दुमका : संथालो के पर्व-त्योहार पर शुभकामनाओं से भी उन्हें वंचित रखा जाता है अखाड़ा - Live Aaryaavart

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सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

दुमका : संथालो के पर्व-त्योहार पर शुभकामनाओं से भी उन्हें वंचित रखा जाता है अखाड़ा

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हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई व अन्य धर्मावलम्बियों के पर्व-त्योहार के अवसर पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के जनप्रतिनिधियों/ नेताओं द्वारा अलग-अलग स्थानों पर बड़ी-बड़ी होडिंग्स लगाकर जहाँ एक ओर अपनी भावनाओं का इजहार करते हुए उन्हें शुभकामनाएँ दी जाती है, वहीे संथालो के पर्व-त्योहारों पर शुभकामनाओं से से भी उन्हें वंचित रखा जाता है। खुद को आदिवासियों की हितैषी समझने वाली राजनीतिक पार्टियाँ व उनके नेताओं द्वारा संथाली पर्व-त्योहार की अनदेखी वर्दाश्त से बाहर होती जा रही  है। आने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में ऐसी पार्टियों को बुरे परिणाम का सामना करना होगा।  दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर अखाड़ा के बैनर तले ग्राम लेटो (दुमका प्रखण्ड) में दिन सोमवार को एक बैठक कर ग्रामीणों ने बेलबोरेन पूजा पर जनप्रतिनिधियों द्वारा शुभकामनाएं नहीं दिये जाने का विरोध करते हुए आगामी लोस व विस चुनाव में राजनीतिक दलों के बहिष्कार का निर्णय लिया। इष्ट देवता ठाकुर व ठकरन को प्रसन्न करने के लिय दशाय नृत्य व बेलबोरोन पूजा संथाल आदिवासियों का महत्वपूर्ण पर्व है। ग्रामीण सुनील टुडू, मंगल मरांडी, झोमोन मरांडी, काहा मरांडी, दीवान टुडू, मंगल मुर्मू, बाबुराम मुर्मू, सोले मुर्मू, साहेब टुडू, सुलेमान मुर्मू, सोम किस्कू, गोपीन किस्कू, बाबुधन मरांडी, सोहराय टुडू, संतोष मरांडी, राजेश मुमु, रासमती किस्कू, मिनी मरांडी, एलेजाबेद हेम्ब्रोम, मोनिका हांसदा, अनिता टुडू,वमर्शीला हेम्ब्रोम व अन्य का आरोप है कि दुमका लोस व विस सीट आदिवासियों के लिये आरक्षित है। संताल परगना प्रमण्डल अन्तर्गत लोक सभा की तीन सीटों में दुमका व राजमहल आदिवासियों के लिये आरक्षित है जबकि गोड्डा सामान्य श्रेणी के तहत। इनका कहना है कि जहाँ एक ओर सभी राजनितिक पार्टियाँ खुद को आदिवासियों के हितैषी के तौर पर देखते हैं वही आदिवासियों की पूजा-अर्चना व पर्व-त्योहार पर शुभकामनाओं के माध्यम से भी उनकी खोज-खबर नहीं लेते। जनप्रतिनिधियों/ राजनीतिक पार्टियों की दोहरी नीति अब नही चलने वाली। ग्रामीणों का कहना है जो आदिवासियों के पर्व-त्योहार में शुभकामनाएँ तक नहीं दे सकते वैसे जन प्रतिनिधि व राजनीतिक पार्टियाँ आदिवासियों के हक-हकुक के लिये क्या संघर्ष करेंगे। ऐसी पार्टियों व उनके नेताओं को वोट देकर अपना ही नुकसान करना है। ग्रामीणों का कहना है अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को वोट देने से अच्छा है किसी निर्दलीय को वोट देकर उसे आगे बढ़ाया जाय ताकि आदिवासियों के दुख-दर्द को वे पूरी गंभीरता के साथ सुन सकें। अखड़ा व ग्रामीणों ने आक्रोश प्रकट करते हुए कहा कि देश की आजादी के 70-71 वर्ष बीत गए। इतने वर्षो के बाद भी आदिवासियों के पर्व-त्योहारों पर  राजनितिक पार्टियाँ भेदभाव करती रहीं है। ग्रामीणों का कहना है राजनीतिक पार्टियों द्वारा जो मान-सम्मान आदिवासियों को मिलना चाहिए वह उन्हें नसीब नहीं हो पा रहा। सरकार से भी यह मांग करते हुए बैठक में मौजूद अखाड़ा के सदस्यों ने कहा कि प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया के मध्यम से आदिवासियों के पर्व-त्योहार को सार्वजनिक कर इसका मैसेज दूर-दूर तक दिया जाय ताकि लोग आदिवासियों के पव्र-त्योहार से भी अवगत हो सकें। सर्वसम्मति से  अखाड़ा व ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि यदि क्षेत्रीय व राष्ट्रीय राजनितिक पार्टियाँ आदिवासियों के प्रति अपना आचरण नही बदलती है तो आगामी लोक सभा व विधान सभा चुनाव में निर्दलीय को वोट देकर उन्हें विजयश्री का ताज पहनाया जाएगा। 
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