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शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

हजारीबाग से हजारों की संख्या में आदिवासी पैदल ही कूच कर रहे हैं रांची की ओर

वन पट्टा पर दिये गये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ पास किया निंदा प्रस्तावआज शनिवार को चैथा दिन रामगढ़ के करीब पहुंचे
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रांची। आज जंगल पर कॉरपोरेट घरानों की नजर है. इसके खिलाफ झारखंडियों में उफान है.इसके आलोक में नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस के बैनर तले हजारों की संख्या में आदिवासी पैदल ही हजारीबाग से रांची की ओर कूच कर रहे हैं. आज शनिवार को यह यात्रा रामगढ़ के करीब पहुंच चुकी है. 27 फरवरी को यात्रा रांची पहुंचेगी। 

अपने पूर्वज बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू के रास्ते पर निकल पड़े हैं आदिवासी 
यहां के आदिवासी अपनी पैतृक संपत्ति सहित जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए सड़क पर उतर आये हैं. राज्य और केंद्र सरकार के रवैये से नाराज आदिवासी फिर बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू के रस्ते पर निकल पड़े हैं. राज्य सरकार द्वारा वर्षों से उनकी मांगों की उपेक्षा होती रही, तो उन्होंने अब सड़कों पर अभियान चलाने का फैसला किया है. हजारीबाग से रांची तक की जा रही पदयात्रा में शामिल होकर हजारों आदिवासी युवाओं, छात्र-छात्राओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने सरकार के नीतियों के खिलाफ उलगुलान का आगाज कर दिया है. पदयात्रा का नेतृत्व ग्रामीण युवा कर रहे हैं. 20 फरवरी को संत कोलंबस कॉलेज ग्राउंड से निकाली गयी पदयात्रा 27 फरवरी को रांची पहुंचेगी. शनिवार को यह यात्रा रामगढ़ के करीब पहुंच चुकी है. यात्रा में ग्रामीण सरकार के विरोध में नगाड़ों की थाप पर आक्रोश भरे नारे लगाते हुए चल रहे हैं.

प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों को सौंपने की तैयारी में है सरकार 
नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस के संस्थापक रहे वीरेंद्र कुमार कहते हैं, “हम जान रहे थे कि 20 फरवरी को उच्च न्यायालय का फैसला आदिवासी और वन क्षेत्र में रहनेवाले समुदायों के विरोध में अयेगा, क्योंकि केंद्र सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों को सौंपने की तैयारी कर रखी है. ऐसे में 20 फरवरी को ही नेशनल अलायंस फॉर पीस एंड जस्टिस के बैनर तले यात्रा का फैसला किया गया. जब सरकार और न्यायालय आदिवासियों की अन्याय से हिफजत नहीं कर सकते, तो मजबूरी में हमें सड़क पर उतरना पड़ा. बड़कागांव में 25 सौ एकड़ फॉरेस्ट लैंड गैरकानूनी ढंग से एनटीपीसी को दे दी गयी है. ग्राम सभा के अधिकारों का राज्य में अनुपालन नहीं हो रहा है. 27 फरवरी को राजभवन के समक्ष प्रदर्शन कर अपनी मांग राज्यपाल को सौंपेंगे.”

सामुदायिक भूमि को रघुवर सरकार ने लैंड बैंक में शामिल कर दिया 
पदयात्रा में शामिल जेवियर मरांडी ने कहा, “वन विभाग द्वारा जब मर्जी होती है, तब ग्रामीणों की झोपड़ी गिरा दी जाती है, घर तोड़ दिये जाते हैं. जिस भूमि पर वर्षों से खेती कर रहे हैं, उस जमीन पर पौधारोपण कर दिया जाता है. इतना ही नहीं, वन विभाग द्वारा कई मामलों में आदिवासियों पर मुकदमा कर उन्हें जेल में भी डाल दिया गया है. सामुदायिक भूमि को रघुवर सरकार ने लैंड बैंक में शामिल कर दिया है. राज्य में भू-अर्जन कानून का अनुपालन सरकार नहीं कर रही है. पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून को सरकार राज्य में लागू नहीं कर रही है. ऐसे में हम विवश होकर संविधान प्रदत्त अधिकारों को पाने के लिए हजारीबाग से रांची तक पदयात्रा पर निकले हैं. साथ ही, वन पट्टा पर दिये गये शीर्ष न्यायालय के फैसले के विरोध में संगठन की ओर से निंदा प्रस्ताव पास किया गया है.” आदिवसी और जल, जंगल, जमीन का रिश्ता खून के रिश्ते से भी ज्यादा गहरा है. अंग्रेजों के जमाने से ही वन संपदाओं पर औपनिवेशिक शासकों के विरोध में झारखंड में समुदाय द्वारा विद्रोह किया जाता रहा है और यह दौर झारखंड अलग राज्य बनने के बाद भी जारी रहा. झारखंड में आदिवासी-मूलवासी समुदाय जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए और समुदाय का अधिकार कायम रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. 

हम अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे 
पदयात्रा में शामिल राजेश कहते हैं, “हम यहां अपने पेड़ों और पर्यावरण की रक्षा के लिए घर से निकले हैं. सरकार ने ढांचागत विकास के नाम पर हमारी जमीन छीन ली है. जिस रफ्तार से वनों की कटाई प्लांट बनाने के लिए की जा रही है, उसने सबकुछ नष्ट कर दिया है. इससे हमारे लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जहां उन्हें अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. हम अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे.” कई अन्य प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि यह कोई राजनीतिक रैली नहीं है.

पदयात्रा में शामिल लोगों की सरकार से ये हैं मांगें
राज्य के उन सभी मामलों को सरकार वापस ले, जो गलत तरीके से आदिवासियों पर दायर किये गये हैं.किसी भी तरह से भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा से अनुमति ली जाये.जनजातीय अधिकारों को सरकार लागू करे.वन अधिकार अधिनियम के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि अधिकार 2006 लागू करने के लिए सरकार अभियान चलाकर छह महीने के भीतर अधिकार दे.गैर-लकड़ी वन उपज का मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाये, ताकि पारंपरिक वन आवास समुदाय ग्राम पंचायत के माध्यम से एनटीएफपी का लाभ उठा सकें और इसका निपटान कर सकें.सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट को सख्ती से लागू किया जाये.सामूहिक भूमि को भूमि बैंक की पकड़ से मुक्त किया जाये. भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 को तुरंत लागू किया जाये.

खाने का सामान साथ लेकर कर हैं पदयात्रा
पदयात्रियों में बड़ी संख्या में शामिल लोग दूरदराज के गांवों से अपने अधिकार की मांग के लिए निकले हैं. वे बेहद गरीब हैं, जिनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. पैदल मार्च के दौरान उनमें से प्रत्येक राशन और बुनियादी खाद्य पदार्थों से भरा बैग लेकर चल रहे हैं. यात्रा के पांच दिन होने के बाद भी सरकार की ओर से  उनकी मांगों पर प्रतिक्रिया नहीं दी गयी है. यात्रा का नेतृत्व वीरेंद्र कुमार, सरोजिनी मरांडी, जेवियर मरांडी, सहदेव राम, फुलमनी तिग्गा, राजू उरांव, करण मिंज जैसे सैकड़ों युवा कर रहे हैं. इनमें से कई लोगों को सत्याग्रह पदयात्रा करने का अनुभव है। जन संगठन एकता परिषद व समान विचारधारा रखने वालों ने जनादेश-2007,जन सत्याग्रह-2012 और जनांदोलन-2018 सत्याग्रह पदयात्रा आयोजित किए थे।

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