बिहार : अपने नागरिकों को अवैध मानने वाली सरकार ही अवैध है : दीपंकर भट्टाचार्य - Live Aaryaavart

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शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

बिहार : अपने नागरिकों को अवैध मानने वाली सरकार ही अवैध है : दीपंकर भट्टाचार्य

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पटना (आर्यावर्त संवाददाता) आज पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर के मुक्ताकाश मंच में भाकपा-माले व इंसाफ मंच की ओर से सीएए, एनआरसी व एनपीआर के खिलाफ बिहार विधानसभा से प्रस्ताव पारित करवाने की मांग पर आयोजित जनसम्मेलन में बोलते हुए माले महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि अपने नागरिकों को अवैध मानने वाली सरकार ही अवैध है और सबसे पहले उसे अपनी गद्दी छोड़नी चाहिए. ये काले कानून न केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं बल्कि गरीबों, मजदूरों, किसानों व देश की व्यापक जनता के खिलाफ है. अब समय आ गया है कि सीएए-एनआरसी-एनपीआर के जाल और बेरोजगारी-आर्थिक मंदी-संसाधनों के निजीकरण के खिलाफ हमें व्यापक लड़ाई छेड़ देनी है. देश के गांव-कस्बों को शाहीन बाग बना देना है और भाजपा-आरएसएस के झूठ का पर्दाफाश करना है. उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि एनआरसी के बदनाम होने के बाद एनपीआर की चर्चा हो रही है. लेकिन हम किसी मुगालते में नहीं हैं. दरअसल असम के अनुभव के बाद सरकार अब नया खेल खेल रही है. सब लोगों की नागरिकता पर सवाल उठाने की बजाए अब वह एनपीआर में कुछ लोगों को चिन्हित करेगी और उसे डाउटफुल सिटिजन की सूची में डालेगी. जाहिर सी बात है कि इसकी मार और किसी पर नहीं बल्कि दलितों-गरीबों, मजदूर-किसानों, अल्पसंख्यकों और भाजपा के राजनीतिक विरोधियों पर पड़ेगी. नीतीश जी एनपीआर पर झूठ बोल रहे हैं. यदि उन्हें उससे आपत्ति थी तो फिर इसको लागू करने का नोटिफिकेशन क्यों जारी किया? हम केरल व अन्य राज्यों की तर्ज पर बिहार विधानसभा से सीएए-एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव पास करने की मांग करते हैं. उन्होंने आह्वान करते हुए कहा कि 25 फरवरी को हजारों की संख्या में पटना पहुंचकर इसके लिए सरकार को मजबूर कर दीजिए. उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा-आरएसएस के लोग यह प्रचारित कर रहे हैं कि यह आंदोलन तो मुसलमानों का है, यह आंदेालन तो शहरों का है. यह भी झूठ फैला रहे हैं कि हिन्दुओं को डरने की क्या जरूरत है? लेकिन सीएए के तहत मात्र 31313 लोगों को नागरिकता मिलेगी, लेकिन अकेले असम में बिहार के 56 हजार प्रवासी मजदूरों की नागरिकता खत्म कर दी गई. यदि पूरे देश मंे यह लागू हुआ तो करोड़ों लोग नागरिकताविहीन हो जायेंगे. और असम का अनुभव बताता है कि इसकी जद में क्या हिंदु क्या मुसलमान सब के सब आयेंगे. तो फिर यह कानून नागरिकता देने वाला कानून कैसे हुआ? यह गणित अमित शाह को समझाना होगा. भूगोल भी समझाना होगा कि बंगाल, बिहार, झारखंड, यूपी इन तमाम राज्यों के गरीबों का जीवन संकट में पड़ जाएगा, नागरिकता खोने वाले लोग कैसे साबित करेंगे कि वे देश के बाहर से आए हैं. माले महासचिव के संबोधन के पूर्व माले व इंसाफ मंच तथा पटना शहर के कई जाने-माने बुद्धिजीवियों ने भी जनएकता सम्मेलन को संबोधित किया. सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अजमल ने अपने संबोधन में कहा कि भाकपा-माले से बिहार की जनता को यही उम्मीद है. इन काले कानूनों के खिलाफ व्यापक एकता का निर्माण आज हम सबकी आवश्यकता है. गांव से लेकर शहर तक सभी वर्ग, धर्म व जाति के लोगों को मिलकर यह लड़ाई लड़नी होगी तभी हम देश, अपनी नागरिकता व संविधान बचा सकते हैं. उनके अलावा जनएकता सम्मेलन को पीयूसीएल के सरफराज ने भी संबोधित किया. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यह एक लंबी लड़ाई है, लेकिन इसे लड़ना है और जीतना है. सम्मेलन को संबोधित करने वालों में ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, खेग्रामस के महासचिव धीरेन्द्र झा, इनौस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज मंजिल, आइसा के राष्ट्रीय महासचिव संदीप सौरभ, आइसा के राज्य अध्यक्ष मोख्तार, इंसाफ मंच के कयामुद्दीन अंसारी, माले की केंद्रीय कमिटी के सदस्य राजू यादव, विधायक सुदामा प्रसाद, इंसाफ मंच के आफताब आलम, समनपुरा सत्याग्रह के प्रतिनिधि हारूण साहब, हारूण नगर फुलवारीशरीफ के शहनवाज कैसर, खगौल सत्याग्रह के फरहत जहां व आदम परवेज आदि ने संबोधित किया.  मौके पर कोरस के लोगों ने नागरिकता कानून के खिलाफ बने नाटक का मंचन किया. हिरावल के कलाकारों ने फैज की नज्म प्रस्तुत किया. जनसम्मेलन में नागरिकता संशोधन कानून व एनआरसी व एनपीआर के खिलाफ जगह-जगह पोस्टर लगाए गए थे और शहीदों को श्रद्धांजलि दी. सम्मेलन में माले राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो स्वेदश भट्टाचार्य, कार्तिक पाल, राजाराम सिंह, शशि यादव, रामेश्वर प्रसाद आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन इंसाफ मंच के सूरज कुमार सिंह ने की.

राजनीतिक प्रस्ताव
1. नीतीश सरकार एनपीआर को लेकर लगातार अगर-मगर की भाषा बोल रही है, जबकि हम सभी जानते हैं कि एनपीआर और कुछ नहीं बल्कि एनआरसी ही है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिहार में इसे लागू करने का नोटिपिफकेशन भी जारी कर दिया गया है. आज का सम्मेलन बिहार विधनसभा के आगामी सत्रा में सीएए व एनपीआर के खिलापफ प्रस्ताव पारित करवाने तथा इसे संपूर्णता में खारिज करने की मांग करता है ताकि एनपीआर को लेकर किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे. उपरोक्त मांगों पर साथ ही, भाकपा-माले द्वारा 25 पफरवरी को आहूत विधनसभा मार्च को ऐतिहासिक बनाने की अपील करता है.
2. सीएए-एनपीआर व एनआरसी के खिलापफ आज पूरे देश में छात्रा-नौजवानों-महिलाओं व समाज के अन्य तबकों का व्यापक जनउभार दिख रहा है. आम भारतवासियों की एकता और जुझारू जोश आज संविधन की रक्षा में सबसे बड़ी ताकत बन गई है. दिल्ली के शाहीनबाग की तर्ज पर आज पूरे देश में सैंकड़ों ध्रना व लगातार प्रदर्शनों का दौर चल पड़ा है. मोदी के पफासीवादी शासन के खिलापफ संविधन व लोकतंत्रा की रक्षा में इस ऐतिहासिक जन उभार का यह सम्मेलन जोरदार स्वागत करता है तथा इसे और व्यापक बनाने का आह्वान करता है.
3. शाहीनबाग के ऐतिहासिक आंदोलन पर सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं द्वारा गैरसंवैधनिक व उकसावे मूलक बयानों के जरिए लगातार हमला किया जा रहा है. इसके जरिए देश में विभाजन व नपफरत पफैलाने की कोशिशें हो रही हंै. यह सम्मेलन भाजपा-आरएसएस के इन खतरनाक विचारों के खिलापफ दृढ़ता से मुकाबला करने का आह्वान करता है. सम्मेलन संविधन विरोध्ी, महिला विरोध्ी व उकसावे मूलक वक्तव्यों की कड़ी निंदा करते हुए सुप्रीम कोर्ट से मांग करता है कि इन मामलों में वह स्वतः संज्ञान लेकर संविधान व लोकतंत्रा की रक्षा की गारंटी करे.
4. संविधन और अपने अध्किारों की रक्षा की लड़ाई लड़ने वालों को कहीं पुलिस दमन झेलना पड़ रहा है तो कहीं संघी गुंडों का हमला. विगत 30 जनवरी को पुलिस की उपस्थिति में दिल्ली में गुंडों द्वारा जामिया के छात्रों पर खुलेआम पफायरिंग,  जेएनयू में घुसकर नकाबपोश गुंडों द्वारा छात्रों की बर्बर पिटाई तथा यूपी से लेकर बिहार तक जनता के प्रतिवादों पर बर्बर दमन और पुलिस एवं संघी गुडों द्वारा मिलकर आतंक का राज कायम करने के प्रयास जारी हैं. पटना के पफुलवारी में प्रदर्शन के बीच से खींचकर अमीर हंजला की हत्या कर दी गई और औरंगाबाद में पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी. यह सम्मेलन प्रतिवाद आंदोलनों पर पुलिस-संघी गुंडों के हमलों पर तत्काल रोक लगाने, उन्हें दंडित करने तथा आंदोलकारियों पर से सभी प्रकार के पफर्जी मुकदमे वापस लेने की मांग करता है.
5. असम में एनआरसी की सूची से  तकरीबन 56 हजार प्रवासी बिहारी मजदूर बाहर रह गए. यह सम्मेलन उनकी नागरिकता छिन जाने की भत्र्सना करता है और सरकार से मांग करता है कि उनके जरूरी कागजात तत्काल असम सरकार को भेजने और उनकी नागरिकता बचाने की गारंटी करे.
6. बिहार में जल-जीवन-हरियाली योजना के नाम पर लाखों दलित-गरीबों को वास-आवास से उजाड़ने की नोटिस थमा दी गई है. इस सम्मेलन के जरिए हम बिहार सरकार से मांग करते हैं कि इस गरीब विरोध्ी योजना को तत्काल वापस ले और सभी भूमिहीनों के आवास की गारंटी करे. 

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