सम्पादकीय : "जिह्वा तोड़" लोकतंत्र के मायने...... - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

सम्पादकीय : "जिह्वा तोड़" लोकतंत्र के मायने......

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विजय सिंह, सम्पादकीय ,आर्यावर्त डेस्क,6 दिसंबर,2018,  7 दिसंबर को राजस्थान और तेलंगाना में मतदान के पश्चात पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव संपन्न हो जायेंगे. अब राजस्थान,तेलंगाना सहित मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम को 11 दिसंबर का इंतजार रहेगा जब ई वी एम् से प्रत्याशियों के साथ साथ पार्टियों के भाग्यांक निकलेंगे.चूँकि इन राज्यों के विधानसभा चुनाव को 2019 के आसन्न लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास
समझा जा रहा है ,इसलिए पार्टियों ने अपनी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरा "दम" लगा दिया है. जाहिर है,हर पार्टी के "मुखिया" ने भी "जी तोड़" मेहनत की है. लेकिन ये जी तोड़ मेहनत कब "जिह्वा तोड़" मेहनत में बदल गई, देशवासियों को पता ही नहीं चला. सुना था कि लोकतंत्र में मतदाता ही मालिक होते हैं. कहीं यह भी पढ़ा था कि "जम्हूरियत में बन्दों को गिना नहीं करते ,उन्हें तौला करते हैं." तो क्या मालिकों के पास जब "सेवक" जाते हैं तो उन्हें छीछालेदर,भद्दी जुबान,आरोप प्रत्यारोप,बेतुके शब्द,गरिमाहीन वाक्य सुनाने जाते हैं ? क्या यह बताने जाते हैं कि हम ही सबसे खरे हैं बाकी सब खोटे ? गाली गलौच की कौन सी तराजू में बन्दों को तौलना चाहते है देश के ये साहूकार ?लिहाज ,गरिमा ,बड़प्पन, संयम ,गरल किसी के पास नहीं ,कोई समझने ,मानने को तैयार नहीं. न पद की गरिमा न सम्मान. एक प्रधानमंत्री की जाति पूछता है,तो एक कान से खून निकालने की बात करता है. कोई प्रधानमंत्री की माता को घसीटता है तो कोई उनके स्वर्गवासी पिता को. यह कौन सी राजनीति है,किस राजनीतिक विज्ञान की किताब में लिखी गयीं हैं, हम जानना चाहते हैं.1947 के पहले और आज़ादी के बाद देश में क्या हुआ ,किसने क्या किया,किस प्रधानमंत्री और सरकार ने क्या किया,यह अब इतिहास की बात है. आज वर्तमान हमारा है और वर्त्तमान जब रौशन होगा तभी "मालिक" का भविष्य प्रकाशमय  होगा.फिजिक्स हम पढ़ चुके,केमिस्ट्री बताईये न. बनाइये न नए सपनों का भारत,नई उम्मीदों का देश. किसने रोका है. नेताओं को फिसलती जुबान पर लगाम लगाना होगा.लोकतंत्र का यह मतलब नहीं कि आप मर्यादा छोड़ दें.गरिमा का ख्याल सभी को रखना होगा,चाहे सेवक हों या प्रधान सेवक.देशवासियों को भी जागना होगा,बताना होगा कि हमें ऐसी शुचिता विहीन राजनीति नहीं चाहिए. ज़रा सोचिये कि जिह्वा तोड़ राजनीति में नेता प्रत्याशी पार्टियां तो जीतती हारती रहेंगी लेकिन क्या पूरे विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी क्षीण होती गरिमा पर गौरव महसूस कर पायेगा ? सोचियेगा जरूर.
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