बिहार : भोजन का अधिकार अभियान के द्वारा 1 जूनको राष्ट्रीय शोक दिवस मनाने का निश्चय - Live Aaryaavart

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रविवार, 31 मई 2020

बिहार : भोजन का अधिकार अभियान के द्वारा 1 जूनको राष्ट्रीय शोक दिवस मनाने का निश्चय

राजनीतिक दलों की तरह ही गैर सरकारी संगठनों के द्वारा सरकार को आरोपित करने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है। एक संवाददाता सम्मेलन में कहा गया कि वैश्विक कोरोना काल में सरकार की उपेक्षा से ही 22 मई तक देश भर में 667 मौते हुई है। जिनका प्रत्यक्ष कारण कोविड-19 संक्रमण नहीं है, बल्कि सड़क दुर्घटना 205, भूख और लाॅकडाउन से 114 मौते हुई है.....
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पटना (आलोक कुमार) भोजन का अधिकार अभियान के द्वारा 1 जून को राष्ट्र्ीय शोक दिवस मनाने का निश्चय किया है। इसे सत्याग्रह का रूप दिया गया है। सत्याग्रह सुबह 9 बजे से 11 बजे तक ही चलेगा। इस बीच 2 मिनट का मौन धारण भी किया गया है। यह कहा गया है कि लाॅकडाउन के दौरान कोरोना बीमारी से हुई मौत, भूख से हुई मौत, प्रवासी मजदूरों, महिलाओं, बच्चों, बीमारों की मौत दुखद है। यह बताया गया कि छोटे-छोटे समूह में सुरक्षित दूरी का ध्यान रखते हुए काली पट्टी बांध कर अपनी सहानुभूति दर्ज करें। यह कार्यक्रम जिला, प्रखंड, पंचायत, खेत-खलिहान, चैराहा, गली, सड़क, घर, मनरेगा कार्यस्थल, जन वितरण राशन दुकान,एफसीआई गोदाम आदि स्थानों पर कर सकते हैं। इसके दूसरे दिन 2 जून से 7 जून तक सरकार से जवाब दो-जवाबदेही लो दिवस चलाया जाएगा। सबको राशन, सबको पेंशन। सबको काम, सबको पोषण का नारा बुलंद करेंगे। बता दें कि भोजन का अधिकार का भारत के पूरब के राज्यों बिहार,झारखंड,उड़ीसा और छतीसगढ़ के प्रतिनिधियों द्वारा वर्चुअल प्रेस संवाददाता सम्मेलन में कहा गया कि लाॅकडाउन के दौरान सरकार के उपेक्षा के कारण कोरोना बीमारी से हुई मौत, भूख, प्रवासी मजदूरों की हुई मौत मजदूरों, महिलाओं, बच्चों, बीमारों की मौत से दुखद है। अभियान इसकी तीव्र निंदा करती है। सरकार द्वारा कोविड-19 के संक्रमण के रोकथाम के नाम पर आनन-फानन में देशव्यापी लाॅकडाउन किया गया। बिना किसी पूर्व तैयारी के लिए किए गए लाॅकडाउन के कारण देश भर में अफरा-तफरी का माहौल बना। सरकार द्वारा कई हफ्तों तक अनिर्णय की स्थिति बनी रही, मानव संसाधन और समुचित दिशानिर्देश के अभाव में आम लोग, बच्चे , बूढ़े, मजदूर,छात्र, गर्भवती महिलाएं,छोटे बच्चों वाली माताएं, बीमार, विकलांग आदि अपने संसाधनों से किसी तरह घर पहुंचने के लिए सड़कों पर निकल गए। इनके लिए संसाधनों व सुविधाओं और राहत की व्यवस्था की जगह उनके साथ अमानवीय बर्ताव किया गया। स्थानीय प्रशासन व पुलिस द्वारा लगातार मजदूरों के साथ मारपीट, आधे रास्ते से वापस भेजने, मजदूरों का सामूहिक सेनीटाइज (सभी मजदूरों को हानिकारक केमिकल से नहलाना)  आदि किया गया। सरकार की अमानवीय रवैये से 22 मई तक देश भर में 667 मौते हुयी जिनका कारण कोविड-19 संक्रमण नहीं है बल्कि सड़क दुर्घटना 205, भूख और लाॅकडाउन से 114 मौते हुई। इसके अलावा पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में आए चक्रवात ने दोहरा कहर बरसाया है। इन परिस्थितियों में केन्द्रीय सरकार का रवैया ढुलमुल और संवेदहीन है।

बिहार श्रमशक्ति का लगभग 96 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र के कारगर है। अप्रत्याशित लाॅकडाउन की स्थिति में मजदूरों की स्थिति में मजदूरों की दैनिक आर्थिक गतिविधियों के अभाव में उनकी स्थिति चरमरा गई। रोज कमाने वाले लोगों तथा उनके आश्रितों के भोजन पर आफत हो गया, बच्चे, बूढ़ों,महिलाएं भूख के साथ जीने के लिए मजबूर हुए और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार लोगों की भूख से मौतें भी हुई। उदाहरण के लिए मुजफ्फरपुर स्टेशन  में महिला की मौत, सूरत से सीवान आने वाली मजदूर स्पेशल ट्र्ेन में 7 लोगों ; बच्चे,जवान महिलाओंद्ध की भूख की मौत सबके सामने है। बिहार सरकार के एक आंकड़े के अनुसार लगभग 17 लाख प्रवासी मजदूर देश के अलग-अलग शहरों में फंसे हुए थे। एक वरीय अधिकारी के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत मजदूरों को 25 मई तक अपने प्रदेश वापस बुला लिया जाएगा। परंतु लगभग 65 दिन के लाॅकडाउन के बाद मजदूरों के वापस बुलाया गया है। इस दौरान हजारों की संख्या में मजदूर पैदल,रिक्शा व ठेला से, आॅटो आदि से स्वयं घर आए। इस दौरान घर आने वाले मजदूरों को स्थानीय स्कूलों में क्वारंटाइन किया गया। परन्तु विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अधिकांश क्वारंटाइन केन्द्रों में बुनियादी सुविधाएं नहीं होने की वजह से वहां 14 दिनों तक रह पाना मुश्किल है। मजदूरों को जिस कवायद से लागया जा रहा है वह बहुत ही अमानवीय है। मजदूरों से भाड़े लिए जा रहे हैं। या दो दिनों की यात्रा में 9 से 16 दिनों तक लग रहे हैं। ट्र्ेनों का परिचालन भी बेहद गैरजिम्मेदाराना है। कई ट्र्ेनें अपने गतंव्य से भटक कर हजारों किलोमीटर दूर दूसरे राज्य पहुंच गए। बलिया जाने वाली ट्र्ेन गुजरात पहुंच गए। मजदूरों के वापस घर आने के बाद सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये होगी की इन मजदूरों के उनके घरों में भोजन, स्वास्थ्य अन्य जरूरतों की पूर्ति कैसे की जाएगी। इन मजदूरों के आजीविका की व्यवस्था करना एक महत्वपूर्ण चुनौती होगा। कोविड-19 के संक्रमण का जिस प्रकार से प्रचार किया गया उसका खौफ सामुदायिक स्तर पर लोगों में भेदभाव को बढ़ाएगा। जिसका परिणाम समाज और समुदाय पर लंबी अवधि तक रहेगा। विभिन्न क्षेत्रों से कई ऐसी घटनाओं की खबर आ रही है जिसमें समुदाय अथवा परिवार के सदस्य अपने परिजनों के साथ भेदभाव किया गया। भारत सरकार द्वारा राहत पैकेज के नाम पर घोषित 20 लाख करोड़ रूपये की घोषणा की गई है। वित्तमंत्री द्वारा 4 दिनों तक इस पर प्रेस काॅन्फ्रेंस किया गया। पूरे राशि की अगर माइक्रो विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि इस राशि में असंगठित क्षेत्र के कामगारों को कोई राहत नहीं मिल पाएगा।

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