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बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

विचार : *जन अधिकार पर तोहमत क्यों?*

विचार : *जन अधिकार पर तोहमत क्यों?*
दिल्ली चुनाव परिणाम न अप्रत्याशित है न इवीएम  की कारगुजारी है।न यह मुफ्तखोरी का मामला है और न ही यह शाहिनबागजैसे धरनों की कोख से उपजा केंद्र सरकार के विरूद्ध का यह आक्रोश है। ,यह विशुद्ध भारतीय लोकतंत्र की जीत है।जिसे दिल्ली के परिपक्कव मतदाताओं ने कर दिखाया।लोकतंत्र में जनता के सभी परमावश्यक आवश्यकताओ की ही नही, बल्कि उनके विलासिता सम्बन्धी इच्छाओ को भी पूर्ति करनी होती है। ऐसी जनमानस बनने पर हम, उनकी विलासिता सम्बन्धित आवश्यकताओ पर,लोकतंत्र का कठोर डंडे नही,अपितु उन्हें उसी व्यवस्था में जागरूक कर,उनको दाइत्व का बोध कराना यह एक जननायक का लोकतांत्रिक दायित्व होता है।.जब हम चुनकर आते है, तो अपने लिए खुद अनेक सुख-सुविधाओं का द्वार खोल, महाराजा की तरह जीवन जीते तब हम मुफ्तखोर नही हुए और जब हम जनता के लिए कुछ देते है तो उन्हें हम मुफ्तखोर कैसे कह सकते? वास्तव में लोकतंत्र में हम जो शपथ लेते क्या निभाते है? ठीक ही कहा गया है-

           शलभ बन जलना सरल है, स्नेह की जलती शिखा पर, 
           स्वयं को तिल तिल जलाकर,दीप बनना ही कठिन है, 
               शपथ लेना तो सरल है पर निभाना ही कठिन है।
                    
वास्तव में लोकतंत्र में वही जनता हमे चुनकर भेजती है, जनविकास के लिए, किन्तु होता ठीक इसका विपरीत झुग्गी में जीने वाला विधायक या संसद महज पांच सालों में अकूत सम्पति का मालिक (कुछ ही लोकतंत्र को बचाए भी है) बन जाता?किन्तु हम जनता के लिए हमारी बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य की भी उपलब्धता नही करवा पाते? दिल्ली की आप सरकार के द्वारा किये गये कार्यों को और दिल्ली के नागरिकों को सरकार द्वारा दिए गये कुछ राहतों को मुफ्तखोरी का लेवल देना जनता का अपमान और लोकतंत्र को कलंकित करना है।यह मुफ्तखोरी नही जनमानस का अधिकार है।सोचिये कभी यही दिल्ली भाजपा की तो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी आज वहां के नागरिक आप को पसंद कर रही। फिर इसे यह कहना की कुछ ने वोटो का जाति,मत,पंथ के आधार पर समाज को बांटा इसलिए हार या जीत गये यह लोकतंत्र के उपर गहरा आरोप है।जब अंगूर नही मिलते तो अंग्रुर खट्टे है की भावना में जीने वाला समूह है ऐसे बात कह लोकतंत्र की जड़े कमजोर कर संविधान के प्रति उंगली उठाता है। लोकतंत्र पर ऐसे अविश्वासी लोगो को यह संस्मरण ध्यान करना चाहिए की जब महाराजा रणजीत सिंह अपने विजय अभियान में थे तो उन्होंने  सेना को आक्रमण करने का आदेश दिया।सेना आगे बढ़ चली, आगे अटक नदी थी, नदी में भीषण बाढ़ आई हुई थी, सेना रुक गइ, सेनापति एक दूसरे का मुंह देखने लगे, अब क्या होगा,जब यह बात महारजा रणजीत सिंह को पता चला, वह घोड़े पर सवार होकर सबसे आगे बढ़ चले और अपनी सेना को कहा- 

सबै भूमि गोपाल की, या में अटक कहां ? जा के मन में अटक है, वह ही अटक रहा ।।

इतना कहकर महाराजा ने अपना घोड़ा अटक नदी में उतार दिया, फिर क्या था, सैनिकों का मोहभंग हो गया, उनमें उत्साह और साहस की लहर दौड़ गई ,जो अटक की बाढ़ से भी अधिक उत्तेजक थी,और सबने नदी पार क्र विजय प्राप्त किया.उस समय महाराजा भी उस अटक नदी की बाढ़ को कारण मान अपना विजय रोक लेते? दिल्ली चुनाव के हारे लोग आरोप लगाने के वजाय स्वीकार करे की अरविन्द केजरीवाल में महाराजा रणजीत सिंह की तरह अपने लोकतांत्रिक सेनाओं में आत्मविश्वास भरने की माद्दा थी।इसलिए उन्होंने विजय प्राप्त किया। आपमें नही थी, इसलिए आपको हार मिली।
                   
जिस सेना के हौसले टूट जाते हैं, उत्साह भंग हो जाता है, वह तो मानो स्वयं ही हार गई। वह तो युद्ध क्षेत्र में जाने से पूर्व ही पिट गई,यही हाल आज देश में है।.केंद्र की सरकार को भारत की जनता चक्रवर्ती सम्राट के रूप में स्वीकार करती है।इसमें आज भी संशय नही है। आज भी देश में उनके प्रति वही गहरी आस्था है।किन्तु राज्यों को भी उसी चक्रवर्ती सम्राट के नाम पर शाशन करने वाले घनानन्दों को जनता सिरे से ख़ारिज कर रही क्योंकि जब-जब घनानंद जैसे लोग सत्ता पर काबिज होते तो चाणक्य जैसे लोग उसे सत्ताच्युत करने से परहेज नही करते है।दिल्ली ही नही इसके पूर्व भाजपा ने जो जो राज्य से जनविश्वास खोया,उस राज्यों की जन मानस आज भी केंद्र सरकार के प्रति सम्मोहित है।कुछ लोग तो इतने कोमल और नाजुक होते हैं कि यदि उनका उत्साह टूट जाए तो अपने को बस में नहीं रख सकते। उन्हें अपने उपर विश्वास नही होता और ठीकरा जनता पर फोड़ते है।जनता सामप्रदाईक है,मुफ्तखोर है ऐसे लांछन लगाते है। कई बार व्यक्ति परिश्रम  तो कर रहा होता है परंतु उसे उसका अभीष्ट फल नहीं प्राप्त होता है , इस पर आश्चर्य करता है, किंतु इसमें आश्चर्य करने की कोई बात ही नहीं है, क्योंकि वह जिस वस्तु को प्राप्त करना चाहता है ।परिश्रम उससे उल्टा कर रहा होता क्योंकि जिन कार्यकर्ता के सहारे पूर्व विजय मिली उन्हें अपमानित करने,उन्हें उपेक्षित करने में हम कोई कसर नही छोड़ते ।जिस तुष्टिकरण का हम विरोध करते सत्ताप्राप्त कर उसे संवैधानिक चोला पहना देते ऐसी स्थिति में उसे मनचाहा फल कैसे प्राप्त हो सकता है। हमे स्मरण रखना चाहिए की कोई भी सफलता के लिए हमारे मन में या हमारे कार्यकर्ताओं के मन मे यदि नकारात्मकता है तो यही हमारे सफलता का वाधक है। हम कर्म में नही सीधे फल की आकंक्षा के लिए अब उत्साहित रहते है.हमें स्मरण रखना चाहिये हम लोकतंत्र में जी रहे जहां अतिवाद प्रतिबंधित होती है।सरकार जनसेवक होती है उसे जनआस्था का ख्याल रखना होता है।जनता के कर से ही कार्यों का निष्पादन होता है जो कुछ सरकार जनता को अर्पित करती यह उनका अधिकार है उनपर उनका हक है।इसी अधिकार और हक को आप मुफ्तखोरी कैसे कह सकते हो।
                  
दिल्ली के कुल ७० सीटों के चुनाव में आप को ६२ वही भाजपा को ०८ सिट मिले। सबसे पुरानी और सबसे अधिक समयों तक सत्ता सुख भोगने वाली कांग्रेस को तो दिल्ली की जनता ने एक सिट भी देना मुनासिब नही समझा?अभी पिछले वर्ष लोकसभा के हुए चुनाव में भाजपा को उसी दिल्ली में ५६% कांग्रेस को २२.५% जबकि आप पार्टी को महज १८.१%ही वोट मिला था ।विधान सभा के इस चुनाव में आप को ५३.५७% वोट मिला।अगर विधान सभा के २०१५ और २०२० के चुनावों की तुलना करे तो लोगो ने आप के वोट प्रतिशत को गिराया है। २०१५ के चुनाव में आप को कुल ५४.३४%मत मिले जबकि २०२० के चुनाव में ५३.५७% यानी ०.७७% की गिरावट आई ,वही भाजपा को २०१५ में ३२.१९%वोट मिले जबकि २०२० के चुनाव में उसे ३८.५१%यानी ६.३७%का वोटो में इजाफा हुआ।जबकि कांग्रेस को दिल्ली के लोगो ने जहाँ २०१५ में ९.६५%वोट मिले वही इस बार उसे महज ४.२६% यानी ५.३९%कम मत मिला। सन्देश स्पष्ट है की लोकतंत्र में परिवारवाद का कोई जगह नही है . असफलता का भूत मनुष्य के भीतर की सारी शक्तियों  को खींच लेता है।शक्ति खो देने पर व्यक्ति असमर्थ हो जाता है।किसी ने ठीक ही कहा है-" बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को देर तक छाती से चिपकाए रहती है"। जो लोग पुरानी दुखदाई स्मृतियों को उसी तरह छाती से चिपकाए रहते हैं, वे लोकतंत्र की दौड़ में पिछड़ जाते हैं ।यदि कोई मनुष्य अपने जीवन में सर्वोत्तम लोकतांत्रिक कार्य करना औऱ उसमे सर्वश्रेष्ठ फल प्राप्त करना चाहता है तो उसे चाहिए अपने मन से ही उन सभी बातों को निकाल फेंके  जो उसके मन को गड़बड़ा देती है औऱ अपने जमीनी कार्यकर्ता और हितचिंतकों व विचारसमुहो को जीवनदायी औषधि समझ अपने साथ रखे।दिल्ली का संदेश एक बार फिर अपनी गलती को सुधारने की सीख हमे देती ना कि अपनी खीझ जनता पर उतारने की।
                      
जैसे हमारा मन वैसा ही लोकतंत्र बनता है ।लोकतंत्र में हार,निराशा और चिंता भी देती है।निराशा और चिंता भय की भावना पैदा करती है।ऐसे भय के माहौल में भी यदि कोई मनुष्य किसी भी संकट पूर्ण स्थिति में शांतिपूर्वक उसके विषय में सोच सकता है तो वह उस स्थिति से सुरक्षित ही बाहर आ सकता है ।शांति और संयम से सोचने की शक्ति तत्काल ही नहीं आ सकता, बल्कि वह लगातार आत्मा संयुक्त अभ्यास करने से आती है।जो व्यक्ति वास्तव में विशाल ह्रदय के लोकतांत्रिक एवं संतुलित होते हैं उन्हें जरा सी बातें संताप नहीं देती। चाहे परिस्थितियां कितनी प्रतिकूल हो, वातावरण में कितना ही विरोध हो ,जीवन की स्थिति कितनी ही कठिनाइयों से भरी हो, हमे यह नही भूलना चाहिए कि सर्वशक्तिमान ईश्वर की संतान होने के साथ साथ हमसब  बहुत महान, बहुत विराट, बहुत विशाल,बहुत ऊंचे मानदंडों पर जीनेवाले महान पूर्वजों की संतान है। हमारी संस्कृति किसी पर तोहमत लगाने की नही सेवा करने की रही है।सेवा भी निःस्वार्थ भाव से करने की अपनी परम्परा रही है।दिल्ली के महान नागरीकों ने अपने स्वर्णिम भविष्य को ध्यान में रखकर अपना मत का प्रयोग किया न कि किसी लोभ, लालच,छलप्रपंच में।एक सफल लोकतंत्र कभी भी तोहमत पर नही सेवा पर पर मज़बूत होती है ।सेवा का यह भाव दिल्ली की आप सरकार ने स्थापित किया तभी वहां के नागरिकों ने उनपर अपना विश्वास पुनः दिखाया।आपके पास समय है अपनी सेवा वो भाव प्रस्तुत करें जनता अवश्य आपको भी गले लगाएगी क्योंकि-

      "लक्ष्य तक पहुंचे बिना पथ में पथिक विश्राम कैसा? लक्ष्य है अति दूर,दुर्गम मार्ग भी, हम जानते हैं
       किंतु पथ के कंटको को हम सुमन ही मानते हैं , जब प्रगति का नाम जीवन,यह अकाल विराम कैसा ?



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--संजय कुमार आज़ाद--
मेल : azad4sk@gmail.com
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