कोविड-19 के बाद की दुनिया में अरुंधती रॉय की किताब ‘आज़ादी’ - Live Aaryaavart

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बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

कोविड-19 के बाद की दुनिया में अरुंधती रॉय की किताब ‘आज़ादी’

  • · किताब का एक ख़ास हिस्सा नए नागरिकता क़ानून (सीएए), एनपीआर-एनआरसी और इनके ख़िलाफ़ चले आंदोलनों के बारे में है।
  • · लेखिका ने कोरोना के बहाने वैश्विक महामारी के मायने और समाज पर उसके व्यापक प्रभाव को नए नज़रिए से देखने की कोशिश की है।
  • · पुस्तक प्री बुकिंग में, 30% से अधिक छूट 31 अक्टूबर तक उपलब्ध है।

अरुंधति-रॉय -आज़ादी
नई दिल्ली : बुकर पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय की नवीनतम पुस्तक ‘आजादी’ अब जल्द ही पुस्तक प्रेमियों के लिए उपलब्ध होगी। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक इसी नाम से अंग्रेजी में सितम्बर, 2020 में छप चुकी है, जिसका हिन्दी अनुवाद रेयाज़ुल हक़ ने किया है। यह एक निबंध-संग्रह है जो अधिनायकवाद के बढ़ते वर्चस्व के दौर में दुनिया को स्वतंत्रता का अर्थ बतलाती है। इस निबंध-संग्रह में लेखिका ने भाषाओं की भूमिका और कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के बीच नई वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में विचार किया है। आज़ादी—कश्मीर में आज़ादी के संघर्ष का नारा है, जिससे कश्मीरी उस चीज़ की मुख़ालफ़त करते हैं जिसे वे भारतीय क़ब्ज़े के रूप में देखते हैं। विडम्बना ही है कि यह भारत की सड़कों पर हिन्दू राष्ट्रवाद की कट्टर विचारधारा की मुख़ालफ़त करनेवाले लाखों अवाम का नारा भी बन गया। आज़ादी की इन दोनों पुकारों के बीच क्या है–क्या यह एक दरार है या एक पुल है? इस सवाल के जवाब पर ग़ौर करने का वक़्त अभी आया ही था कि सड़कें ख़ामोश हो गईं। सिर्फ़ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की सड़कें। कोविड–19 के साथ आई आज़ादी की एक और समझ, जो कहीं ख़ौफ़नाक थी। इसने मुल्कों के बीच सरहदों को बेमानी बना दिया, सारी की सारी आबादी को क़ैद कर दिया और यह आधुनिक दुनिया ऐसे ठहर गई जैसा कभी नहीं देखा गया था। रोमांचित कर देनेवाले इन लेखों में अरुंधति रॉय कहती हैं कि हमें दुनिया में बढ़ती जा रही तानाशाही के इस दौर में आज़ादी के मायनों पर ग़ौर करना ही होगा। इन लेखों में, हमारे बेचैन कर देनेवाले इस वक़्त में निजी और सार्वजनिक ज़ुबानों पर बात की गई है, बात की गई है क़िस्सागोई और नए सपनों की ज़रूरत की। रॉय के मुताबिक़, महामारी एक नई दुनिया की दहलीज़ है। जहाँ आज यह महामारी निराशा और तबाही लेकर आई है, वहीं यह नई क़िस्म की इंसानियत के लिए एक दावत भी है। यह एक मौक़ा है कि हम एक नई दुनिया का सपना देख सकें।

गौरतलब है कि राजकमल प्रकाशन से अरुंधती रॉय की मामूली चीज़ों का देवता, अपार खुशी का घराना,  बेपनाह शादमानी की ममलिकत (उर्दू में), न्याय का गणित, आहत देश, भूमकाल : कॉमरेडों के साथ, कठघरे में लोकतंत्र, एक था डॉक्टर एक था संत किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। अरुंधती रॉय ने अपनी नवीनतम पुस्तक के हिंदी अनुवाद आने पर  कहा, “मेरे लिए यह बड़े फ़ख़्र और ख़ुशी की बात है और एक बेहतरीन सियासत की मिसाल है कि राजकमल प्रकाशन अंग्रेज़ी में आने के महज़ कुछ हफ़्तों के भीतर मेरी नई किताब को हिंदी में प्रकाशित कर रहा है। इस किताब के पहले निबंध का विषय भाषा है - कि दुनिया के इस हिस्से में, जहां हम कई ज़ुबानों के बीच जीते हैं, कैसे वहाँ लिखना शुरू करने से भी पहले, ख़ुद अनुवाद अपने आप में सृजन की एक मौलिक कार्रवाई है।” अनुवादक रेयाज़ुल हक़ ने अनुवाद पर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “इस अनुवाद में राजकमल प्रकाशन ने शुरुआत से ही बहुत उत्साह और दिलचस्पी दिखाई और उनका सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। आज यह एक साहस का काम भी है। अरुंधति रॉय की इच्छा थी कि अनुवाद एक ऐसे लहजे में हो जो इस किताब की सियासत, इसके जज़्बे और लोगों की बोलचाल - सबके बीच एक रिश्ता बनाए रखे। मेरी कोशिश यही रही.रॉय ने यह यक़ीनी बनाया कि अनुवाद करते हुए मुझे कोई मुश्किल न आए और समस्याओं को उन्होंने फ़ौरन सुलझाया. आज़ादी एक ऐसी दुनिया का नक़्शा है जो हमारी मंज़िल है और जिससे हम रवाना हो रहे हैं, जो बनते हुए बिखर रही है, बिखरते हुए बन रही है। क़ब्रिस्तानों में बने घरों और क़ब्रिस्तान बनते घरों वाली एक दुनिया। इसका अनुवाद मुश्किल था, क्योंकि यह हमारी कमज़ोरियों और हमारे ज़ख्मों के बारे में है, लेकिन यह उतना ही आसान था क्योंकि यह उम्मीदों और सपनों के बारे में है।”

क्या है खास-

· आज के समय में जब समाज को बाँटने की कोशिशें और नफ़रत की राजनीति मज़बूत हो रही है, ऐसे में लेखिका विचार करती हैं कि इस दौर में क़िस्सागोई और भाषा की भूमिका कितनी अहम है।

· किताब का ख़ास हिस्सा नए नागरिकता क़ानून (सीएए) और एनपीआर-एनआरसी के बारे में है, और इनके ख़िलाफ़ आंदोलनों के बारे में भी।

· लेखिका ने अपने दोनों उपन्यासों की रचना प्रक्रिया की चर्चा करते हुए एक उपन्यासकार के तौर पर अपनी लेखन-यात्रा पर भी विस्तार से लिखा है। साथ ही एक निबंध-लेखक के रूप में भी अपने काम पर निगाह डाली है।

· अरुंधती रॉय की हर नई वैचारिक किताब हमें सोचने के लिए नए सवाल और झकझोरने वाली कई तरह की वस्तु स्थितियाँ सामने रखती है, जिन्हें हम या तो देखते नहीं हैं या देखकर भी देखना नहीं चाहते।

· कोविड-19 के दौर में आई यह किताब न केवल इस समय की विडंबनाओं और कड़वी सच्चाइयों से हमें बाख़बर करती है, बल्कि भविष्य की दुनिया की आहट भी सुनवाती है।

· अनुवाद ऐसा जैसे किताब मूल हिंदी में लिखी गई हो।


 


लेखक के बारे मे- 

अरुंधति रॉय

अरुंधति रॉय ने वास्तुकला का अध्ययन किया है। आप द गॉड ऑफ़ स्मॉल  थिंग्स —जिसके लिए आपको 1997 का बुकर पुरस्कार प्राप्त हुआ—और द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस की लेखिका हैं। दुनियाभर में इन दोनों उपन्यासों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। आपकी पुस्तकें मामूली चीज़ों का देवता, अपार खुशी का घराना,  बेपनाह शादमानी की ममलिकत (उर्दू में), न्याय का गणित, आहत देश, भूमकाल : कॉमरेडों के साथ, कठघरे में लोकतंत्र, एक था डॉक्टर एक था संत राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी हैं। माय सीडिशियस हार्ट आपकी समग्र कथेतर रचनाओं का संकलन है। आप 2002 के लनन कल्चरल फ्रीडम पुरस्कार, 2015 के आंबेडकर सुदार पुरस्कार और महात्मा जोतिबा फुले पुरस्कार से सम्मानित हैं।

अनुवाद : रेयाज़ुल हक़

रेयाज़ुल हक़ ने बर्तोल्त ब्रेख्त और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की सैद्धांतिकी पर शोध किया है और फ़िलहाल सिनेमा पर काम कर रहे हैं। पत्रकार और संपादक रहे रेयाज़ुल ने पत्रिकाओं और प्रकाशन संस्थानों के साथ भी काम किए हैं। इसके अलावा वह अरुंधति रॉय, आनंद तेलतुंबड़े, एदुआर्दो गालेआनो, ख़ालिद हुसैनी, न्गुगी वा थ्योंगो, पाब्लो नेरुदा और बर्तोल्त ब्रेख्त की किताबों के अनुवाद भी कर चुके हैं।


पुस्तक : आजादी

आईएसबीएन पीबी : 978-93-89598-70-4

प्रकाशक      : राजकमल प्रकाशन

लेखक : अरुंधती रॉय

अनुवादक : रेयाज़ुल हक़

भाषा : हिंदी

मूल भाषा : अंग्रेज़ी

मूल्य : 250/- (पेपरबैक)

पृष्ठ : 248

प्रकाशन वर्ष : अक्टूबर, 2020

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