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रविवार, 12 अप्रैल 2020

दरभंगा : 'स्वच्छता का समाजशास्त्र' लनामिवि का था अनिवार्य कोर्स : बिनोद चौधरी

छात्रों को स्वच्छता का सही अर्थ, विषय वस्तु, महत्त्व, परिवारिक स्वच्छता, समाजिक स्वच्छता, सुलभ आंदोलन, पर्यावरण सहित "स्वच्छ भारत अभियान" जैसे महत्वपूर्ण अध्याय की पढ़ाई होती रही है जिसकी सार्थकता आज कोरोना से लड़ाई में साबित हो रही है
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दरभंगा (आर्यावर्त संवाददाता) आज जब पूरे विश्व में कोरोना संक्रमण अपने शिखर पर पहुंच चुका है तो विकसित देशों से लेकर विकासशील देशों के पास इसके रोकथाम के लिए मात्र लॉकडाउन ही एक उपाय बचा है। जबकि स्वच्छता पर समान रूप से बल दिया जाना उचित होगा और इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में अनिवार्य पत्र के रूप में 'स्वच्छता का समाजशास्त्र' की पढ़ाई होती थी जिसे बाद में वैकल्पिक पत्र के रूप में कोर्स में शामिल कर दिया गया। "स्वच्छता का समाजशास्त्र" पत्र में छात्रों को स्वच्छता का सही अर्थ, विषय वस्तु, महत्त्व, परिवारिक स्वच्छता, समाजिक स्वच्छता, सुलभ आंदोलन, पर्यावरण सहित "स्वच्छ भारत अभियान" जैसे महत्वपूर्ण अध्याय की पढ़ाई होती रही है। इन सब बातों के ज्ञान से हमारे छात्र स्वच्छता के ब्राण्ड एम्बेसडर बन सकते हैं। आज आवश्यक है सभी विश्वविद्यालयों में अनिवार्य विषय के रूप में स्वच्छता का समाजशास्त्र की पढ़ाई हो। स्वच्छता का आंदोलन एक अभियान के रूप में अपने देश - राज्य में 70 के दशक से शुरू हुआ था जिसके प्रणेता पदम भूषण डॉ बिंदेश्वर पाठक रहे। डॉ० पाठक ने भंगी मुक्ति आंदोलन एवं सुलभ शौचालय के निर्माण को एक साथ चलाना चाहा जिसमें उन्हें अपनी ही उच्च जाति के लोगों का भारी विरोध का सामना करना पड़ा।उन्होंने जातिवादी व्यवस्था को चुनौती दी तकनीकों का नवीनीकरण किया एवं चेतना का विस्तार किया तथा महात्मा गांधी के विभिन्न आंदोलनों से प्रेरणा लेकर एवं बिहार के बेतिया शहर में दलितों की बस्ती में रहकर डॉ० पाठक ने अपने आंदोलन को विस्तार दिया। देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले के प्राचीर से स्वच्छता एवं शौचालय से जुड़े मुद्दों को पूरी ताकत से उठाया तो यह एक सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया। इस क्रम में डॉ० बिंदेश्वर पाठक को श्री मोदी ने स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया। डॉ बिंदेश्वर पाठक ने हमेशा से ही शारीरिक स्वच्छता पर बल दिया और वर्तमान परिपेक्ष में शारीरिक सफाई सहित घर एवं आसपास की सफाई स्वच्छता पर अधिक बल देना कोरोना वायरस को हमारा खुद जवाब होगा। डॉ० पाठक के अनुसार 1965 के आसपास सिंगापुर में बहुत अधिक संख्या में लोग लगातार बीमार रहते थे जिस कारण उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ी रहती थी लेकिन जब ली कुआन यू  सिंगापुर के पी०एम० बने तो उन्होंने स्वच्छता को एक मिशन बनाया और लोगों ने उनका साथ भी दिया परिणाम हुआ लोग स्वस्थ रहने लगे और साथ ही 1990 तक वहां की अर्थव्यवस्था $12000 प्रति वर्ष पहुंच गई। सुलभ इंटरनेशनल के कार्यों को देखते हुए न्यूयॉर्क शहर के मेयर ने 14 अप्रैल 2016 को डॉक्टर पाठक के नाम पर समर्पित किया। 90 के दशक में पदम भूषण एवं 2 वर्ष पूर्व गांधी शांति पुरस्कार मिलने के बाद आज भी डॉ० पाठक देश-विदेश में अपने आंदोलन के विस्तार में लगे हैं। अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि आज के युवा वर्ग को डॉ० पाठक के सुलभ स्वच्छता आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए कोरोना वायरस पर जोरदार प्रहार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में भारत में लॉकडॉउन सहित शारिरिक एवं समाजिक स्वच्छता पर अधिक बल देकर कोरोना पर पूरा प्रहार करना होगा।

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