नारद जयंती : लोक कल्याण के सजग अनुरागी देवर्षि नारद - Live Aaryaavart

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शनिवार, 9 मई 2020

नारद जयंती : लोक कल्याण के सजग अनुरागी देवर्षि नारद

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ब्रह्म की अविरल भक्ति के मुख्य आचार्य हैं देवर्षि नारद। वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। उनके कंठ से उत्पन्न हुए हैं। वीणा वादन और संगीत की शिक्षा भी उन्होंने ब्रह्मा जी से ही प्राप्त की है। वे धर्म, कर्म और ज्ञान के सबसे बड़े उपदेशक हैं। दुनिया में घटित होने वाली हर खबरों से वाकिफ रहते हैं। परम निर्मल हैं। सहज हैं, सरल हैं और मार्गदर्शन के लिए सतत तत्पर रहने वाले  संत  तो हैं ही लेकिन संसार में ईश्वर की भक्ति का माहौल बना रहे, भक्ति के मार्ग में कोई बाधा न आए, इस दिशा में सतत सचेष्ट रहते हैं। इसके लिए वे निरंतर योजना बनाते रहते हैं। नारद का अर्थ तो कई तरह से बताया गया है। 'नार' का अर्थ है आवाज और द का अर्थ है देना। नारद जी लोककल्याण के लिए हमेशा आवाज उठाते रहते हैं। अनीति, अत्याचार और अधर्म को समाप्त करने की न केवल रणनीति बनाते है अपितु उसे अमली जामा भी पहनाते हैं। कुछ विद्वान तो यहां तक कहते हैं कि नारद वह है जिसकी योजना कभी रद न हो। उन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है। वे अकारण कुछ भी नहीं बोलते। तभी तो कहा जाता है कि 'वृथा न होंहि देव रिसि बानी।' उनके शाप के चलते ही इस धरा धाम पर रामावतार हुआ। उनके शाप के कारण भगवान राम को धरती पर सीता का वियोग झेलना पड़ा। वह नारद ही थे जिसकी वजह से भगवान शिव को हनुमान के रूप में अवतरित होना पड़ा। वह नारद ही थे जिनके शाप से शंभुगणों को राक्षस रूप में अवतरित होना पड़ा और उन्हें मारने के लिए बार—बार भगवान विष्णु को अवतार ग्रहण करना पड़ा। वह नारद ही थे जिनकी वजह से राम और हनुमान का युद्ध हुआ। काशी नरेश की खतरे में पड़ी जान अगर राम के हाथों बची बची तो नारद की ही वजह से। उन्होंने ही काशी नरेश को अंजनी की शरण में जाने की सलाह दी थी। वह नारद ही थे जिसकी वजह से गुरु दत्तात्रेय के प्रथम शिष्य योगी आदित्यनाथ को त्रिया राज्य में जाना और रानी मैनाकिनी से विवाह करना पड़ा था। द्वापर में हनुमान और श्रीकृष्ण की प्रथम मुलाकात कराने वाले भी देवर्षि नारद ही थे।

नारद जी को भगवान विष्णु का तीसरा अवतार कहा जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का मन कहा गया है। वे भगवान के मनावतार हैं। उनके अनुराग तो भगवान के गुणानुवाद हैं और इस सुख की प्राप्ति के लिए ही तो वे बिना रुके—बिना थके लोक—लोकांतर, दिग्दिगांतर तक की अनवरत यात्रा करते हैं। भक्ति और आदर्श, सिद्धांत और निष्ठा उनके लिए सर्वापरि है। इसलिए तो वीणा वादन करते, हरिगुण गाते, नारायण—नारायण करते वे सभी लोकों का भ्रमण करते रहते हैं। दूसरों पर परम अनुग्रह करने की आकांक्षा ही उनका स्वभाव है। उनके दर्शन मात्र से जीव जगत के जन्म—जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और वह सहज मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। उनकी वजह से संसार में कई बड़े युद्ध भी हुए लेकिन उसका मूल भाव लोक मंगल ही था। इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। संसार में धर्म के सबसे बड़े प्रतिष्ठापक देवर्षि नारद ही हैं। नारद परिव्राजकोपनिषद में उन्होंने यह बताया है कि परिव्राजक संन्यासियों की आचार संहिता क्या होनी चाहिए? उनके कर्तव्य क्या होने चाहिए? नौ खंड वाले इस उपनिषद में जो कुछ भी कहा गया है, उसे उपदेश की संज्ञा दी गई है।देवर्षि नारद परिव्राजकों के सर्वश्रेष्ठ आदर्श हैं। उनके उपदेश ही परिव्राजकों के आचरण हैं। शौनकादि ऋषियों को उन्होंने ने केवल वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान दिया बल्कि उन्हें संन्यास विधि से भी परिचित कराया। उन्हें बताया कि संन्यास का सच्चा अधिकारी कौन है? संन्यास धर्म के पालन का महत्व क्या है? उसकी शास्त्रीय विधि क्या है? संन्यासी के भेद कौन—कौन से हैं? तुरीयातीत पद की प्राप्ति के उपाय क्या हैं? संन्यासी की जीवनचर्या कैसी होनी चाहिए। किन —किन नियमोपयम का उन्हें पालन करना चाहिए। उन्होंने 'अहं ब्रह्मास्मि' कहकर उन्हें ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराया। नारद जी जितने बड़े धर्माचार्य थे। चारों वेदों, इतिहास, पुराण, नृत्य, संगीत आदि विद्याओं के जितने बड़े ज्ञाता थे, उतने ही बड़े जिज्ञासु भी थे। अपनी इसी जिज्ञासा के समाधान के लिए उन्होंने सनत्कुमार से ब्रह्म विषयक प्रश्न किया था। तब सनत्ककुमार ने उन्हें'प्राण' के सत्य स्वरूप का ज्ञान कराया था। सनत्कुमार ने देवर्षि नारद कहा था कि अब तक आपने जो ज्ञान प्राप्त किया है, वह सब तो ब्रह्म का नाम भर है। नाम के ऊपर वाणी है। वाणी से बड़ा संकल्प है। संकल्प के ऊपर चित्त है। चित्त से ऊपर ध्यान है। ध्यान से बड़ा विज्ञान है क्योंकि विज्ञान का ज्ञान होने पर ही हम सत्य-असत्य का पता लगाकर लाभदायक वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। विज्ञान से श्रेष्ठ बल है और बल से भी श्रेष्ठ अन्न है। अन्न से भी श्रेष्ठ जल है। जल से भी श्रेष्ठ तेज है। तेज से  अहम आकाश है। आकाश से श्रेष्ठ स्मरण है। स्मरण से श्रेष्ठ आशा और आशा से श्रेष्ठ प्राण है। अगर प्राण ही नहीं है, तो जीवन भी नहीं है। अत: यह प्राण ही सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म है। सो नारद, अभी तो बहुत समझना शेष है, शब्द सीख कर तो धरातल पर ही रह जायेंगे, शब्द के पीछे का संसार निःशब्द है, अनन्त, असीम, उसे समझो। नारद जी नतमस्तक हो गए।
   
इसमें संदेह नहीं कि  नारदजी त्रिकालदर्शी हैं। वेदांतप्रिय, योगनिष्ठ, संगीत शास्त्री, औषधियों के ज्ञाता, शास्त्रों के आचार्य और भक्ति रस के प्रमुख हैं। देवर्षि नारद श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष और योग जैसे कई शास्‍त्रों के प्रकांड विद्वान हैं। 'नारद भक्ति सूत्र' , बृहन्नारदीय उपपुराण-संहिता- (स्मृतिग्रंथ), नारद-परिव्राजकोपनिषद और नारदीय-शिक्षा उनके महान ग्रंथ हैं। जो आज भी संसार में धर्म और संस्कृति की अलख जगाए हुए हैं।  सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। नारद भक्ति सूत्र में कहा गया है कि'गुणरहितं काम रहितं प्रतिक्षणं वर्धमानयविच्छन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्।' भगवद् भक्ति मत छोड़ो। चाहे तुम दिखावे के लिए ही कर रहे हो, क्योंकि एक न एक दिन भगवान  तुम्हें स्वयं अपना लेंगे। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के 26  श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है कि 'देवर्षीणाम् च नारद:।' अर्थात  देवर्षियों में मैं नारद हूं। श्रीमद्भागवत महापुराण का कथन है कि नारद जी मुनियों के देवता थे। वायुपुराण में कहा गया है कि देवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाले ऋषिगण देवर्षि कहे जाते हैं। धर्म के पुत्र नर एवं नारायण, क्रतु के पुत्र बालखिल्य ऋषि, पुलह के पुत्र कर्दम, पुलस्त्य के पुत्र कुबेर, प्रत्यूष के पुत्र अचल, कश्यप के पुत्र नारद और पर्वत देवर्षि माने गए, किंतु जनसाधारण देवर्षि के रूप में केवल नारद जी को ही जानता है। उनकी जैसी प्रसिद्धि किसी और को नहीं मिली। महाभारत के सभापर्व में कहा गया है कि देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापंडित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानों की शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योग बल से समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ हैं। वे सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले, देवताओं-दैत्यों को वैराग्य के उपदेशक, क‌र्त्तव्य-अक‌र्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं।
  
नारदपुराण में लगभग 750 श्लोक ज्योतिषशास्त्र पर हैं। इनमें ज्योतिष के तीनों स्कन्ध-सिद्धांत, होरा और संहिता की सर्वांगीण विवेचना की गई है। नारदसंहिता के नाम से उपलब्ध इनके एक अन्य ग्रन्थ में भी ज्योतिषशास्त्र के सभी विषयों का सुविस्तृत वर्णन मिलता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि देवर्षि नारद भक्ति के साथ-साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। वे अष्ट चिरंजीवियों में एक हैं। देवर्षि नारद की प्रेरणा से ही इस देश को रामायणम और श्रीमद्भागवत जैसे ग्रंथ मिले। उन्होंने ही वेदव्यास और बाल्मीकि को ऐसा करने की प्रेरणा दी। वह त्रिकालदर्शी हैं और वेदों का संपादन करने वाले हैं। ऋग्वेद के मंडल के ऋषि हैं।  प्राणिमात्र के कल्याण की भावना रखने वाले देवर्षि नारद ईश्वरीय मार्ग पर अग्रसर होने की इच्छा रखने वाले प्राणियों को सहयोग प्रदान करते हैं। उनका चयन भगवान विष्णु के कई कार्य पूर्ण करने के लिए किया गया। देवर्षि नारद, वनवास में पांडवों के साथ थे। उन्होंने ही धर्मराज युधिष्ठिर को धर्म व सत्य का मार्ग दिखाया। नारद जी ने भगवान ब्रह्मा द्वारा बताए गए सृष्टि के कार्यों में हिस्सा लेने से मना कर दिया, तब क्रोधित होकर भगवान ब्रह्मा ने उन्हें जीवन पर्यंत अविवाहित रहने का श्राप दिया था। अकारण शाप मिलने से नारदजी दुखी हुए और अपने पिता से प्रार्थना की और कहा कि ‘तेजस्वी पुत्र को शाप देना कैसे उचित है?’ फिर भी इतनी कृपा ब्रह्मा उन पर अवश्य करें कि ‘जिस भी योनि में मेरा जन्म हो, वहां भगवान की भक्ति मुझे कभी न छोड़े। इसके बाद नारदजी ने भी अपने पिता ब्रह्मा को शाप दिया कि तीन कल्पों तक किसी भी लोक में उनकी पूजा नहीं होगी और आपके मन्त्र, स्त्रोत, कवच आदि का लोप हो जाएगा। अन्याय और अतिचार बर्दाश्त करना कभी भी उनके स्वभाव का हिस्सा नहीं रहा।
    
राजा दक्ष के 10 हजार पुत्रों को देवर्षि नारद ने मोक्ष का पाठ पढ़ा दिया, जिससे उनका मन मोह-माया से दूर हो गया। इससे क्रोधित होकर राजा दक्ष ने नारद जी को श्राप दिया कि वह हमेशा इधर-उधर भटकते रहेंगे। तब से आज तक नारद जी चौदहों भुवनों में विचरण करते रहते हैं। महाभारत के शान्तिपर्व में नारदजी द्वारा शुकदेवजी को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दिया गया है। बाद में इसे ही नारद गीता के नाम से जाना गया।  बालक प्रहलाद की भक्ति के पीछे नारद मुनि द्वारा उत्पन्न किया गया आत्मविश्वास ही था। बालक ध्रुव जब सौतेली माता के कटु वचन से आहत होकर वन जा रहे थे, तब उन्हें नारद जी ने ही ‘वासुदेव मन्त्र’ दिया। अनुसूया के सतीत्व को त्रैलोक्य में ख्याति दिलाने वाले देवर्षि नारद ही थे। दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा के पुत्र रूप में अनुसूया अगर पा सकीं तो इसके मूल में नारद ही थे। अगर उन्होंने माता लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती से अनुसूया के सतीत्व की प्रशंसा न की होती तो ब्रह्मा, विष्णु और शिव को पालने का सुख उन्हें कैसे मिलता?
   
वह नारद ही थे जिससे कंस को भविष्यवाणी के बारे में अष्टदलकमल के जरिये बताया था कि जिस तरह हर कमल दल पहला है, उसी तरह देवकी का हर बच्चा पहला है और हर बच्चा आखिरी है। भगवान विष्णु ने उनसे कहा था कि जब कंस के पापों का धड़ा भर जाएगा तब मैं धरती पर अवतार लूंगा। वह घड़ा जल्दी भरे, इसके लिए उन्होंने कंस को इस तरह समझाया था। शंखचूड़ और जालंधर का वध भी भगवान शिव ने नारद जी की प्रेरणा से ही किया था। आसुरी और दैवी शक्तियों के बीच के संघर्ष को देखने का एक मौका भी वे कभी नहीं गंवाते । वे दैत्यों, मनुष्यों और देवताओं को समान भाव से उपदेश देते हैं। इसलिए सर्वत्र उन्हें सम्मान मिलता है। उन्होंने त्रेता में अगर भगवान राम को उपदेश दिया तो द्वापर में श्रीकृष्ण को। युधिष्ठिर को तो उन्होंने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, राजनीति, अर्थ नीति, समाजनीति और परिवार नीति का ज्ञान दिया। नारद जी आदि पत्रकार हैं। वे हर घटनास का सूक्ष्म विवेचन करते हैं और कब किस सूचना को कितनी मात्रा में किसे देनी है, इसका विचार करने के बाद ही वे उसका प्रचार—प्रसार करते हैं। राजतंत्र और प्रजातंत्र में शासक औरजनता के कर्तव्याकर्तव्य का जितना सुंदर भाष्य नारद जी ने किया है, वैसा कोई भी नहीं कर पाया। इसीलिए नारद जी जगद्वंद्य हैं। वे विश्वमानवता की अनमोल थाती हैं। उनके स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में शुचिता का भाव पैदा होता है।    




 -सियाराम पांडेय 'शांत'-

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