आलेख : दुनिया देखेगी ‘हिन्दुस्तान’ की ‘आन-बान-शान’ - Live Aaryaavart

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शनिवार, 25 जनवरी 2020

आलेख : दुनिया देखेगी ‘हिन्दुस्तान’ की ‘आन-बान-शान’

गणतंत्र दिवस 26 जनवरी भारत में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। 26 नवंबर 1949 को भारत की संविधान सभा ने औपचारिक रूप से भारत के संविधान को अपनाया था। जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। वर्ष 2020 में भारत का 71 वां गणतंत्र दिवस होगा। इस बार समारोह के मुख्य अतिथि ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो होंगे। खास बात यह है कि देश की नारी शक्ति इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में अपनी जांबाजी दिखाएंगी। सीआरपीएफ की डेयरडेविल्स टीम पहली बार राजपथ पर 26 जनवरी के मौके पर मोटरसाइकिल के जरिए अलग-अलग तरीके के करतब दिखाएगी। भारत के लिए गर्व की बात है उसके सबसे खुश वाले दिन ब्राजील के राष्ट्रपति हिन्दुस्तान की आन-बान-शान से भी बिल्कुल करीब से रु-ब-रु होंगे। इनकी मौजूदगी से दुश्मन देश पाकिस्तान चीन तो सधेगा ही, भारत की आर्थिक सुधारों में एक नई कड़ी जुड़ेगी 
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26 जनवरी का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 26 जनवरी 1929 को अंग्रेजों की गुलामी के विरुद्ध कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास किया था। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, इसका कोई स्थायी संविधान नहीं था। 28 अगस्त 1947 को, डॉ भीम राव अंबेडकर की अगुवाई एक स्थायी संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक मसौदा समिति की नियुक्ति की गई थी। काफी विचार-विमर्श और संशोधन बाद विधानसभा के सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को भारत के संविधान (हिंदी और अंग्रेजी में एक-एक) होने की दो-लिखित प्रतियां पर हस्ताक्षर किए। इसे औपचारिक रूप से 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। इसी दिन भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में शपथ लेकर अपना कार्यकाल शुरू किया। गणतंत्र दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भारत गणतंत्र देश देश बना था। गणतंत्र दिवस के दिन भारत का संविधान लागू हुआ था। जबकि स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत को अंग्रेजी की लंबी गुलामी से आजादी मिली थी। इसलिए हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है।

इस बार 65 सीआरपीएफ की जांबाज कमांडो गणतंत्र दिवस की परेड के बाद राजपथ पर बाइक सवार महिलाएं राइफल पोजीशन, बीम पोजीशन, पिस्टल पोजीशन, पिरामिड पोजीशन सहित संयुक्त मोटरसाइकिल पोजीशन को दिखाएंगी। महिला डेयरडेविल दस्ते का नेतृत्व कर रही सीमा नाग ने बताया कि उनकी इस टीम की स्थापना 2014 में की गई थी। इससे पहले स्टेचू ऑफ यूनिटी की परेड में भी इन लोगों ने इसी तरीके के करतब दिखाए थे। इस बार पहली बार सेना का वायु रक्षा दस्ता, अतुल्य राडार, पैराशूट दस्ता, धनुष 45 कैलिबर आर्टिलरी गन, के9, वज्र टी और सेना के दस्ते की कमान कैप्टन तानिया शेरगिल तथा सिगनल कोर ट्रांसपोर्टेबल सेटेलाइट टर्मिनल व्हीकल की कमान 21 सिगनल ग्रुप की मेजर शीना नायर परेड के मुख्य आकर्षण होंगे। इस बार की परेड में कुल 16 मार्चिंग दस्ते होंगे और इनमें सेना, वायु सेना, नौसेना, अर्द्धसैनिक बलों के अलावा दिल्ली पुलिस और एनसीसी के दस्ते भी हिस्सा लेंगे। इसमें 22 राज्यों की झांकियां भी शामिल की जाएंगी। पैराशूट रेजीमेंट को ‘स्ट्रोम ट्रूपर’ कहा जाता है, जो किसी भी लड़ाई में दुश्मन के बीच अपने खास हथियार से तबाही मचा देते हैं। परेड में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का महिला दस्ता मोटरसाइकिल पर अपने करतब दिखाएगा। वायु सेना का नया अपाचे हमला और चिनूक भारी लिफ्ट हेलीकॉप्टर पहली बार फ्लाई पास्ट में भाग लेंगे। पहली बार परेड में एंटी सैटेलाइट वेपन सिस्टम के साथ कश्मीर और एनडीआरएफ की झांकी भी दिखेगी। 

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संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है। अपने नागरिकों को न्याय, समानता और स्वतंत्रता का आश्वासन देता है। भाईचारे को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। 1950 का मूल संविधान नई दिल्ली के संसद भवन में हीलियम से भरे मामले में संरक्षित है। आपातकाल के दौरान 1976 में प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष“ और “समाजवादी“ शब्द जोड़े गए थे। 1950 में भारत ने लंदन में अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया। लंदन में इंडिया हाउस में, ब्रिटेन में देश के उच्चायुक्त, वीके कृष्ण मेनन ने इस बार भारत के गणतंत्र की ओर से शपथ ली। भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का अंतिम प्रारूप 22 जुलाई 1947 को स्वीकार किया गया। तिरंगे की लंबाई एवं चैड़ाई का अनुपात 3: 2 है। संविधान में पहला संशोधन 1951 में किया गया। लोकसभा में सदस्यों की संख्या 525 से 545 संविधान के 31वॅा संशोधन (1973 ) द्वारा किया गया। 44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर केवल कानूनी या विधिक अधिकार किया गया। भारत के संविधान विधाता कहे जाने वाले बाबा साहेब आंबेडकर की भारत का संविधान बनाने की प्रक्रिया में सबसे बड़ा योगदान रहा है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। भारतीय संविधान लिखने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन का समय लगा था। भारत को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी 15 अगस्त 947 को मिली, लेकिन जब भारत में संविधान लागू किया गया तब भारत एक गणतांत्रिक देश बना। महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, भगत सिंह और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए कड़ी मेहनत की। अब भारत का अपना संविधान है। संविधान का मूल अर्थ है सभी नागरिकों के लिए नियम कानून। जिसका पालन हम सभी को करना चाहिए। 

संविधान की स्वीकृति 26 नवंबर 1949 को हुई जिसके बाद कुछ अनुच्छेद तुरंत लागू कर दिए गए जैसे दृ नागरिकता , निर्वाचन , अंतरिम संसद से संबंधित उपबंध तथा अस्थायी एवं संक्रमणीय उपबंध आदि। संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को सम्पन्न हुई। संविधान निर्माण के लिए लगभग 60 देशों के संविधान का अध्ययन किया गया। मतदाताओं की आयु सीमा 21 से घटाकर 18 संविधान के 61वें संशोधन 1988 में की गई। 86 वॅा संविधान संशोधन 2002 द्वारा शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार में शामिल किया गया। नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक है। नीति निर्देशक तत्व संविधान में शामिल करने की सिफारिश तेजबहादुर सप्रू समिति द्वारा की गई थी। भारतीय संविधान निर्माता बाबा साहब को आज पूरे विश्व मे “सेम्बल ऑफ नॉलेज” के नाम से जाना जाता है। इतना ही नही पूरा संसार लिखित भारतीय संविधान की तारीफ़ करता है। नेल्सन मण्डेला जब भारत आये थे तो उन्होंने कहा था कि अगर भारत से कोई चीज ले जाने लायक है, तो वह है भारत का संविधान। गहराई में जायें तो संविधान से इतर सत्ता की कुछ संरचनाएं है जो आज़ादी से लेकर अब तक पूरे देश के जनमानस में राज कर रही हैं। जनमानस अब भी अपने भविष्य की नियति, इज्ज़त, प्रतिष्ठा, धर्म, जाति, धनबल, बाहुबल आदि के प्रचलित रवैये से प्रभावित होकर निर्धारित करता है। इसलिए जनमानस में पार्टियों को लेकर जुड़ी भावनाएं संविधान से ज्यादा मायने रखने लगी हैं। और संविधान एक ऐसी उपमा बन चुका है, जिसकी दुहाई सब देते हैं लेकिन अपने जीवन और रवैये में लागू कोई नहीं कर रहा। सबसे बड़ी विडंबना तो उनके साथ है जिन्होंने संविधान को समझने की बजाए यह समझा है कि संविधान कुछ अनुच्छेदों, नियमों और उपबधों से सजा दस्तावेज़ है जिसे अपनाने से सरकारें चलती हैं। इसलिए संविधान का मतलब सरकार के रवैये को नियंत्रित करना है न की लोगों के रवैये को नियंत्रित करना। 

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हम अपने गणतंत्र में आज़ाद इसलिए भी नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि हम यह समझना ही नहीं चाहते की संविधान कुछ मूल्यों को हासिल करने के लिए बनाये गये नियमों और अनुच्छेदों का पुलिंदा है। हम यह नहीं समझना चाहते कि हम जिन मूल्यों को अपने भूगोल, लिंग, परिवार, समुदाय, जाति, धर्म, देश और विदेशों से सीखते हैं, संविधान के मूल्य उन सबको नियंत्रित करने का काम करते हैं। इन मूल्यों पर अंकुश लगाने का काम करते हैं। इन मूल्यों को समावेशी बनाने का काम करते हैं। इन मूल्यों से स्वतंत्रता, समानता और न्याय हासिल करने की तरफ बढ़ने का काम करते हैं। हम इंजीनियर, डॉक्टर, आईएएस, न्यायाधीश, नेता आदि के महत्व को पूर्व निर्धारित तांत्रिक अवधारणाओं से आगे निकलकर नहीं सोच पाते और न ही समझा पाते हैं शिक्षा के महत्व को। हमें शिक्षा आज़ाद करने की बजाए तंत्र का आदमी बना देती है, इस प्रवृत्ति से हमें बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है। नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए को लेकर गृहमंत्री अमित शाह ने यह कहकर एक बार फिर अपनी सरकार के अडिग इरादे जाहिर किए कि कोई कितना भी विरोध कर ले, यह कानून वापस नहीं होगा। 

निःसंदेह संसद से पारित और अधिसूचित कोई कानून इस आधार पर वापस होना भी नहीं चाहिए कि कुछ लोग उसकी मनमानी व्याख्या कर उसका विरोध कर रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं कि जिस कानून का किसी भारतीय नागरिक से कोई लेना-देना ही नहीं, उसे लेकर आम लोगों और खासकर मुस्लिम समुदाय को बरगलाया जा रहा है। इसके लिए उस एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का हवाला दिया जा रहा है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री भी स्पष्ट कर चुके हैं कि फिलहाल वह सरकार के एजेंडे में नहीं है। इस स्पष्टीकरण के बाद विपक्ष ने यह अभियान छेड़ दिया कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर ही एनआरसी है। विपक्ष के ऐसे ही दुष्प्रचार की काट के लिए सत्तापक्ष को सीएए के समर्थन में अभियान छेड़ना पड़ा है। ऐसे में सीएए के विरोध में सड़कों पर उतरने वालों को यह समझ आना ही चाहिए कि वे व्यर्थ की कसरत कर रहे हैं। सीएए के निर्माण के पीछे भी एक विशेष पृष्ठभूमि है। यदि इस कानून के जरिए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को राहत दी गई है तो इसके न्यायसंगत आधार हैं। समझना कठिन है कि जो यह मांग कर रहे कि इस कानून में पाकिस्तान के प्रताड़ित बहुसंख्यक भी शामिल किए जाने चाहिए, वे ऐसी कोई तार्किक मांग उठाने में क्यों कतरा रहे हैं कि इस पड़ोसी देश में इराक के कुर्दिस्तान सरीखे किसी सुरक्षित ठिकाने का निर्माण किया जाना चाहिए?

26 जनवरी को प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली गणतंत्र दिवस परेड, राजपथ से शुरू होती है और दिल्ली में लाल किले पर समाप्त होती है। भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में, सशस्त्र बल स्वतंत्रता सेनानियों और प्रख्यात हस्तियों को डायस पर सलाम करते हुए मार्च करते हैं। नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस के जश्न का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है घोड़ा-मार्च। राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) और चयनित स्काउट लड़के इस आयोजन का हिस्सा हैं। परेड में क्षेत्रीय नृत्य, देशभक्ति गीत और सैन्य बाइक शो के साथ पीछा किया जाता है। भारत के गणतंत्र दिवस पर, हर साल झंडा फहराने की रस्म के दौरान राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। जब कोई विदेशी राज्य प्रमुख या सरकार का प्रमुख भारत का दौरा करता है, तो राष्ट्रपति भवन में एक औपचारिक स्वागत समारोह आयोजित किया जाता है। और राज्य के प्रमुख को 21-बंदूक की सलामी दी जाती है, 19-बंदूक की सलामी के साथ सरकार के एक विदेशी प्रमुख को दिया जाता है। ’बीटिंग द रिट्रीट’ एक ऐसे राष्‍ट्रीय गर्व की घटना के रूप में आयोजित की जाती है जब रंगों और वर्णों की परेड की जाती है। यह समारोह 1950 की शुरूआत में आरंभ किया गया था जब भारतीय सेना के मेजर रॉबट्र्स ने सामूहिक बैंड के प्रदर्शन का एक अनोखा समारोह स्‍वदेशी रूप से आरंभ किया। ’बीटिंग द रिट्रीट’ शताब्दियों पुरानी सैन्‍य परम्‍परा का प्रतीक है जब सेनाएं युद्ध समाप्‍त करके लौटती थी और युद्ध के मैदान से वापस आने के बाद अपने अस्‍त्र शस्‍त्र उतार कर रखती थीं और सूर्यास्‍त के समय अपने शिविर में लौट आती थीं। इस समय झण्‍डे नीचे उतार दिए जाते थे। यह समारोह उस बीते समय की याद दिलाता है।



--सुरेश गांधी--

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