विशेष : कोसी त्रासदी के 12 साल आज - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 18 अगस्त 2020

विशेष : कोसी त्रासदी के 12 साल आज

  • 6 माह के बदले 5 वर्ष बाद एक लचर रिपोर्ट पेश की थी

6 माह के बदले 5 वर्ष बाद एक लचर रिपोर्ट दी। किसी पर ठोस कार्रवाई भी नहीं हुई। राहत के लिए लाभुकों में अकेले मधेपुरा जिले में जो मानक थे, उनके अनुसार गृह क्षति मद की अधिकांश राशि वितरित ही नहीं की गई। 2 लाख 36 हजार 632 घरों में एक लाख घर बनाने की योजना शुरू की गई। लेकिन योजना बंद होने तक एक चौथाई घर ही बन पाए होंगे..
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पटना,18 अगस्त। 18  अगस्त 2008 को कोसी बराज से आगे नेपाल क्षेत्र में कुसहा नाम के गांव में पूर्वी कोसी बांध टूट गया था। इसके बाद कोसी की उच्छृंखल धारा ने सुपौल, मधेपुरा समेत इस क्षेत्र की पांच जिलों में जी भर कर तबाही मचाई। जान और माल की क्षति को देखते हुए इसे राष्ट्रीय आपदा तक घोषित किया गया। सरकार ने पहले से बेहतर कोसी बनाना का वादा कर लोगाें के जख्मों पर मरहम लगाने का वादा किया और काम भी किया। पर, जमीन सच्चाई यह है कि जिन-जिन जगहों पर काम अबतक पूरे नहीं हुए, वहां के लोगों के जख्म अब भी हरे हैं और साल दर साल गहरे भी हो रहे हैं। चौसा के मोरसंडा बस्ती के समीप बाढ़ में टूटे पुल का वर्ष 2015 में मरम्मत कराया गया, जो 2016 के बाढ़ में दोबारा टूट गया। आज यहां का आवागमन प्रभावित है। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुसहा के समीप 18 अगस्त,2008 को कोसी नदी के पूर्वी तटबंध पर हुए कटाव के कारणों और इनसे हुई भारी तबाही को जांचने के लिए 10 सितंबर, 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश राजेश बालिया की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया। इसका चार बार एक्सटेंशन (अवधि विस्तार ) हुआ। आयोग का पहली बार अवधि विस्तार 9 मार्च ,2010 तक के लिए हुआ। अवधि विस्तार इस शर्त के साथ किया गया था कि विस्तारित अवधि के अंतर्गत प्रतिवेदन निश्चित तौर पर सर्मपित कर दिया जाएगा। दूसरी बार अवधि विस्तार मार्च,2011 तक व तीसरी बार 30 सितम्बर, 2011 मे के लिए किया गया। आयोग के लिए सरकार ने विभिन्न श्रेणी के 13 पद स्वीकृत किए थे किन्तु आयोग ने बाद में जिला जज स्तर के एक व अन्य तीन स्थायी पदों के सृजन का अनुरोध किया। इसके आधार पर गृह विशेष विभाग ने सितम्बर, 2011 में जिला जज के 1, स्टोनोग्राफर के 1, लिपिक व रीडर के 1 व आदेशपाल का एक पद स्वीकृत किया। आयोग का चौथा बार अवधि विस्तार 31 मार्च,2012 के लिए हुआ। 


इसके दो साल बाद कोसी नदी के पूर्वी तटबंध पर हुए कटाव के कारणों और इनसे हुई भारी तबाही की रिपोर्ट आ गयी। पटना उच्च न्यायालय के आवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश राजेश बालिया की अध्यक्षता में गठित कोसी बांध के टूटने की न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट 01-08-2014 को विधान सभा में रखी गई। 6 साल के बाद भी कार्रवाई नहीं की गयी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मॉनिटरिंग सेल की खराब प्रबंधन की वजह से बांध का कटाव हुआ जो कोसी त्रासदी के लिये जिम्मेवार है । मालुम हो कि 18 अगस्त,  2008 को बांध टूटा था जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गयी ओर हजारों बेघर हुए । 2008 में जांच के लिए आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने बाढ़ नियंत्रण में लगी इकाईयों  पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हुए कहा है कि गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, कोसी उच्चस्तरीय  समिति  तथा अनुवीक्षण दल के स्तर से कटाव निरोधक कार्यों की सही से मॉनिटरिंग नहीं की गई। चेतावनी व्यवस्था पर प्रश्न खड़े किये गए। अनुभवहीन व अकुशल अभियंता को वीरपुर स्थित कार्यालय पर कटाव निरोधक एवं बाढ़ संघर्षात्मक कार्य  में लगा दिया गया। साथ ही आयोग ने पिछले पाँच  वर्षों में जल संसाधन के वीरपुर कर्यालय से कराए गए कटाव निरोध कार्यो की जाँच कराई जाए इसकी मांग की है ।

18 अगस्त 2008 को कोसी बराज से आगे नेपाल क्षेत्र में कुसहा गांव में पूर्वी कोसी बांध टूट गया था। इसके बाद कोसी की धारा ने सुपौल, मधेपुरा समेत इस क्षेत्र के पांच जिलों में भारी तबाही मचाई थी। जान-माल की क्षति को देखते हुए इसे राष्ट्रीय आपदा तक घोषित किया गया। इलाके में हुई क्षति को काफी हद तक दुरुस्त भी किया। पर 12 साल बाद भी कई जगहों पर पुल-पुलिया के टूटे रहने के कारण आवागमन सुगम नहीं हो पाया है। खासकर चौसा, कुमारखंड, मुरलीगंज, शंकरपुर, उदाकिशुनगंज प्रखंड क्षेत्र में लोगों को ज्यादा परेशानी हो रही है। चौसा प्रखंड के धनेशपुर चौक से मोरसंडा गोठ बस्ती जाने वाली मुख्य मार्ग में दो अलग-अलग जगहों पर पुल ध्वस्त है। इससे करीब 10 हजार परिवारों का आवागमन बाधित है। सुखाड़ में तो लोगों के दर्द दबे रह जाते हैं, पर अभी जबकि डेढ़ माह से बाढ़ की स्थिति है, लोगों के पुराने जख्म हरे हैं। नाव से आवागमन हो रहा है। लोगों की जान जोखिम में रहती है। ग्रामीण बताते हैं कि बाढ़ त्रासदी 2008 के दौरान उक्त पुल ध्वस्त हो गया था। वर्ष 2015 में सड़क व पुलिया की मरम्मत हुई। फिर वर्ष 2016 में बाढ़ के दौरान उक्त पुलिया ध्वस्त हो गई। एक वर्ष के ही दौरान रामचरण टोला के समीप पुल एवं मोरसंडा गोठ बस्ती के निकट दोनों पुल 2016 की बाढ़ में ध्वस्त हो गए। मामला बढ़ा तो यहां पुल बनने तक ध्वस्त पुल के बगल से डायवर्सन बनाने की बात हुई। लेकिन नहीं बना। पिछले साल रामचरण टोला के पास मनरेगा से कुछ काम हुआ। लेकिन लोगों को बाढ़ के दिनों में इससे कोई फायदा नहीं है।


हिमालय पहाड़ से निकली सप्त कोसी के प्रलय से कोसीवासियों के बीच आज भी कोहराम मचा हुआ है। अपने परिजनों के खो जाने के गम से लोग हलकान हैं। इस सदभे से पारिवार के लोग उभर ही रहे थे। कि इस बीच केन्द्र और राज्य सरकार की दुरंगी घोषणा के शिकार हो गये । प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष से प्रति मृतक के परिजन को मुआवजा 1,00,000 एक लाख रूपये , आपदा प्रबंधन विभाग से प्रति मृतक के  परिजनों को 1,00,000एक लाख रूपये और मुख्यमंत्री राहत कोष से प्रति मृतक के परिवार को मुआवजा 50,000 पचास हजार  रूपये की दर से राशि उपलब्ध कराने का एलान हुआ था। केवल आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से एक लाख रू0 दिये गये। शेष प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष और मुख्यमंत्री राहत कोष लुभावने नारा प्रतीत हो गया।  कोसी प्रमंडल के आयुक्त को दिनांक 03.08.09 को जन संगठन एकता परिषद ने सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी कि कोसी बाढ़ से हो गयी मौत के उपरांत सरकारी निर्मित प्रावधान और सरकारी कानूनों की जानकारी दें। मृतकों की  सूची उपलब्ध कराये।  स्पष्ट की गयी कि सरकारी आकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 239 है? या इससे अधिक की मौत हुई है सच्चाई क्या है? मौत की संख्या मापने का पैमाना क्या था? लोगों के द्वारा थाना में प्राथमिकी दर्ज करने से, पोस्टमार्टम करने  से, जन प्रतिनिधियों के द्वारा अधिकृत पत्र देने से। कितनों दिनों की तयसीमा निर्धारित की गयी थी। क्या आज भी एलान/ दावा किया जा सकता ? जो जानकारी मांगी गयी तो वह काफी चौकाने वाला तथ्य साबित हुआ ।  18 अगस्त 2008 को सिर्फ 239 व्यक्तियों की बाढ़ में डूबने से मौत हो गयी। उसके संदर्भ में सूचना है कि केवल सहरसा जिला में 41 व्यक्तियों की मौत हुई  और मधेपुरा में 272 व्यक्तियों की मौत हो गयी । इस तरह 313 की अकाल मौत हो गयी । यहां पर सुपौल जिले का आकड़ा अप्राप्त। इन दो जिलेे में कुल 313लोगों की असामयिक मौत हो गयी ।कोसी बाढ़ 2008 में अधिकारिक तौर से मधेपुरा जिले में कुल 272 की मृत्यु हुई । 181 मृतकों को सरकारी अनुदान प्राप्त हुआ। 

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