विशेष : दास से सरकार को आस - Live Aaryaavart

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शनिवार, 31 अगस्त 2019

विशेष : दास से सरकार को आस

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पूर्व गवर्नर रघुराम राजन पर कभी सरकार की आलोचना करने के आरोप लगे तो कभी कार्यकाल आगे बढ़ने न बढ़ने के अटकलों ने सुर्खियां बटोरी।  फिर उन्होंने अपना कार्यकाल ना बढ़वाने का एलान जिस अंदाज में  किया वो भी पहले किसी ने नहीं किया। अर्थशात्र की नीरस दुनिया में रॉकस्टार इकोनॉमिस्ट कहे जाने वाले राजन का सरकार के साथ मतभेद कई मौकों पर खुलकर सामने आया। आखिरकार उनका कार्यकाल खतम हुआ तो ऊर्जा से भरे पटेल ने रिज़र्व बैंक की कमान संभाली जो राजन के कार्यकाल में  नंबर 2 थे।

24वे गवर्नर के रूप में पटेल साहब ने सितम्बर 2016 में कार्यभार संभाला और दिसंबर 2018 में सरकार के साथ नीतिगत असहमतियों के चलते कार्यकाल खतम होने के पहले ही इस्तीफा दे दिया। हालाँकि पटेल साहब ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने निजी कारणों से इस्तीफा दिया है। केंद्र सरकार से स्वायत्ता को लेकर कोई विवाद नहीं हैं। गौरतलब हो की नोटबंदी के समय पटेल साहब ही रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे और 2000 के नोट में उन्ही के दस्तखत है। पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के करीबी सहयोगी माने जाने वाले पटेल को महंगाई के खिलाफ मोर्चा संभालने वाले राजन के मजबूत सिपाही के तौर पर जाना जाता है। वह समिति के अध्यक्ष भी रहे जिसने थोक मूल्यों की जगह खुदरा मूल्यों को महंगाई का नया मानक बनाए जाने सहित कई अहम बदलाव लाए । पटेल साहब के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री ने उनकी तारीफ में ट्वीट कर कहा, 'डॉ. पटेल मैक्रो-इकोनॉमिक मुद्दों की गहरी और अंतर्दृष्टि समझ रखने के साथ ही एक बहुत ही उच्च क्षमता वाले अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने बैंकिंग प्रणाली को अराजकता से बाहर निकाला। वह अपने पीछे महान विरासत छोड़ रहे हैं। वह बहुत याद आएंगे ।' और इसके बाद जिम्मेदारी संभाली पूर्व वित्त सचिव दास साहब ने। गौरतलब हो कि 8 नवंबर 2016 को घोषित हुई नोटबंदी  के वक्त वित्त सचिव रहे दास ने नोटबंदी  की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई थी। सरकार अपनी महत्वकांक्षी योजनाओं को धरातल पर उतरने के लिए रिज़र्व बैंक की भरपूर मदद चाहती है और इसी उम्मीद में सरकार ने दास जी को गवर्नर बनाया। सरकार की उम्मीदों पर खड़े उतरते हुये रिज़र्व बैंक ब्याज दरों में लगातार कटौती कर भी रहा है।

लेकिन सरकार की नज़र रिज़र्व बैंक की बड़ी तिजोरी पर थी जो मुमकिन होता दिख रहा है। पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अगुआई वाली कमेटी की सिफारिशों को आरबीआई की बोर्ड मीटिंग में स्वीकार कर लिया गया। साथ ही  केंद्र सरकार की लंबे समय से चली आ रही मांग को भारतीय रिजर्व बैंक ने पूरा कर दिया। आरबीआई सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये की ऐतिहासिक सरप्लस राशि देगा। 1.76 लाख करोड़ में 1,23,414 करोड़ रुपये वित्त वर्ष 2018-19 का अधिशेष और 52,637 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान शामिल है। कैश की कमी के कारण मंदी से जूझ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने की नरेंद्र मोदी सरकार हर संभव कोशिश कर रही है। समर्थक इसे अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही उपयोगी और क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं। कई जानकर भी इसके पक्ष में खड़े है। वहीं विरोधी खेमा इसे विनाशकारी कदम बता रहा है। ज्ञात हो रिज़र्व बैंक के अतिरिक्त फण्ड का सरकार को देने के विचार का पूर्व गवर्नर सुब्बाराव और वाईवी रेड्डी खुलकर विरोध कर चुके है। दास से आस लगाए सरकार को रिज़र्व बैंक से और कितनी मदद मिलती है आने वाला समय बताएगा। फिलहाल शेयर बाजार ने इसे सकारात्मक रूप में लिया है।




राजीव सिंह 
स्तम्भकार : "वित्तमन्त्र" के नाम से प्रकाशित होते है। 

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