम तो पूर्ण रूप से यहां के मेले पर आधारित है। नगरीकरण व आधुनिक मनोरंजन के साधन विकसित होने से मेले की परंपरा का क्षरण हुआ और मेलों के शहर में मेला अकेला पड़ रहा है। 

...विदेश तक इस मेले की थी चर्चा :
कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी और उपन्यास में चर्चा है। उनकी प्रसिद्ध रचना मारे गए गुलफाम और लाल पान की बेगम कहानी में गढ़बनैली मेले की चर्चा मिलती है। पूर्णिया और आसपास के जिले के क्षेत्रों में बड़े बड़े मेले लगते थे। फारबिसगंज का मेला इस इलाके का सबसे प्रसिद्ध मेले में से एक है। जिसमें नेपाल तक से लोग पहुंचते थे। इसमें लकड़ी, लोहे और घरेलू सामान बिकते थे। इस मेले का आकर्षण का केंद्र नाच था। जिसमें कठपुतली नाच और थियेटर भी लगते थे। जहां लोक संस्कृति की झलक मिलती थी। उसके बाद गढ़बनैली का मेला जिसका आज भी आयोजन होता है। इसी मेले का जिक्र रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम में मिलता है। इसपर फिल्म तीसरी कसम बनी। यहां का प्रसिद्ध मेला गुलाबबाग का मेला है। इस मेले की भव्यता की कहानी आज भी लोगों की जुबां पर है। इस मेले में लगने वाला थियेटर काफी प्रसिद्ध था।

...वस्तुओं की खरीद और मनोरंजन का था साधन : 
दरअसल मेला लोगों के लिए मिलन स्थल के साथ आवश्यक वस्तुओं की खरीद, संस्कृति का आदान प्रदान के साथ मनोरंजन के साधन भी थे। इसके अलावा पर्व त्योहार पर भी मेला लगता है जो अब भी लग रहा है लेकिन उसके स्वरूप में बदलाव हो चुका है। 

...मनोरंजन के साधन बढ़ने से मेले की आवश्यकता हुई कम : 
गढ़बनैली मेला संचालक सह पूर्व सरपंच नवीन कुमार राय कहते हैं कि आधुनिक मनोरंजन के साधन के साथ ही मेला संस्कृति अब लुप्त होती जा रही है। अब मेले में मनोरंजन के नाम पर फूहड़ नृत्य ने जगह ले लिया है। मेला लोक संस्कृति को भी एक मंच देता था। शोधार्थी गोविंद कुमार का कहना है कि मेला के आयोजन की परंपरा बाजार विकसित होने के साथ खत्म होती गई। कृषि प्रधान समाज होने के कारण खास खास मौके पर ही किसान खरीदारी करते हैं। अन्य मौके पर वे अपने किसानी कर्म में लगे रहते थे इसलिए आवश्यक वस्तुओं की खरीद के साथ मनोरंजन का भी प्रमुख साधन था। नगरीकरण ने इस स्थिति को बदल दिया। लोगों के पास आवागमन के साधन भी सुलभ हैं जिस कारण बाजार उनकी पहुंच में है।
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