विशेष : एक सोच,जो मनुष्य को दार्शनिक बनाता है। डॉ•नलिनी रंजन - Live Aaryaavart

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रविवार, 2 सितंबर 2018

विशेष : एक सोच,जो मनुष्य को दार्शनिक बनाता है। डॉ•नलिनी रंजन

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बेगूसराय (अरुण कुमार) कृष्ण का व्यक्तित्व विराट,बहु-आयामी, अद्भुत है।सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आदर्श और अनुकरणीय है। उनका शैशव-काल,उनकी कैशोर्यवस्था, उनका यौवन, पूर्ण-पुरुषत्व, प्रौढ़ावस्था,यहाँ तक कि उनका बृद्ध-काल भी अलौकिक और लालित्य-पूर्ण है। उनका बचपन सूरदास की सरस कविताओं में जीवंत है, वे माखन चोर हैं, हमउम्र बालकों के साथ अनेक चित्ताकर्षक क्रीड़ाएं, माता से रूठना,मनाना,जिद करना,अनेक बहाना,ओर उनके बाल सुलभ तर्क देना, कितना आकर्षक है। उनका कैशोर्य उनका नवयौवन,जयदेव के गीत-गोविन्दम में आज भी साकार हो उठता है।लगता है ये सब आज की घटना हो। या यों कहें, मेरी चाहत ,कृष्ण रूपी पात्र के रूप में जँह-तह लीला कर रही हों।उनकी लीलाओं को याद करते करते हम अपने आपको कृष्ण में विलीन कर देते हैं, बचपन से नव यौवन, में परिवर्तित होती मित्राणि राधा और उनकी सहेलियों को छेड़ना, उनके साथ चुहलवाजी करना, कंकरिया मार घड़े फोड़ देना,उनके वस्त्र छुपा देना, उनकी शिकायत पर, मार खाना ये उनकी बालापन से किशोरावस्था तक के काल की चित-भावन,मनोरम लीलाएँ मानो आज भी वृद्धावस्था को प्राप्त मनुजों में भी मानो जवानी का उमंग भर देता है। अभीतक उन्हें लिंग-भेद का ज्ञान नहीं है,वे राधा को अपनी शैशव-काल का ही मित्र मानते हैं, उन्हें विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण तो हो रहा है पर,पुरुष-स्त्री के बीच का स्वाभाविक प्रेम का मर्म नहीं मालूम। साधारण लोग उनकी उच्छऋंखला मानते हैं,पर यह उस अवस्था का स्वाभाविक दर्शन (फिलॉसफी) है। यौवन में कृष्ण का राधा से परिपकत्व सात्विक प्रेम आज भी अमर और आकर्षक है। इस उम्र में उनका प्रेम कभी मर्यादा नहीं लांघता है।एक दूजे के लिए प्राण त्याग सकते हैं,पर शारीरिक संबंध नहीं बनाते। धन्य है,उनके आदर्श प्रेम की सीख! वह निश्छल,वासनारहित प्रेम करते हैं,जिसमें चाहत है,समर्पण है,त्याग है,पर रत्तीभर भी वासना नहीं है। प्रेम को विवाह में परिवर्तन करने की रुचि नहीं है।यह दो आत्माओं का प्रेम है,शरीर का सहज आकर्षण नहीं।इसीलिए राधा और कृष्णा का यह प्रेम,अमर है,अलौकिक  है,आदर्श है।

आज भी अनुकरणीय है,कल भी अनुकरणीय रहेगा।
उनका पूर्ण पुरुषत्व उनके सामाजिक एवं गार्हस्थ्य जीवन का आदर्श है। सत्य और मित्र की भूमिका महाभारत का सार है,वहीं बहन की रक्षा में (द्रोपती) की विषम परिस्थिति में चीर-हरण से बचाव में उनकी भूमिका आज भी हर मन को मगन कर देता है। भाई-बहन के पावन संबंध का उत्कृष्ठ उदाहरण है। प्रौढ़ावस्था में उनका ज्ञान के अजस्त्र प्रबाह,"गीता"है। पांच हज़ार वर्ष पूर्व का ज्ञान आज के इलेक्ट्रॉनिक युग मे भी कितना सार्थक एवम सत्य है; अपरिमित और अपरिमेय है।हे माधव आपसे ज्यादा कौन समझ सकता है? विस्व इस विराट पुरुष के अलौकिक ज्ञान से अविभूत है। ऐसे आदर्श पुरुष की मृत्यु नहीं हो सकती,किन्तु विधि के विधान खंडित न हो, उनकी दैहिक मृत्यु होती है। इतने बड़े विराट पुरुष का पुनर्निमाण भी हम सब की अहम लालसा है। ऐसे सम्पूर्ण मानवीय और दैवीय-गुण से परिपूर्ण एक अलौकिक विराट आदर्श पुरुष का आज जन्म दिन है। इस महान अवसर पर आपको शुभकामना देता हूँ कि उनके जीवन के हर क्रिया-कलाप से सीख लें,कृष्ण के आदर्श को आत्मसात करें।रक्षक बनें भक्षक नहीं।
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