कविता : आत्म-महत्व - Live Aaryaavart

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बुधवार, 17 अप्रैल 2019

कविता : आत्म-महत्व


कविता 

1. ■ तुम ऐसी कैसे हो सकती हो? ■

तुम कल भी
माँ थी किसी की,
किसी की थी बहन, बेटी और पत्नी
और आज भी हो

पूजता आ रहा हूँ मैं तुम्हें
दुर्गा, काली, सीता के रूप में
और आराध्य रही हो तुम
सावित्री, भामती, लक्ष्मीबाई के रूप में भी

तुम भले ही
ना जा सकी
ज्ञान प्राप्त करने किसी वट वृक्ष के नीचे
ना छोड़ सकी
कभी उस मकान को
जिसे तुमने ही घर बनाया
ना त्याग सकी
अपने पति और नवजात शिशु को

मगर यह क्या?
अब तो बदल जायेगा
इसका भी अभिप्राय
तुम्हें भी नहीं दी जायेगी वो संज्ञा
क्योंकि हो ना हो
कहीं ना कहीं इसके लिए दोषी हो तुम स्वंय

अरे शादी हुई थी हमारी
बंध गए थे सात जन्म के लिए एक पवित्र बंधन में
तुम्हारे देखे हुए सारे सपने हो गए थे अब हमारे
और पूरा करना था हमें इसे मिलकर

पढ़ाया भी तुम्हें मैंने
तुमने जहाँ तक पढ़ना चाहा,
बारहवीं से एमबीए तक की पढ़ाई
कहाँ है आजकल इतना सुलभ

ऑफिस से लेकर घर तक
साहब से मेम साहब तक
सबके काम किए मैंने
क्योंकि जुटाने थे मुझे पैसे
सिर्फ तुम्हारे लिए
तुम्हारे फीस के लिए
ताकि तुम हो सको सफल
पूरे हो वो सपने
जिसे देखे थे सिर्फ तुमने

सफल हो गई हो आज तुम
हो गई हो किसी बड़ी मल्टी नेशनल कम्पनी की मालकिन
तो क्या बदल गए रिश्ते ?
तो क्या टूट गया वो सात जन्मों का बंधन ?

अगर नहीं तो
तुम यह कैसे कह सकती हो की
तुम नहीं हो मेरे बराबरी के,
नहीं है तुम्हारी कोई हैसियत

कहीं तुम्हारे कहने का तात्पर्य
यह तो नहीं
की एक चपरासी ने की है कोई बड़ी गलती
अपनी पत्नी को पढ़ा- लिखाकर

खैर जो भी हो
तुम ऐसी कैसे हो सकती हो?

2. ■ आत्म-महत्व ■

मैंने कहा
कोई बात नहीं
वो रहती थी

वो रहती थी
कहाँ और कैसे ?
यह भी महत्व का
विषय नहीं

वो रहती थी
एक सुधि पाठक
जो आपके लिए काफी है

अब कर दें उत्सर्ग
अपनी जिज्ञासा का
हटा लें अपना स्वत्व

सुराग तो मिलने चाहिए आपको
इस रहस्य के बाद
जो अब नहीं है कोई रहस्य

क्या आप स्वंय को
मेरे जैसा ही बुद्धिमान
तो नहीं समझ रहे ?

एक लेखक की शब्दावली में
कोई शब्द नहीं से
अधिक आवश्यक है
आत्म-महत्व
बशर्ते किया गया हो
लेखकीय धर्म का निर्वहन
बिना किसी पूर्वाग्रह के।

3. ■ अब मौसम बदलेगा ■

कैसा होता है
अकेलापन का स्वाद?
कैसे समझा जा सकता है
एकांतवास को?

ओह! देखो ना
मुझे खीच रही है यह जिंदगी
इस शून्य आकाश में
सूर्य के एकांतवास को जानने के लिए
दर्पण के फ्रेम के अंदर
प्रतिबिंब के एकांतवास को जानने के लिए
हार मांस से बने मनुष्य के
शरीर में हृदय का एकांतवास
जानने के लिए

निधोक चला जा रहा हूँ मैं
एक गली की तरफ
हो रही है बर्फ की बारिश
अलग हो रहा है वहाँ से
बहुतेरे छोटी सड़क
मगर यह क्या?
सड़क के बीचोबीच
हर ओर से दर्पण से सजा हुआ
वही भूलभुलैया वाला घर
जिसे अपने बालपन में देखा था किसी सिनेमा में

भूल जायेंगे मेरे पाँव
टहलने के धुन
और नहीं सुन पाऊँगा मैं
इस संकीर्ण नस से
शरीर में रक्त संचरण की बुदबुदाहट

वैसे कोई बात नहीं
मुझे पता है घर वापस जाने का एक और मार्ग
स्मृति दर्पण के माध्यम से

निकला था जो कारवाँ
अब वो कहीं खो गया था
रेगिस्तान के धूल में
जैसे वही उसका ठौर हो
अब एक ऊँट चालक
वाहक है एकांतवास का

कैसा होता है
वियोजन का स्वाद?
अस्पष्ट हो गए हैं सभी अक्षर अब
मन्दिर के बाहर बैठे किसी दिव्यांग की विवशता की तरह
जो चीख़ चीख़ कर बता रहा है कि अब मौसम बदलेगा।

4. ■ स्वर्ग द्वार ■

सारा शहर
हो गया है निःशब्द
जैसे किसी तूफान के आने से पहले
सम्पूर्ण परिवेश ने
साध ली हो कोई चुप्पी

मध्यरात्रि के चादर से
पूरी तरह ढ़क गई अब यह धरती
और मेरे मन के अथाह सागर में
ज्वार भांटा के उथल पुथल को देख
हो रहा है प्रतीत
जैसे आज पुर्णिमा की रात हो

अब आ गया उनका आदेश
जिनको ना तो मना किया जा सकता है और ना ही अनसुना
क्योंकि
यह मध्यरात्रि में मुझे नींद से जगाने का कोई प्रयास नहीं है
जैसा कि तुम करती रही हो आज तक

सुनो ना, अब मैं जाऊंगा
जाने दो मुझे
दिन तो कब का बीत चुका
अब तो चले गए होंगे पशु-पक्षी भी अपने रैनबसेरा में

सम्भव है तुम नहीं समझ सकी होगी
क्योंकि तुम पिछले तीन पहर से ऐसे ही मेरे से लिपटे हुए
एकटक सिर्फ मुझे ही देख रही हो
मगर यह भी सत्य है प्रिय
अब मेरे पास बचे हैं रात के कुछ पहर

मैंने तो काट लिया ईश्वर के बोए हुए सारे फसल
निराशा और मृत्यु इस धरती पर है किसी बन्द कमरे के अंधेरे की तरह
उल्लू की बोली को समझना
कहाँ होता है आसान
मैं तो बस आज तक समझता आया हूँ तुम्हारे मुस्कुराते होंठ और आखँ से गिरते हुए आंसुओं को

कोई बात नहीं
तुम चिंता ना करो
मैं तुम्हारी राह देखूँगा
अब दे दो मुझे अनुमति
तभी मुझे मिल सकती है
प्रेम और भय से मुक्ति
इस स्वर्ग द्वार में प्रवेश के बाद भी।

5. ■ उचित बात ■

किसने कहा तुम्हें?
छोड़ो भी तुम!
अब तुम बन्द कर दो
लल्लो चप्पो में रहना
और सीख जाओ सही को सही
गलत को गलत कहना

मैं कभी नहीं मान सकता
तुम्हें प्रगतिशील
क्योंकि
आज तक तुम कर रहे हो
उस तूफान के थमने का इन्तजार

इसे भी मैं कैसे कह दूँ
उचित?
जब अभी भी तुम्हारी टकटकी
बता रही है
तुम कितने दहशत में हो उस तूफान के भय से

देखो उस वृक्ष को
जो परम्परा को निभाते हुए
आज स्वंय बन गया है एक तूफान
जिसके भय से कांप रहा है धरती और आकाश दोनों

जब कुछ सीखना है
तो देख लो उस पक्षी को
जो बन चुका है आज आधुनिकता का पर्याय
उड़ रहा है तूफान के अंदर भी

रात होने से
भले ही रुक जाए
यह उड़ान
मगर तूफान के भय से रुक जाना
सही नहीं है।

क्योंकि तुम्हे स्थापित करना है एक साम्य
परम्परा, प्रगतिशीलता और
आधुनिकता के मध्य
इसलिए तुम्हे बनना होगा उस बगीचें का फूल
जिससे होकर गुजरा है यह तूफान।




लेखक : पंकज कुमार 
टाटा स्टील लिमिटेड मे विधुत अभियन्ता 
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