दुनिया रंग बिरंगी : महानगर में देश विदेश - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 1 जनवरी 2019

दुनिया रंग बिरंगी : महानगर में देश विदेश

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बात तब की थी जब मैं दिल्ली में कुछ समय के लिए पार्टनर विहीन था, मतलब मेरा रूम पार्टनर ऑफिसियल टूर पर था। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर... मैं सिर्फ पटपटगंज,ऑटो,भीड़ वाली सड़क (जिसे मैं सच मायने में नफरत करता था),सड़क किनारे की बिल्डिंग्स और अपने ऑफिस का 8वां मंजिल में उलझा सा था। अकेले कभी तल्लीनता से खाना भी नहीं बना पाया... एक बार माँ ने फोन करके पूछा कि खाना खाये की नहीं, तुम्हारी आवाज कमजोर सी लग रही है.. समझ नहीं आया कि सच कहूं या थोड़ा सच...  आवाज मोटी करके बोला ... हाल-चाल एक नम्बर माँ, अभी सो कर उठा हूँ।  माँ जानती हैं अपने बच्चों के बारे में... तबियत बिगड़ रही थी मेरी... धीरे-धीरे।  मैं अनुभव कर रहा था कि मेरी तबियत बिगड़ने के कारण अनियमित दिनचर्या और खानपान है। आसान नहीं होता है अकेले रहना खासकर वैसे लोगों के लिए जो घर में सबसे छोटे हों। मैं भी घर में छोटा हूँ और स्वावभिक तौर पर मुझे भी घर में कुछ खासी आजादी थी, जैसे जबरदस्ती ज्यादा खाना खिलाना,मेरे  कपड़ों को नियमित रूप से सफाई करना। घर से बाहर ये सब मेरे लिए वास्तव में बहुत कठिन था। 

लेकिन अगर आप अपने-आप को रूम में ही खुद को समेट लेंगे तो फिर तो दिक्कतें होंगी ही... दिल्ली में अब मछली से लेकर साग-सब्जी सब कुछ मिलता है...बथुआ का साग से लेकर और थोड़ा प्रयास करने पर तिलकोर भी मिल जाता है, अरबी से लेकर ओल भी मिल जाता है, एक बार यहां दिल्ली में खुम्हाउर भी देखा था...इंडिया गेट के पास तिलकोर का बहुत पौधा है...दरभंगा से सस्ता मछली दिल्ली में मिल जाता है...230 रुपये जिंदा मछली और दरभंगा में इसके लिए 350 तक देना होता है...प्रत्येक पर्व त्योहार के विधि का सारा सामान उपलब्ध है...

सबसे बड़ी उपलब्धि मुझे तब मिली जब मैंने अपने बिहार की शान सत्तू की लिट्टी लक्ष्मीनगर में देेेखा। विश्वास मानिये मैंने उस दिन दो दिन के खाने का कोटा आधे घंटे में पूरा किया। करीब दर्जन भर डकार आने के बाद टेबल-कुर्सी को "स्वछंदाय नमः" कह कर माफ किया। जब तक दिल्ली में प्रवास रहा, शनिवार और रविवार मेरे लिए "सत्तू डे" रहता था। आज भी किसी मीटिंग के सिलसिले में जाना होता है तो लक्ष्मीनगर के लिए कैब जरूर बुक करता हूँ।  एक बात और ... दिसम्बर में फिर जाना है और सत्तू प्लान पहले से सेट है।  मेहनत तो करना होगा भाई... मल्लब ऑप्शन्स थे बस पता नहीं था मुझे, बिहार से दूर हो कर बिहारी/मैथिल भोजन का पता चल जाना किसी जुपिटर ग्रह पर पानी मिल जाना है...




--राजीव रंजन--

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