बेगूसराय : नगर निगम और सड़क में तालमेल नहीं, आम जनता परेशान - Live Aaryaavart

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सोमवार, 14 सितंबर 2020

बेगूसराय : नगर निगम और सड़क में तालमेल नहीं, आम जनता परेशान

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अरुण ( बेगूसराय ) बेगूसराय नगर निगम क्षेत्र कहें या पूरा बेगूसराय या पूरे बिहार के ही शहरी एवं ग्रामीण सड़कों का जी हाल होता है वो कहने या बताने की बात नहीं बल्कि दुनियाँ को दर्शाने की बात होना चाहिए।

दर्शाने की बात ही क्यों?
दर्शाने की बात इसलिए कि कम से कम दुनियाँ यह तो देखे की बिहार के सड़कों का क्या हाल है।इसे देखने के बाद देश दुनियाँ के लोगों की समझ में ये बातें आसानी पूर्वक आ जाएगी कि जिस राज्य शहर और गाँव के सड़कीं का ये हाल है तो बाकी की बात व्यवस्था क्या हो सकती है।बिहार की लचर-पचर सरकारी व्यवस्था यहाँ की पुलिस प्रशासन,यहाँ का जिलाप्रशासन,यहाँ के नगर निगम की व्यवस्था,यहाँ का आपराधिक मापदंड के साथ -साथ यहाँ का बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार आदि के बारे में सुगमता पूर्वक जानकारी प्राप्त करने में सुविधा तो अवश्य ही होगी।

यहाँ के सड़कों का हाल इतना खराब क्यों?
यहाँ के सड़कों का हाल इसलिए भी खराब है कि जगह जगह पर जल-नल की योजना के अन्तर्गत जहाँ कहीं का सड़क जर्जरता की अवस्था में है वहाँ की बात छोड़ जहाँ सुन्दर और बढ़िया सड़क भी है वहाँ उक्त योज आ के अन्तर्गत तोड़-फोड़कर सड़क को और भी बुरी स्थिति में लाने का कार्य नगर निगम के द्वारा करवाया गया है वो भी सामने बरसात का मौसम देखते हुए।यही कार्य बरसात के पूर्व या फिर बरसात के बाद किया जाता तो कम से कम सड़क के मामले में इतनी फजीहत आम लोगों को झेलनी नहीं पड़ती।



बढ़ता हुआ बिहार का आपराधिक मापदण्ड।
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यूँ तो पूरे देश में आपराधियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित जो ही चुका है उसमें भी बिहार का जो आपराधिक मापदण्ड है वह चर्मोत्कर्ष पर है और प्रशासनिक व्यवस्था आपराधिक मापदण्दडों के समक्ष बौना साबित हो रही है।इसमें पुलिस प्रशासन पर भी दोषारोपण नहीं कर सकते हैं क्योंकि इसके पीछे पूरा सिस्टम ही दोषी है।पुलिस का काम है अपराधीयों को पकड़ना,तो पुलिस तो कुछ हद तक अपना काम कर ही रही है अब ऊपर से ही जब उस अपराधियों के सिर पर वरदहस्त है तो बिचारा पुलिसप्रशासन कर भी क्या सकती है।

अपराधी आते कहाँ से है?
अब अपराधी आते कहाँ से है तो यह बात तो बिल्कुल आई ए की तरह साफ है कि अपराधीयों का जन्मदाता है बेरोजगारी,और बेरोजगारी से जन्म लेता है भुखमरी तो भुखमरी से बेहतर है कि जब मरना ही है तो कुछ कर के ही मरें इसी कुछ करने के धुन में अधिकांशतः युवा वर्ग अपराध की ओर मुखातिब हो जाते हैं।नतीजा क्या होगा इसकी परवाह तो करते नहीं और परवाह करें भी तो क्यों?जब कोई युवावर्ग जब अपराध की ओर मुखातिब होता है और कुछ ऐसा वैसा अपराध करके खुद को वर्चस्ववान बना लेता है तो फिर उसके सिरपर बड़े बड़े हस्तियों का वरदहस्त आ जाता है और फिर वही अपराधी अपना परचम लहराते हुए उन वरदहस्त प्रदान करनेवालों के इशारे का कठपुतली बनकर रह जाता है।उसे यह नहीं पता होता है कि जिस दिन उसस्व जरा भी इधर उधर हुआ तो खुद किधर जाऐंगे इस बात की इल्म तो उन्हें हिती नहीं,बस चन्द पैसों की खातिर खुद को समाज और परिवार से अलग तो होते ही हैं साथ ही सरदर्द भी बन जाते हैं।

सरकारी महकमों में ही भ्रष्टाचार पनपते हैं क्यों?
सरकारी महकमों में ही भ्र्ष्टाचार पनपने का खास कारण यह है कि जिन्हें सरकारी नौकरी मिल गई और तनख्वाह मिलना शुरु ही गया तो जीतनी तनख्वाह उनकी हिती है उसस्व उनका पेट तो शायद भर जाता है पर देखने और दिखाने जैसी कोई बात उस तनख्वाह स्व होती नहीं यानी शान-ओ-शौकत,बँगला, गाड़ी, महंगे कपडे, बीवी के लिए अलग बच्चों के लिए अलग गाड़ी हिनी चाहिए।मेमसाहब शॉपिंग के लिए जाएंगी तो उनके स्पेशल गाड़ी,बैंक का एटीम,डेविड कार्ड,क्रेडिट कार्ड आदि,बच्चे स्कूल जाऐंगे तो उनके लिए अलग स्पेशल गाड़ी,नौकर-चाकर आदि ये सारी जरुरतें उस तनख्वाह से भलाय कैसे पूरे ही सकते हैं तो भ्रष्टाचारी तो बनाना ही पड़ेगा।

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