दुमका : नृत्य व संगीत कार्यशाला का पांचवां दिन रहा खास - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

दुमका : नृत्य व संगीत कार्यशाला का पांचवां दिन रहा खास

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दुमका (अमरेन्द्र सुमन) संस्कृति मंत्रालय पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र कोल काता द्वारा प्रायोजित व झारखंड कला केन्द्र दुमका के तत्वावधान में इंडोर स्टेडियम, दुमका  में आयोजित    नृत्य, गायन व वादन के लिए आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला के पांचवे दिन  उपरोक्त  विधाओं के गुरुओं ने कार्यशाला के समापन समारोह (13 जनवरी) के मद्देनजर, अंतिम तैयारी पुख्ता कर लेने का निदेश दिया। पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी समापन समारोह में तीनों विधाओं के विद्यार्थी एक साथ अपनी-अपनी विधाओंं पर प्रस्तुति देंगे।  संगीत कार्यक्रमों में यह  विरले ही देखा जाता है जब संगीत की  तीनों विधाओं की एक साथ प्रस्तुति होती हो। संगीत गुरु चन्दन चटर्जी के अनुसार  इस कार्यक्रम के लिए गायन, वादन और नृत्य तीनों विधाओं के विद्यार्थियों ने एक साथ तैयारी की है। तीनों विधाओं के विद्यार्थियों के संयोजन व उनके बीच के सामंजस्य से ही इस तरह के कार्यक्रम सम्भव है। रचनात्मक स्तर पर गायन, वादन और नृत्य एक दूसरे से अलग होकर भी एक दूसरे के पूरक हैं।और स्वर,ताल और लय इन तीनों का आधार है। कार्यशाला स्थल पर उपस्थित +2 नेशनल हाई स्कूल के शिक्षक प्रमोद कुमार, चैम्बर ऑफ कॉमर्स के मनोज घोष व अंजनी शरण के साथ सभी पंजीकृत विद्यार्थियों की शत प्रतिशत उपस्थिति  रही। इससे पूर्व दिन गुरुवार को नृत्य एवं संगीत कार्यशाला के चौथे दिन शास्त्रीय संगीत व नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे बच्चों को संगीत के आधार पाठ्यक्रम से आगे विधा विशेष के आयामों से परिचय कराया गया।  तबला प्रशिक्षक  दीपक चक्रवर्ती के अनुसार “भारत ही ऐसा अनोखा देश है जहाँ दो शास्त्रीय संगीत पद्धतियाँ प्रचलन में हैंं। हिन्दुस्तानी व  कर्नाटक संगीत पद्धति।  जो कई मायनों में एक दूसरे से भिन्न हैं। वहीं इनमे कई समानताएं भी हैंं।  पूर्वी व उत्तरी भारत में प्रचलित हिन्दुस्तानी संगीत व्यापक और विविधता पूर्ण है।  ” यह संगीत कार्यशाला दुमका की नयी पीढ़ी को भारत के समृद्ध एवं विविधतापूर्ण संगीत के विरासत से अवगत कराने का एक जरिया है।  कार्यशाला आयोजक झारखंड कला केन्द्र के प्राचार्य  गौरकान्त झा के अनुसार सामवेद में उद्धृत शास्त्रीय संगीत दरसल लोक संगीत का ही परिष्कृत रूप है। कार्यशाला के संदर्भ में शिक्षक मदन कुमार ने कहा कि शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की बुनियादी जानकारी के बिना कोई भी बेहतर गायक या नर्तक नहीं हो सकता। दुमका की नयी पीढ़ियों में शास्त्रीय नृत्य और संगीत के प्रति बढ़ती रुझान पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की।कार्यशाला के आयोजन में नंदन कश्यप,ऋतंभरा आदि की भूमिका सराहनीय है।

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