बिहार : राज्य स्तरीय भूमि अधिकार एवं भूमि आधारित आजीविका पर संवाद - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 28 मार्च 2019

बिहार : राज्य स्तरीय भूमि अधिकार एवं भूमि आधारित आजीविका पर संवाद

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पटना। लाइवलीहुड पर विशेष फोकस डालने के लिए राज्य स्तरीय भूमि अधिकार एवं भूमि आधारित आजीविका पर संवाद किया गया। वहीं आवासीय भूमिहीनों को न्याय दिलवाने के भूमि अधिकार जन जुटान  और वासभूमि स्वामित्व अधिकार कानून का प्रारूप तैयार कर राजस्व भूमि सुधार विभाग को प्रेषित किया गया। कटिहार जिले के कुर्सेला और समेली प्रखंड के दस-दस गांव का बेसलाइन सर्वे किया गया। इसी के आधार पर लाइवलीहुड पर कार्य किया गया। इससे मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से जन प्रतिनिधियों का ट्रेनिंग,कम्युनिटी मेम्बरों का ट्रेनिंग,सामाजिक सुरक्षा पर ट्रेनिंग,जिला स्तरीय भूमि अधिकार पर संवाद,स्टेट कंसल्टेशन लैंड लाइवीहुड, अर्द्धवार्षिक रिव्यू,जागरूकता कार्यक्रम,एस.एच.जी,स्टाफ क्षमतावर्द्धक प्रषिक्षण आदि योजना बनायी गयी।  पटना में है ए.एन.सिन्हा इंस्टीच्यूट। यहीं पर किया गया था। प्रगति ग्रामीण विकास समिति ने राज्य स्तरीय भूमि अधिकार एवं भूमि आधारित आजीविका पर संवाद किया। बिहार विघापीठ के अध्यक्ष और आई.ए.एस. विजय प्रकाश ने कहा कि सब लोग गरीबों के अधिकार के बारे में बात किया करते हैं। मगर उनको अधिकार दिलवाने में दिलचस्पी नहीं लेते हैं। गरीबों के कार्य को व्यवसायीकरण करने में बदलने की जरूरत है। सदैव गरीब लोग कड़ी मेहनत करते हैं। उसमें कुछ कार्यों में उनका एकाधिकार भी है। उक्त एकाधिकार रूपी कार्य का प्रमाण-पत्र देकर व्यवसायी का गुणगान किया जा सकता है। तब जाकर उक्त कार्य का सम्मान मिलना शुरू हो जाएगा। उसके बाद काम का वाजिब दाम मिलने लगेगा। स्मॉल एनिमल स्मॉल फार्म की शुरू करने की वकालत किए। उनके नेतृत्व में बिहार विघापीठ में मुर्गी पालन हो रहा हैं। तीन लाख रू.लागत से 6 से 7 हजार रू. रोजाना आमदनी हो रहा है।

 आई.जी.एस.एस.एस. के एडविन चाल्र्स, विनय ओहदार, कपिलेश्वर राम, सहाना परवीन, अख्तरी बेगम, सिंधु सिन्हा, अंनिदो बर्नजी, मंजू डू्रगडूंग आदि ने भी विचार व्यक्त किए। भूमि एवं भूमि आधारित आजीविका पर विशेष चर्चा की गयी।  अब  भूमि रहित जीविकोपार्जन पर  ध्यान केंद्रित करने पर बल दिया गया। गैर भूमि पर आजीविका का संचालन करने ध्यान केंद्रित करने पर बल दिया गया। पोल्ट्री फार्म, कपड़े के बैग, पंचबद्री प्रसाद, गुलाब जल, सैनटरी नैपकीन, लेमन ग्रास,पोलिथिन बंद होने पर ठोंगा आदि व्यावसायिक गतिविधियों को अंजाम दे सकता है।पी.जी.वी.एस. को फोरम को खड़ा करने दायित्व मिला है।बिहार भूमि अधिकार जन जुटान  के आयोजकों का मानना है कि एक अनुमान के अनुसार बिहार में 30 लाख परिवारों के पास वासभूमि नहीं है। आवास की वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना गांव और शहरों में सड़क के किनारे ,तटबंध और सरकारी जमीन पर बनी गरीबों की झोपड़ी उजाड़ देना लोकतंत्र और मानवता का क्रूर मजाक है। जन जुटान की पहली मांग है कि बिहार सरकार गांव और शहर के प्रत्येक वासहीन परिवार के लिए ऐसा कानून बनाए जिससे सभी जरूरतमंद घराड़ी की जमीन का हकदार बन सके। इधर नदियों के कटाव से विस्थापन के कारण वास भूमिहीन परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2008 की कुसहा त्रासदी के बाद 2 लाख 36 हजार 632 बर्बाद घरों के बदले सरकार ने लगभग 60 हजार घरों के निर्माण के बाद अपने हाथ खींच लिए। नदियों के कटाव से विस्थापित परिवारों को एक समय सीमा के अन्तर्गत वासभूमि एवं घर देकर पुनर्वासित कराना मांगों में शामिल है। इसमें जन मुक्ति वाहिनी (जसवा), एकता परिषद, दलित अधिकार मंच, लोक समिति, लोक मंच, असंगठित क्षेत्र कामगार संगठन, लोक परिषद, शहरी गरीब विकास संगठन,मुसहर विकास मंच,भूमि सत्याग्रह अभियान, कोशी नवनिर्माण मंच व लोक संघर्ष समिति शामिल हुए। 

बिहार में कितने आवासीय भूमिहीन हैं! वह न सरकार को और न गैर सरकारी जन संगठनों को है। इनलोगों के द्वारा कहा जाता है कि सूबे में 30 से 35 लाख में आवासीय भूमिहीन हैं। इसमें महादलित मुसहर समुदाय की संख्या अधिक है। आवासीय भूमिहीनों के बारे में दलित अधिकार मंच के प्रांतीय संयोजक कपिलेश्वर राम का स्पष्ट कहना है कि हर तीन घर के बाद चैथा घर भूमिहीनों का हैं। यह वास्तव में सत्य है कि आवासीय भूमिहीनों की संख्या में विराम नहीं लग सकता है। भूमि की असमान वितरण के कारण भूमिहीनता चुनौती बन गयी है।  सूबे के मुख्यमंत्री हैं नीतीश कुमार। राज्य के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति,अति पिछड़ी जाति,पिछड़ी जाति का खेतिहर मजदूर हैं। अत्यंत ही कमजोर वर्ग के परिवार के सदस्य हैं। कई दशक से  मजदूरी करते हैं और परिवार के दो जून का आहार संभव कर पाते हैं। हमलोगों के पूर्वज इसी तरह से कई पुश्तों से करते आ रहे हैं। उस लायक नहीं बन सके कि सिर और इज्जत बचाने के लिए जमीन का टुकड़ा ले सकें। हम मानव को जीवन जीने हेतु आज भी भूमि के एक टुकड़े पर मालिकाना अधिकार नहीं है। आवास भूमि पर मालिकाना अधिकार के अभाव में हमलोग सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।सरकार ने वासभूमिहीनों के लिए अभियान बसेरा के नाम से योजना चलाइ्र्र है, परन्तु उक्त अभियान बसेरा वासभूमिहीनों तक धरती पर नहीं उतर पा रही है। हमलोग आज भी आवास हेतु वासभूमि के एक टुकड़े से वंचित हैं। 

वासभूमि स्वामित्व अधिकार कानून बनाने पर जोर
राज्य के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति,अति पिछड़ी जाति,पिछड़ी जाति का खेतिहर मजदूरों का मानना है कि जबतक वासभूमि स्वामित्व अधिकार कानून नहीं बनाया जाएगा तबतक हमलोगों यानी वासभूमि खेतिहर मजदूरों को इज्जत के साथ जीवन यापन के लिए वासभूमि नहीं मिल पाएगी। इस बीच जन संगठनों द्वारा सामूहिक आवेदन तैयार करवाया गया है। इस आवेदन को माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास भेजकर निवेदन किया जाएगा कि हम कमजोर वर्गों को अपमानित जीवन से मुक्ति हेतु वासभूमि स्वामित्व अधिकार कानून को अविलम्ब बनाने की दिशा में कार्रवाई किया जाए। 

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को प्रारूप प्रेषित है 
भूमि अधिकार जन जुटान के संयोजक का  कहना है कि जन संगठन एकता परिषद के राष्ट्रीय जनांदोलन 2018 में सत्याग्रह पदयात्रा के दौरान प्रस्तुत मांगों में राष्ट्रीय आवासीय भूमि अधिकार कानून की घोषणा एवं क्रियान्वयन पर जोर दिया गया था। इधर प्रांत में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को वासभूमि स्वामित्व अधिकार कानून बनाने का प्रारूप प्रेषित है। उन्होंने कहा कि विभाग के अधिकारियों को चाहिए कि जनहित में जन संगठनों को बुलाकर वासभूमि स्वामित्व अधिकार कानून के प्रारूप को अधिनियम का रूप दें दे। 

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