भारत का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वालों में ब्रिटिश प्रवासी लेखक दिव्या माथुर - Live Aaryaavart

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

भारत का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त करने वालों में ब्रिटिश प्रवासी लेखक दिव्या माथुर

writer-divya-mathurभारत के केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हिंदी सेवी सम्मान की स्थापना 1989 में की थी। उन्होंने घोषणा की है कि दिव्या माथुर को उनके लेखन और प्रवासी महिला लेखकों को बढ़ावा देने के लिए पद्मभूषण मोटुरी सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवन दिया जाता है।  2003 में इंग्लैंड की आर्ट्स-काउंसिल द्वारा उन्हें 'कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान और नवाचार' के लिए सम्मानित किया जा चुका है। इसी वर्ष में उन्हें रॉयल सोसाइटी ऑफ़ के आर्ट्स की फ़ेलो के रूप में भी नामित किया गया था। बहु-पुरस्कार विजेता लेखिका, सुश्री माथुर, वातायन: पोएट्री ऑन साउथ बैंक की संस्थापक हैं।   सुश्री माथुर ने इस इस विशिष्ट सम्मान पर आभार व्यक्त करते हुए कहा, "मैं बहुत खुश हूं। मुझे लग रहा है कि जैसे  ब्रिटेन में भारतीय साहित्य के क्षेत्र में मेरे योगदान को अब भारत में भी मान्यता मिल गई है।" दिल्ली में पली-बढ़ी, सुश्री माथुर 1985 में ब्रिटेन आईं और 7 साल तक उन्होंने भारतीय-उच्चायोग में काम किया। 1992 में नेहरू सेंटर की स्थापना करने वाली टीम में शामिल होने के लिए उन्हें तत्कालीन मंत्री श्री गोपालकृष्ण गांधी द्वारा चुना गया। उनके एक उपन्यास, छ: कहानी संग्रह, सात कविता संग्रह प्रकाशित हैं; उन्होंने बच्चों के साहित्य के अनुवाद के अलावा आधा दर्जन से अधिक कहानियों और कविताओं के प्रकाशित संग्रहों का संपादन किया है। उनकी पुस्तकों पर एक दर्जन से अधिक पीएचडी लिखी जा चुकी हैं। इनका नाम प्रेरणादायक महिला, विकिपीडिया, एशियन हूज़ हू और कई अंतर्राष्ट्रीय संग्रहों के संस्करणों में शामिल हैं। 71 वर्षीय लेखिका ने कहा: "जब विदेशों में लोग अपनी मूल भाषाओं में लिखते हैं तो वे न सिर्फ उस भाषा की संस्कृति और साहित्य को उस देश में बढ़ावा देते हैं, जिस देश से वे दूर रहते हैं, बल्कि मेज़बान देश की विविधता को भी समृद्ध करते हैं। यह साहित्य उन लोगों तक भी पहुंचता है जो विदेश में रहते हैं किन्तु अंग्रेजी नहीं बोलते; उन्हें भी अपने अपनाए हुए देश की विविध साहित्यिक परंपराओं को समझने और उनकी सराहना करने का अवसर मिलता है।”

कोई टिप्पणी नहीं:

Loading...