विशेष : बेल्जियम से कामिल बुल्के भारत आकर भारतीय हो गए - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 18 अगस्त 2020

विशेष : बेल्जियम से कामिल बुल्के भारत आकर भारतीय हो गए

  • उनके कान भी खराब हो गए थे.वह श्रवण यंत्र लगाने लगे थे.अंतिम दिनों में उन्हें गैंग्रीन हो गया. यहां मांडर और पटना के कुर्जी अस्पताल में इलाज के बाद उन्हें दिल्ली ले जाया गया, जहां 17 अगस्त 1982 को प्रातः साढ़े आठ बजे वह चिर-निद्रा में सो गए.दिल्ली के निकाॅलासन कब्रिस्तान में दूसरे दिन वह दफन हो गए.आज इनकी पूण्य तिथि है...
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रांची . फादर कामिल बुल्के (अंग्रेजी: Father Kamil Bulcke) (1 सितंबर 1909 – 17 अगस्त 1982) बेल्जियम से भारत आये एक मिशनरी थे.भारत आकर मृत्युपर्यंत हिंदी, तुलसी और वाल्मीकि के भक्त रहे. इन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1974 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. पदम् भूषण फ़ादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के फलैण्डर्स प्रांत के रम्सकपैले नामक गाँव में एक सितंबर 1909 को हुआ.लूवेन विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज में बुल्के ने वर्ष 1928 में दाखिला लिया. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने संन्यासी (जेसुइट समाज) बनने की ठानी. इंजीनियरिंग की दो वर्ष की पढ़ाई पूरी कर वे वर्ष 1930 में गेन्त के नजदीक ड्रॉदंग्न नगर के जेसुइट धर्मसंघ में दाखिल हो गए. जहाँ दो वर्ष रहने के बाद आगे की धर्म शिक्षा के लिए हॉलैंड के वाल्केनबर्ग के जेसुइट केंद्र में भेज दिए गए. यहाँ रहकर उन्होंने लैटिन, जर्मन और ग्रीक आदि भाषाओं के साथ-साथ ईसाई धर्म और दर्शन का गहरा अध्ययन किया.वाल्केनबर्ग से वर्ष 1934 में जब बुल्के लूवेन की सेमिनरी में वापस लौटे तब उन्होंने देश में रहकर धर्म सेवा करने के बजाय भारत जाने की अपनी इच्छा जताई.


वर्ष 1935 में वे भारत पहुँचे जहाँ पर उनकी जीवनयात्रा का एक नया दौर शुरू हुआ. शुरूआत में उन्होंने दार्जिलिंग के संत जोसेफ कॉलेज और गुमला के एक मिशनरी स्कूल में विज्ञान विषय के शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया.उन्होंने एक जगह लिखा है, "मातृभाषा प्रेम का संस्कार लेकर मैं वर्ष 1935 में राँची पहुँचा और मुझे यह देखकर दुख हुआ कि भारत में न केवल अंग्रेजों का राज है बल्कि अंग्रेजी का भी बोलबाला है.मेरे देश की भाँति उत्तर भारत का मध्यवर्ग भी अपनी मातृभाषा की अपेक्षा एक विदेशी भाषा को अधिक महत्व देता है. इसके प्रतिक्रिया स्वरूप मैंने हिंदी पंडित बनने का निश्चय किया." विदेशी मूल के ऐसे कई अध्येता हुए हैं जिन्हें इंडोलॉजिस्ट या भारतीय विद्याविद् कहा जाता है. उन्होंने भारतीय भाषा, समाज और संस्कृति को अपने नजरिए से देखा-परखा. लेकिन इन विद्वानों की दृष्टि ज्यादातर औपनिवेशिक रही है और इस वजह से कई बार वे ईमानदारी से भारतीय भाषा, समाज और संस्कृति का अध्ययन करने में चूक गए.बुल्के ने भारतीय साहित्य और संस्कृति को उसकी संपूर्णता में देखा और विश्लेषित किया. लेकिन कुछ ही दिनों में उन्होंने महसूस किया कि जैसे बेल्जियम में मातृभाषा फ्लेमिश की उपेक्षा और फ्रेंच का वर्चस्व था, वैसी ही स्थिति भारत में थी जहाँ हिंदी की उपेक्षा और अंग्रेजी का वर्चस्व था.वर्ष 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने हिंदी साहित्य में एमए किया और फिर वहीं से 1949 में रामकथा के विकास विषय पर पीएचडी किया जो बाद में ‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ किताब के रूप में चर्चित हुई. मेरे कॉलेज सेंट जेवियर्स कॉलेज रांची के हिंदी विभाग में वर्ष 1950 में उनकी नियुक्ति विभागाध्यक्ष पद पर हुई. इसी वर्ष उन्होंने भारत की नागरिकता ली. फ़ादर कामिल बुल्के एक ऐसे विद्वान थे जो भारतीय संस्कृति और हिंदी से जीवन भर प्यार करते रहे, एक विदेशी होकर नहीं बल्कि एक भारतीय होकर. बेल्जियम में जन्मे बुल्के की कर्मस्थली मेरी जन्मस्थान  और कॉलेज राँची में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर इस हफ़्ते विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर हिंदी के इस साधक को याद किया जाता है हमारे कॉलेज सेंट जेवियर्स कॉलेज रांची में बुल्के ने वर्षों तक हिंदी का अध्यापन किया. रामकथा के महत्व को लेकर बुल्के ने वर्षों शोध किया और देश-विदेश में रामकथा के प्रसार पर प्रामाणिक तथ्य जुटाए. उन्होंने पूरी दुनिया में रामायण के क़रीब 300 रूपों की पहचान की.रामकथा पर विधिवत पहला शोध कार्य बुल्के ने ही किया है जो अपने आप में हिंदी शोध के क्षेत्र में एक मानक है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी कहते हैं, "फ़ादर कामिल बुल्के और मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक डॉक्टर माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में अपना शोध कार्य पूरा किया था. मैंने उनमें हिंदी के प्रति हिंदी वालों से कहीं ज्यादा गहरा प्रेम  देखा. ऐसा प्रेम जो भारतीय जड़ों से जुड़ कर ही संभव है. उन्होंने रामकथा और रामचरित मानस को बौद्धिक जीवन दिया."बुल्के ने हिंदी प्रेम के कारण अपनी पीएचडी थीसिस हिंदी में ही लिखी. जिस समय वे इलाहाबाद में शोध कर रहे थे उस समय देश में सभी विषयों की थीसिस अंग्रेजी में ही लिखी जाती थी. उन्होंने जब हिंदी में थीसिस लिखने की अनुमति माँगी तो विश्वविद्यालय ने अपने शोध संबंधी नियमों में बदलाव लाकर उनकी बात मान ली. उसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी हिंदी में थीसिस लिखी जाने लगी. 1950 में संत जेवियर्स महाविद्यालय, राँची में इन्हें हिन्दी एवं संस्कृत विभाग का विभागाध्यक्ष बनाया गया.इसी वर्ष इन्हें भारत की नागरिकता भी मिली तथा इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य भी नियुक्त हुए.सन् 1972 से 1977 तक भारत सरकार की केन्द्रीय हिन्दी समिति के सदस्य रहे.वर्ष 1973 में इन्हें बेल्जियम की राॅयल अकादमी की भी सदस्यता मिली. फादर कामिल बुल्के के तार्किक वैज्ञानिकता पर आधारित शोध संकलन ‘रामकथा: उत्पति और विकास’ के अनुसार राम वाल्मीकि के कल्पित पात्र नहीं बल्कि इतिहास पुरूष थे.हो सकता है कि तिथियों में किंचित चूक हो. यही नहीं रामकथा की वैश्विक व्यापकता को भी बुल्के के शोध ने ही प्रमाणित किया.वियतनाम से इन्डोनेसिया तक रामकथा फैली हुई हैं. रामकथा के विस्तार को फादर कामिल बुल्के वाल्मीकि और भारतीय संस्कृति के दिग्विजय के रूप में देखते थे.फादर कामिल बुल्के को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार ने सन् 1974 में पद्मभूषण से अलंकृत किया.


गौरतलब है कि फादर बुल्के ने शोध और कोश निर्माण के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि अनुवाद के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया. उन्होंने विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘द ब्लू बर्ड’ का नील पंछी के नाम से 1958 में अनुवाद किया.नील पंछी का प्रकाशन बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, बिहार, पटना से किया गया. ‘द ब्लू बर्ड’ मूल फ्रेंच में है. वर्ष 1968 में अंग्रेजी हिंदी कोश प्रकाशित हुआ जो अब तक प्रकाशित कोशों में सबसे ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है. यह भारत का आज भी सबसे प्रामाणिक शब्द कोश माना जाता है। मॉरिस मेटरलिंक के प्रसिद्ध नाटक 'द ब्लू बर्ड' का नील पंछी नाम से बुल्के ने अनुवाद किया. इसके अलावे उन्होंने बाइबिल का हिंदी में अनुवाद किया.छोटी-बड़ी    कुल मिलाकर उन्होंने क़रीब 29 किताबें लिखी. गौर किया जाए तो स्पष्ट है कि फादर बुल्के का साहित्य बहुत विस्तृत है. उनकी छोटी बड़ी पुस्तकों की संख्या उनतीस है और शोध परक निबंधों की संख्या साठ है. इसके अतिरिक्त हिन्दी विश्वकोश तथा अन्य कई सम्पादित ग्रंथों में सम्मिलित लगभग सौ छोटे बड़े निबन्ध है. रांची स्थित मनरेसा हाउस में उनका आवास प्राध्यापकों, साहित्यकारों, धार्मिकों एवं प्रशंसकों के लिए तीर्थ स्थल की तरह बना रहता था. एक विदेशी पादरी के रूप में भारत के लोगों के बीच एक सनातनी हिन्दू संत की तरह मूर्तिमान थे. जीवन के अंतकाल में वह अधिक बीमार रहने लगे थे लेकिन बीमारी की चिन्ता किए बिना वह काम में रत रहते थे. उनके कान भी खराब हो गए थे.वह श्रवण यंत्र लगाने लगे थे.अंतिम दिनों में उन्हें गैंग्रीन हो गया. यहां मांडर और पटना के कुर्जी अस्पताल में इलाज के बाद उन्हें दिल्ली ले जाया गया, जहां 17 अगस्त 1982 को प्रातः साढ़े आठ बजे वह चिर-निद्रा में सो गए.दिल्ली के निकाॅलासन कब्रिस्तान में दूसरे दिन वह दफन हो गए.आज इनकी पूण्य तिथि है.

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